जब एक बूंद पानी के लिए तरसने लगेंगे लोग

पटना (मुकुंद सिंह)। पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि संसार के दो तिहाई हिस्सों में पानी ही पानी भरा है तो भला इसकी कमी कैसे होगी। बताना जरूरी होगा कि मानवीय जीवन जिस पानी से चलता है उसकी मात्रा पूरी दुनिया में पांच से दस फीसदी से ज्यादा नहीं है। नदियां सूख रही हैं, ग्लेशियर सिकुड़ रहे है, झीलें और तालाब लुप्त हो चुके हैं। कुएं, कुंड और बावडियो का रखरखाव नहीं हो रहा है। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम होता जा रहा है। कुल मिलाकर हालत चिंताजनक है।

When people will not have a drop of water

आंकड़े कहते हैं कि अब भी चेतो और पानी को बचा लो, अन्यथा पूरी धरती बंजर हो जाएगी। विश्व बैंक की रिपोर्ट का कहना है कि अगले कुछ वर्षों में भारत में पानी को लेकर त्राहि त्राहि मचने वाली है। ऐसे में सब कुछ होगा लेकिन हलक के नीचे दो घूंट पानी उतारना मुश्किल हो जाएगा। देश में जल दर्शन के कई उत्कृष्ट उदाहरण है, नदियों और जल स्रोतों की पूजा की परंपरा और बहुत से मान्यताओं के बावजूद आज हमारा जल संकट में है। नदी, तालाब, झरने को हम पहले ही प्रदूषण की भेंट चढ़ा चुके हैं, जो शेष मात्र है उसे अपनी मिल्कियत समझकर खर्च कर रहे हैं।

इसके समाप्त हो जाने के बाद चारों ओर हाहाकार का के जो दृश्य उपस्थित होंगे उसकी कल्पना भी सिहरन पैदा करती है। पानी के लिए संबंधित तृतीय विश्व युद्ध तो बाद की बात है, हम अपने मध्य ऐसे घमासान के भागीदार होंगे कि विश्वयुद्ध का दर्शक बना भी हमें नसीब नहीं होगा। हजारों साल पहले देश में जितना पानी था वह तो बढा नहीं, लेकिन जनसंख्या कई गुना बढ़ गई। पानी के स्रोत भी अक्षय नहीं हैं ,लिहाजा उन्हें एक दिन खत्म होना है। ऐसे में पानी को लेकर गंभीर होने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है।

आपको बताते चलें की विधानसभा के चालू सत्र के दौरान पेयजल के लिए हंगामा हुआ और सदन की कार्यवाही रोकनी पड़ी और हाल में प्रधानमंत्री ने भी अपने मन की बात के दौरान पानी के संकट की विस्तार से चर्चा किया था। इन सबके बीच समाज ने शायद ही कभी सोचा कि अगर दुनिया में पानी खत्म हो गया ,तो क्या होगा ।कैसा होगा तब हमारा जीवन। आमतौर पर ऐसे सवालों को हम कंधे उचकाकर अनसुना कर देते हैं और यह मान लेते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा। पर्यावरण विज्ञानी चिल्ला चिल्ला कर कहते रहे हैं कि पानी बचाओ, लेकिन इस और ताकने की फुर्सत नहीं है। जबकि तर्को तथ्य और हकीकत के धरातल पर अब महसूस होने लगा है कि पानी के मामले में हम खतरनाक हालत की ओर बढ़ रहे है।

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