कौन थीं महारानी लक्ष्मममन्नी, जिन्होंने भारत में वैक्सीन को लोकप्रिय बनाया
मैसुरू, 1 जून: वैसे तो भारत में टीकाकरण का इतिहास कम से कम एक हजार साल पुराना है। लेकिन, आधुनिक वैज्ञानिक आधार पर तैयार टीके की शुरुआत का इतिहास करीब सवा दो साल पुराना है। देश में जबसे कोरोना वायरस का टीका लगाने का काम शुरू हुआ है, तब से इसको लेकर भी कई तरह से आशंकाएं और संदेह जाहिर किए गए हैं। इसमें वो लोग भी शामिल रहे हैं, जो जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं। शायद यही वजह है कि देश के एक वर्ग में अभी भी वैक्सीन लगवाने को लेकर हिचकिचाहट देखी जा रही है। यह स्थिति 19वीं सदी की शुरुआत में भी थी, जब देश में पहलीबार आधुनिक वैज्ञानिक तरीके से विकसित चेचक का टीका लगाया जा रहा था। तब मैसुरू की राजमाता महारानी लक्ष्मममन्नी खुद सामने आईं, जिसके बाद लोगों में टीका लगाने को लेकर हिचकिचाहट दूर हो गई।

भारत में वैक्सीन का इतिहास
नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (एनसीबीआई) के मुताबिक भारत समेत दुनिया के कई देशों में चेचक का टीका लगाए जाने के करीब 1000 ईस्वी के आसपास के सबूत उपलब्ध हैं। भारत के बारे में कहा गया है कि स्वस्थ व्यक्ति में टीके लगाने के बाद तब हल्के लक्षण आते थे, लेकिन भविष्य में गंभीर बीमारी की रोकथाम हो जाती थी। लेकिन, आधुनिक विज्ञान के आधार पर तैयार किए गए चेचक के टीके को भारत में लोकप्रिय बनाने का इतिहास 19वीं सदी की शुरुआत का है। उस समय इंग्लैंड के अंग्रेज चिकित्सक डॉक्टर एडवर्ड जेन्नर ने जानलेवा चेचक की वैक्सीन विकसित की थी। लंदन में 1799 में ही उनकी चेचक वैक्सीन की क्लीनिकल ट्रायल सफल रही थी। लेकिन, भारत में उसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय दक्षिण के तत्कालीन मैसूर राजघराने को जाता है। आज भी बुजुर्गों को पता है कि देश में एक वक्त चेचक का आतंक कैसा था। स्मॉलपॉक्स वायरस ऐसा जानलेवा वायरस था, जिसमें मृत्यु दर कोरोना से कहीं ज्यादा यानी 25 फीसदी से अधिक था।

भारत में कब शुरू हुआ आधुनिक टीकाकरण
आधुनिक वैज्ञानिक आधार पर तैयार चेचक की पहली वैक्सीन 1802 में इंग्लैंड से भारत पहुंची। उस समय तक चेचक गांव-गांव में महामारी बनकर फैलती थी और बड़ी आबादी खत्म हो जाती थी। उस वक्त मैसूर रियासत एक इंग्लिश कॉलोनी थी। वैसे भारत तक वैक्सीन भेजने की कोशिश पहले से ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन लंबे समुद्री रास्ते और भारत की गर्म जलवायु की वजह से वैक्सीन को लंबे वक्त तक सुरक्षित रखना नाममुकिन हो रहा था। बाद में इसमें तब सफलता मिली जब उसकी पैकेजिंग और भी दुरुस्त की गई। वैसे तो भारत में चेचक का पहला टीकाकरण जून 1802 में ही शुरू हो गया था। तब तत्कालीन बॉम्बे की एक युवा लड़की अन्ना दस्थाल को पहला टीका लगा था, लेकिन फिर भी इसे लोकप्रिय बनाने में दिक्कत हो रही थी। तब तत्कालीन मैसूर राजघराना आगे आया और महल के अंदर ही वैक्सीनेशन शुरू करवाकर लोगों के मन से सभी संदहों को दूर किया।

युवरानी देवजमनी को लगा पहला टीका
मैसूर राजघराने ने पहली वैक्सीन लगाने के लिए युवरानी देवजमनी को चुना और उन्हें ही महल में पहला टीका लगाया गया। वो युवराज मुम्मदी कृष्णराजा वाडियार की पत्नी थीं। आयरलैंड में जन्मे पेंटर थॉमस हिक्की ने उस ऐतिहासिक तस्वीर को कैनवास पर उतारने का काम किया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय कृष्णराजा वाडियार और उनकी पत्नी दोनों की उम्र महज 12 साल थी। केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इतिहासकार डॉक्टर नाइजल चांसलर की मानें तो पेंटिंग बनवाने के पीछे ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में चेचक के टीके का प्रचार-प्रसार करना था। कई और इतिहासकारों का भी दावा है कि उस पेंटिंग में वैक्सीन सेल्फी के रूप में दिखाई गई युवती देवजमनी ही हैं, लेकिन टीओआई के मुताबिक मैसुरू शाही परिवार के इतिहास पर बारीकी से काम करने वाले पीवी ननजराज उर्स इस दावे से सहमत नहीं हैं।

मैसुरू पैलेस में टीकाकरण
हालांकि, ननजराज उर्स 1805 से लेकर 1808 के बीच मैसुरू पैलेस में वैक्सीनेशन अभियान चलाए जाने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा है, 'उस वक्त मैसुरू किले के अंदर करीब 7,000 से 8,000 आबादी रहती थी। बड़ी संख्या में लोग चेचक की चपेट में आ रहे थे। इसी को देखते हुए मैसुरू में टीकाकरण की शुरुआत हुई।' उस समय औपनिवेशिक सत्ता ने लोगों को वैक्सीन के फायदे के बारे में काफी समझाने-बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन लोगों में एक हिचकिचाहट बनी हुई थी।

कौन थीं महारानी लक्ष्मममन्नी ?
इस बात पर भले ही विवाद हो सकता है कि मैसुरू राजमहल में पहला टीका लगाए जाने को लेकर जिस युवरानी देवजमनी की तस्वीर की चर्चा होती है, पेंटिंग में वो हैं या नहीं ? लेकिन, इस तथ्य में शायद ही कोई विवाद है कि राजघराने से टीकाकरण की शुरुआत कराकर आम लोगों के मन से उसके प्रति संदेह मिटाने की अगुवाई राजमाता महारानी लक्ष्मममन्नी ने की थी। उन्होंने ही सबसे पहले राजपरिवार के सदस्यों को वैक्सीन लगवाया था। जिस युवरानी को पहला टीका लगा, वह उनकी बहू और मुम्मदी कृष्णराजा वाडियार की पत्नी थीं। उर्स कहते हैं, 'बीमारी में स्थानीय दवाई कारगर नहीं हो पा रही थी। तब राजमाता महारानी लक्ष्मममन्नी ने ने फैसला किया कि पैले और जो इसमें रहते हैं, उन्हें टीकाकरण करवाकर एक मिसाल पेश करनी चाहिए। ' (तस्वीरें- सांकेतिक)












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