• search

राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बीच वरुण गाँधी और शत्रुघ्न सिन्हा कहां थे?

By Bbc Hindi
Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    2019 के आम चुनावों के पहले होने वाली भारतीय जनता पार्टी की आखिरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में ख़त्म हुई.

    मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह को चुनाव तक सेनापति बने रहने का दायित्व मिला और समापन के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "एक नए भारत का संकल्प लिया.''

    इस अहम बैठक में ऐसे कई लोग भी पहुंचे जो पार्टी में पिछले चार सालों से ख़ासे 'निष्क्रय' दिखाई दिए हैं.

    लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तस्वीर 2018 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक साथ ही दिखी.

    2013 में पणजी, गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी 'अस्वस्थ' होने के चलते नहीं गए थे.

    मुरली मनोहर जोशी उस बैठक के लिए गोवा गए थे और उन्होंने भाजपा की लीडरशिप को बदलते देखा था.

    ये वही बैठक थी जिसमें नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनावों के लिए चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाया गया.

    इसके बाद से जो हुआ वो ज़्यादा पुराना इतिहास नहीं है. नरेंद्र मोदी ने धुआंधार तरीके से चुनाव जीता और पीएम बने.

    दूर जाते नेता

    उनके पुराने और 'विश्वासपात्र' गृह मंत्री रहे अमित शाह को भाजपा की कमान सौंपी गई और बिहार-दिल्ली छोड़ भाजपा ने देश में तमाम विधानसभा चुनाव जीते.

    लेकिन इस प्रक्रिया में तीन लोग ऐसे भी थे जो पार्टी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दूर जा रहे थे.

    पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और सुल्तानपुर के सांसद और संजय गाँधी के बेटे वरुण गाँधी.

    लंबे समय तक मोदी सरकार की वित्तीय और विदेश नीति को ग़लत ठहराने के बाद मौजूदा केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने इसी वर्ष भाजपा त्याग दी.

    लेकिन दो ऐसे लोग हैं जिनके बारे में भारतीय जनता पार्टी आज भी असमंजस में है.

    वरुण गांधी और शत्रुघ्न सिन्हा क्यों नहीं नज़र आए

    वरुण गाँधी और शत्रुघ्न सिन्हा वे दो सांसद हैं जिनका पार्टी में भविष्य किसी को नहीं पता.

    राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान भाजपा के एक केंद्रीय नेता ने कहा, "आज भाजपा जितनी सफल और बड़े पैमाने पर फैली हुई है उसमें बेवजह विरोध करने वालों के लिए जगह कहाँ है?"

    लेकिन जिस शाम अमित शाह राष्ट्रीय कार्यकारिणी में "बूथ जीतो, चुनाव जीतो" वाला मंत्र दोहरा रहे थे, उस समय शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बगल में बैठे हुए आम आदमी पार्टी की एक रैली में शिरकत कर रहे थे.

    इसके एक शाम पहले भाजपा सरकार की केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी के पुत्र और सांसद वरुण गाँधी अम्बाला की एक यूनिवर्सिटी में छात्रों को युवा शक्ति पर भाषण दे रहे थे.

    भाजपा को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर के मुताबिक़, "पार्टी इन्हें हीरो बनाने के मूड में बिल्कुल नहीं है".

    उन्होंने कहा, "यशवंत सिन्हा तो ख़ुद अलग हो गए. शत्रुघ्न सिन्हा कभी आप तो कभी आरजेडी वगैरह के साथ दिखते हैं और सरकार के ख़िलाफ़ कुछ बोल जाते हैं. वरुण खुल कर तो कुछ नहीं बोलते, लेकिन थोड़ा अलग-थलग ज़रूर दिखते हैं. असल बात ये है कि भाजपा दोनों में से किसी के ख़िलाफ़ एक्शन लेकर उन्हें हीरो नहीं बनाना चाहती."

    शेखर अय्यर को लगता है पार्टी का रवैया अगले आम चुनाव में "टिकट देते समय सबको साफ़ तौर पर दिख जाएगा".

    'ख़ामोश' शत्रुघ्न सिन्हा के बोल

    बात शत्रुघ्न सिन्हा की हो तो वे एक लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी कैबिनेट के ख़िलाफ़ 'मसखरी भरे' लेकिन चुभने वाले ट्वीट करते रहे हैं.

    मिसाल के तौर पर संसद सत्र के दौरान मोदी की विदेश यात्रा पर उन्होंने ट्वीट किया था, "आसमान फट नहीं जाता अगर पीएम संसद सत्र पूरा होने के बाद अफ़्रीका जाते."

    कर्नाटक विधान सभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि, "प्रधानमंत्री बनने से कोई देश का सबसे ज्ञानी नहीं बन जाता."

    ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे जिनका निष्कर्ष यही निकलता है कि मौजूदा भाजपा में न तो शत्रुघ्न सिन्हा के लिए कोई ख़़ास जगह है और न ही शत्रुघ्न सिन्हा के दिल में मौजूदा भाजपा नेतृत्व के प्रति.

    रविवार को ही भाजपा के केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने सिन्हा को '​सभी का मंच शेयर कर लेने वाला​' बताया.

    हालाँकि शत्रुघ्न सिन्हा से ही मिलता-जुलता एक उदाहरण पूर्व भाजपा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू भी हैं, लेकिन वे पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं और फ़िलहाल पंजाब कैबिनेट में मंत्री हैं.

    'नाख़ुश' वरुण

    लौटते हैं वरुण गाँधी पर जिन्होंने नरेंद्र मोदी या अमित शाह की कभी भी खुलकर आलोचना नहीं की है.

    वरुण गाँधी
    AFP
    वरुण गाँधी

    लेकिन वरुण गाँधी के रवैये से हमेशा यही लगा है कि वे अपनी ही पार्टी की सरकार से नाख़ुश हैं.

    वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामशेषन के मुताबिक़, "भाजपा में वरुण की जगह उस दिन से सिमटनी शुरू हो गई थी जिस दिन से पार्टी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पूरे प्रभाव में आई."

    उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने हाल ही में बताया था कि, @कुछ दिन पहले लखनऊ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में वरुण ने किसी शीर्ष नेता का नाम लिए बिना सरकारी नीतियों की धाज्जियाँ उड़ा दी थीं.'

    दरअसल वरुण ने अपने परदादा जवाहरलाल नेहरू की तारीफ़ करने के अलावा देश में किसानों का ख़स्ताहाल और एक बड़े उद्योगपति का बैंक कर्ज़ा चुकाए बिना देश से निकल जाने की निंदा की थी.

    हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. वैसे भी 2017 की भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी इलाहाबाद में हुई थी और पार्टी के कुछ नेताओं ने मुझसे 'वरुण के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल" होने की बात कही थी.

    इलाहाबाद हवाई अड्डे से लेकर बैठक के स्थान तक रातोंरात वरुण गाँधी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के पोस्टर भी लगे मिले थे.

    जब चुनाव आए तो वरुण को "प्रचार तक के लिए नहीं कहा गया".

    बहरहाल, रविवार को वरुण गाँधी से बात नहीं हो सकी क्योंकि अम्बाला से लौटने के बाद उनकी 'तबीयत थोड़ी ढीली" है और सोमवार को उन्हें एक और एक और सम्बोधन देने भोपाल निकलना है.

    सवाल बड़ा लगता है कि आखिर वरुण और शत्रुघ्न भाजपा की इस अहम बैठक में क्यों नहीं गए.

    शत्रुघ्न सिन्हा ने तो अरविन्द केजरीवाल के साथ मंच पर बैठ कर अपना जवाब फिर से देने की कोशिश की है.

    वरुण शायद अगले आम चुनावों तक अपने पत्ते न खोलने का मन बनाकर बैठे हैं.

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Where were Varun Gandhi and Shatrughan Sinha among the National Executive

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X