सिंधुताई काग़ज़ पर लिखी कविता के लिए जब नेवले से लड़ गईं
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता सिंधुताई सपकाल का सोमवार यानी 4 जनवरी, 2022 को निधन हो गया. 75 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली. उनका पुणे के गैलेक्सी अस्पताल में इलाज चल रहा था.
पूरे महाराष्ट्र में अनाथों की माता के रूप में जानी जाने वाली सिंधुताई की जीवन यात्रा बहुत कठिन थी. उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी कहानी खुद बयां की थी. उन्हीं के शब्दों में हम उनके संघर्षों की कहानी आपको बता रहे हैं-
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जब मेरी माँ को पता चला कि मैं घर में विद्रोह करके स्कूल जाना चाहती थी तो उन्होंने मेरी शादी करने का फ़ैसला किया. शादी के समय मैं दस साल की थी. मेरे पति की उम्र 35 साल थी. दुर्भाग्य से, मेरे पति को यह सहन नहीं था कि मैं पढ़ूं-लिखूं. वह शिक्षित नहीं थे. वे पढ़ नहीं सकते थे और उनकी पत्नी पढ़ सकती थी, इस बात पर उन्हें काफ़ी गुस्सा था, वे मुझे पढ़ते हुए देखना सहन नहीं कर पाते थे, मार-पीट करने लगते थे.
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उस वक़्त मैं किस तरह से पढ़ने की कोशिश करती? उन दिनों किराना दुकानों पर पर्ची मिलती थी, एक तरफ लिखा होता था, उसे पढ़ती और दूसरी तरफ के हिस्से पर लिखने की कोशिश करती, क्योंकि पढ़ने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था. ससुराल में हर वक़्त लोग मेरी निगरानी किया करते थे. मेरे पति से कहा जाता था कि तुम्हारी पत्नी काम नहीं कर रही है, पढ़ने का नाटक कर रही है.
ऐसे माहौल में, मैं इन काग़ज़ों को घर के अंदर मौजू चूहे के बिल में छुपा देती थी. लेकिन जब चूहा अंदर जाता था तो वह कागज अंदर तक धकेल देता था. एक दिन मुझे घर में एक बड़ा चूहा दिखा और उसका बिल भी बड़ा था. लेकिन वह चूहे का बिल नहीं था, वह नेवला का बिल था.
नेवला और सांप दुश्मनी के बारे में आप लोग जानते हैं. एक दिन मैंने एक काग़ज़ उसी नेवले के बिल में छिपा दिया. उस कागज पर मराठी के कवि गजानन दिगंबर माडगूलकर (गदीमा के नाम से मशहूर) की कविता थी. उस कविता का भाव कुछ ऐसा था कि औरतें जब पानी भरने के लिए घर से बाहर जाए, तब कुछ पढ़ना सीख लें, क्योंकि घर में तो पढ़ना संभव नहीं था.
नेवला ने सोचा कि ये काग़ज़ उसका दुश्मन है. जब मैंने काग़ज़ निकालने के लिए हाथ डाला उसने मेरे हाथ को सांप की तरह महसूस किया. उसने मेरे बाएं हाथ की छोटी ऊंगली पकड़ ली, आज भी मेरी उंगली टेढ़ी है. नेवला ने मेरी ऊंगली ना केवल काट ली बल्कि उसे पकड़ भी लिया लेकिन मैंने काग़ज़ नहीं छोड़ा. काग़ज़ के साथ ही मैंने नेवला बाहर निकाला. मुझे पढ़ने की भूख थी. उस कविता पर खून की धार टपक रही थी. तो पढ़ने के लिए एक तरह से नेवला के साथ लड़ाई भी की और अपना ख़ून भी बहाया.
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'मां नहीं चाहती थी कि मैं पढ़ूं-लिखूं'
मेरी मां नहीं चाहती थी कि मैं पढ़ लिख पाऊं. वह मुझे भैंस चराने के लिए भेजती थी. जब भैंस पानी में चली जाती थी तो मैं स्कूल चली जाती थी. लेकिन ऐसा करने में समय का ध्यान नहीं होता था, देर से स्कूल पहुंचने पर टीचरों से डांट सुनने को मिलती थी.
एक दिन भैंस पानी से निकल कर किसी के खेत में चली गई, उस किसान ने स्कूल में आकर कहा कि उनकी फ़सल मेरी भैंस चर गई है. तब मेरे शिक्षक को पूरी बात का पता चला, उन्हें बेहद बुरा लगा. उनका नाम था वन्दिले. लेकिन वे मेरी लगन से प्रभावित हुए, उन्होंने बिना परीक्षा दिए ही मुझे चौथी कक्षा में पास कर दिया था.
मैं 20 साल की थी, पति ने मार-पीट कर घर से निकाल दिया था, नाते रिश्तेदारों की कोई मदद नहीं मिली. पिता का निधन हो चुका था और मां ने भी घर में जगह नहीं दी. मेरी गोद में 10 दिन की बच्ची थी. मैं भीख मांगती थी, गाने गाती थी और जैसे तैसे रह रही थी.
गाय-भैंस के बाड़े में रहते हुए संघर्ष शुरू किया था. मैंने वहीं से गोबर फेंकने के लिए मजदूरी पाने का संघर्ष किया था. मेरी मांग थी कि हम गोबर को एकत्रित करके जंगल में ले जाते हैं, हमें गोबर उठाने की मज़दूरी मिलनी चाहिए. उस समय वर्धा में रंगनाथन कलेक्टर थे उन्होंने मुझे न्याय दिया. मैंने उन्हें लिख कर शिकायत की थी कि हमें तनख्वाह नहीं मिलती, रंगनाथन कलेक्टर इस मांग पर सहमत हो गए और इस तरह हमें न्याय मिला था.
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