#MeToo की छतरी में किसका घुसना है ख़तरनाक?
औरतों का अपने उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का ज़रूरी अभियान #MeToo भारत में इस वक़्त अपने चरम पर है.
सोशल मीडिया पर हर तबके की औरतें अपने साथ हुए उत्पीड़न की कहानियां साझा कर रही हैं. इस अभियान की चपेट में फ़िल्म, मीडिया इंडस्ट्री और राजनीति से जुड़े लोग भी आए हैं.
कई बड़े नामों ने ख़ुद पर लगे आरोपों पर माफी मांगी है और कुछ लोग अब भी चुप्पी बनाए हुए हैं. लेकिन इस अभियान का एक पहलू ये भी है किन मामलों को #MeToo माना जाए और किन मामलों को नहीं.
कुछ महिला पत्रकार #MeToo की अहमियत बताते हुए इस पहलू पर भी रोशनी डाल रही हैं. इन महिलाओं का कहना है कि हर मामले को #MeToo से जोड़कर यौन उत्पीड़न न माना जाए.
बैडमिंटन खिलाड़ी गुट्टा ज्वाला ने ट्विटर पर मंगलवार को 'अपने साथ हुए मानसिक उत्पीड़न' को #MeToo हैशटैग के साथ शेयर किया. ज्वाला ने लिखा, ''2006 में वो आदमी चीफ़ बना और एक नेशनल चैम्पियन होने के बावजूद मुझे नेशनल टीम से बाहर किया गया. रियो से लौटने के बाद मुझे फिर टीम से बाहर किया गया. इसी वजह से मैंने खेलना बंद कर दिया.''
https://twitter.com/Guttajwala/status/1049566501752066048
इस ट्वीट पर कुछ लोगों ने जवाब देते हुए लिखा, ME TOO सिर्फ़ शारीरिक उत्पीड़न के लिए है, इसे दूसरी बातों के लिए इस्तेमाल न करें.
ऐसे में एक सवाल ये हो सकता है कि असल में कौन सा मामला #MeToo में माना जा सकता है? हमने कुछ लोगों से इस मुद्दे पर बात कर उनका नज़रिया जानने की कोशिश की.
मज़ाक और उत्पीड़न का फ़र्क़
'द सिटीजन' वेबसाइट की संपादक सीमा मुस्तफा ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''इस अभियान के तहत बलात्कारी के लिए भी वही सज़ा और कमेंट पास करने वालों के लिए भी वही सज़़ा नहीं हो सकती है. मेरी राय में एक लड़की जानती है कि कब कौन सिर्फ़ मज़ाक कर रहा है और कब उत्पीड़न कर रहा है. अगर एक लड़की ना कह रही है तो आदमी को रुकना होगा. अगर एक लड़की कह रही है कि उसे ये नहीं पसंद तो आदमी को रुकना होगा. अगर लड़की की ना के बाद लड़का आगे बढ़ रहा है तो ये उत्पीड़न है.''
एनडीटीवी की पत्रकार निधि राज़दान कहती हैं, ''हर आदमी को यौन उत्पीड़न करने वाला मान लेना ग़लत है. हर मामले को #MeToo की छतरी में नहीं लाया जा सकता. उदाहरण के लिए अगर आपके ऑफिस में डेटिंग की इजाज़त है तो लोग आपस में बात करेंगे. ऐसे में अगर कोई आपकी ना सुनकर पीछे हट जाए तो मेरी नज़र में ये उत्पीड़न नहीं है. पिछले कई दिनों में मैंने ये भी देखा है कि जिन लोगों के रिश्ते कामयाब नहीं रहे वो भी इसे #MeToo में ला रहे हैं. इससे जिन लोगों के साथ वाकई उत्पीड़न हुआ है उनकी कहानियां दब जाएंगी.''
इसी मसले पर बीजेपी सांसद डॉक्टर उदित राज ने भी ट्वीट कर कहा था, ''Me Too ज़रूरी अभियान है, लेकिन किसी व्यक्ति पर 10 साल बाद यौन शोषण का आरोप लगाने का क्या मतलब है? इतने सालों बाद ऐसे मामले की सत्यता की जाँच कैसे हो सकेगी? जिस व्यक्ति पर झूठा आरोप लगा दिया जाएगा उसकी छवि का कितना बड़ा नुकसान होगा, ये सोचने वाली बात है. ग़लत प्रथा की शुरुआत है.''
https://twitter.com/Dr_Uditraj/status/1049526433926836224
बीबीसी से बात करते हुए उदित राज कहते हैं, ''मैं इस अभियान के ख़िलाफ़ नहीं हूं. इसमें कोई शक नहीं है कि शोषण होता है. भेड़िए की तरह पुरुष पेश आते हैं. लेकिन 1973 की किसी घटना को 20, 30 साल बाद किसी ख़ास मकसद से भी कहा जा सकता है. अपनी बात रखने में 40 साल लगते हैं? देश विदेश घूम रहे हैं, बिज़नेस कर रहे हैं. हँस बोल रहे हैं. अपनी बात रखने में इतने साल लगते हैं? ''
उदित राज की बात पर निधि और सीमा मुस्तफा दोनों आपत्ति दर्ज करती हैं.
निधि कहती हैं, ''आप कौन होते हैं ये तय करने वाले कि जिस औरत के साथ उत्पीड़न हुआ है वो कब बोलेगी क्योंकि कुछ मामलों में पीड़ित महिलाएं नहीं बोल पाती हैं. उनमें डर होता है, वो बात करना नहीं चाहती हैं. आज कोई लड़की बोले तो सबसे पहले ये सवाल किया जाता है कि तुमने क्या पहना था. लेकिन इससे आप किए हुए अपराध से नहीं बच सकते. कई वजहों से लोग नहीं बोल पाते हैं.''
सीमा मुस्तफा उदित राज की बात पर कहती हैं, ''आपको दायरे का ख्याल रखना चाहिए. आपको कुछ भी नहीं बोल देना चाहिए.''
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Me Too का दूसरा पक्ष रखने वाले एंटी Me Too?
सोशल मीडिया पर इस अभियान के दूसरे पहलुओं को रखने वालों को एंटी- मी टू भी कहा जा रहा है. यानी अगर कोई किसी एक मामले को Me Too अभियान का हिस्सा नहीं मान रहा या रही है तो उसे एंटी-मी टू कहा जा रहा है. इसमें वो पत्रकार भी शामिल हैं जो ऐसी बातें कर रहे हैं. ऐसे पत्रकारों के ट्विट्स पर कुछ लोग आपत्ति जता रहे हैं.
निधि राज़दान ने कहा, ''मुझे कुछ भी एंटी मी-टू नहीं लग रहा है. इसे ऐसे देखना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है. अगर आप किसी से अलग विचार रखते हैं तो ख़ासतौर पर ट्विटर पर ये दिक्कत हो गई है कि या तो ब्लैक है या व्हाइट. मगर ऐसे नहीं होता है. मेरे हिसाब से हर कोई अपनी राय रखने का हकदा़र है. मैं मी-टू के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैं बस ये कह रही हूं कि निजी रिश्तों के मामलों को मी-टू में लाना ग़लत है. इसे एंटी मी-टू कहना ग़लत है. अगर ये आपकी तरह का फ़ेमिनिज़्म नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं कि ये फ़ेमिनिज़्म नहीं है.''
सीमा मुस्तफा इस पर कहती हैं, ''मैं इस मी-टू या एंटी मी टू जैसी बातों पर यक़ीन नहीं करती हूं. एंटी या प्रो अगर लोग कहना चाहते हैं तो कहें. मैं ऐसी किसी परिभाषा में यक़ीन नहीं रखती हूं. मेरा पुरुष बनाम औरत के बीच फ़ासले पर यक़ीन नहीं है.''
निधि राज़दान कहती हैं, ''अगर किसी एक ही आदमी के ख़िलाफ कई शिकायतें हो रही हैं तो आप जानते हैं कि वो सच है या नहीं. ये एक बेहद ज़रूरी अभियान है और ये चलता रहना चाहिए.''
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दफ़्तरों की कमेटियां कितनी कारगर?
साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइंस जारी की. इसके तहत वर्क प्लेस यानी काम करने की जगह पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियम क़ायदे बनाए गए.
2013 में संसद ने विशाखा जजमेंट की बुनियाद पर दफ्तरों में महिलाओं के संरक्षण के लिए एक क़ानून पारित किया.
महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने संसद में बताया था, ''2015 से वर्क प्लेस पर यौन उत्पीड़न के हर साल 500 से 600 केस दर्ज किए जाते हैं.'' ये आंकड़े इस साल जुलाई तक के हैं.
दफ़्तरों में इंटरनल कंप्लेंट कमेटी यानी ICC होती हैं. ऐसे में ME TOO अभियान के बीच ये सवाल भी उठ रहे हैं कि ये कमेटियां कितनी कारगर हैं?
सीमा मुस्तफा कहती हैं, ''ज़्यादातर मीडिया संस्थानों में इंटरनल कंप्लेंट कमेटी बनी ही नहीं है या ऐक्टिव नहीं है.''
निधि राज़दान ने कहा, ''अब सारी बहस इसी ओर बढ़ रही हैं. हर कंपनी में ICC होना चाहिए. लेकिन कितनी कंपनियां इसे मान रही हैं, ये बेहद अहम सवाल है. उम्मीद है कि इस ME TOO अभियान की वजह से इस पर भी बात होगी. ताकि पता चल सके कि कंपनियां किस तरह इसे फ़ॉलो कर रही हैं.''
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'देश में भय का माहौल है'
सीमा मुस्तफा की राय में Me Too अभियान बहुत सब्जेक्टिव और एकपक्षीय है.
वो कहती हैं, ''इस अभियान में ज़िम्मेदारी तय नहीं है. बस एक ट्वीट कर किसी पर कुछ भी आरोप लगा सकते हैं. मैं ये नहीं कह रही कि कोई औरत झूठ बोल रही है. ज़्यादातर औरतें ऐसा नहीं करेंगी. लेकिन एक या दो ऐसी औरतें भी होंगी, जो उत्पीड़न के अलावा किसी दूसरी बात को लेकर किसी पर आरोप लगा सकती हैं. ऐसे मामलों में कई आदमियों की नौकरी जाएगी और हम मी- टू की सफलता पर फ़ख़्र करेंगे. लेकिन किस आधार पर? एक ट्वीट? वाक़ई. जांच, सबूत कहां हैं? पत्रकार होने के नाते एक ख़बर को छापने से पहले की ज़रूरी बातें.''
बीबीसी से उदित राज ने कहा, ''इस अभियान के तहत जिस पुरुष पर आरोप लगता है, उसको लेकर कोई तरीका होना चाहिए. अभी क्या हो रहा है कि आरोप लगते ही 10 मिनट के अंदर मीडिया उसकी छवि ख़राब कर देता है, लेकिन बाद में जब वो निर्दोष साबित होता है तो कोई कुछ नहीं बताता. बताइए देश में भय का वातावरण है. लोग महिलाओं के साथ काम करने से डर रहे हैं. इसमें अपनी बात रखने को लेकर एक समय-सीमा होनी चाहिए. दूध पीते बच्चे थोड़े ही हैं जो सालों तक बोल नहीं पाएं.''
निधि भी इस डर की ओर इशारा करती हैं, ''ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजकल हर चीज़ का सोशल मीडिया पर ट्रायल होता है. आप उससे बच नहीं सकते. बाद में वो लड़का या लड़की निर्दोष साबित हो सकते हैं. इस मुद्दे पर थोड़ा सतर्क रहने की ज़रूरत है.''
उदित राज ने कहा, ''ऐसे मामलों में बस आरोप लगा देते हैं. जेएनयू प्रोफेसरों का मामला देख लीजिए. पहले आरोप लगा दिए गए. बाद में निर्दोष साबित हुए. लेकिन किसी ने ये बात नहीं बताई. मैं अभियान के ख़िलाफ़ नहीं हूं, लेकिन जब चीज़ें सत्यापित हों, तभी कुछ कहना चाहिए.''
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लेकिन क्या उत्पीड़न सिर्फ़ शारीरिक होता है और गुट्टा ज्वाला के मामले को मी-टू में माना जा सकता है?
निधि राजदान के मुताबिक़, ''हर उत्पीड़न शारीरिक नहीं हो सकता. ये मानसिक भी हो सकता है. उत्पीड़न सबके लिए अलग हो सकता है. कई लड़कियों को लगता है कि जिस तरह से उन्हें देखा जाता है वो उत्पीड़न है. अगर आप एक लड़की हों तो आप ये समझ पाएंगे कि किस तरह आदमी लोग देखते हैं. ये महिला पर है कि वो ये तय करे कि एक आदमी कब लाइन क्रॉस कर रहा है.''
सोशल मीडिया पर शुरू हुए ऐसे अभियानों के असर पर निधि राजदान कहती हैं, ''सिने कलाकार से लेकर राजनीति तक इस पर बात हो रही है. पुलिस में शिकायतें हो रही हैं तो ME TOO अभियान का असर तो है. बदल तो रहा है.''
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