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क्या था Roshni Act,जिसकी आड़ में तीन दशकों तक J&K में चले जमीन घोटाले की जांच करेगी CBI

नई दिल्ली- जम्मू-कश्मीर में 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन गैरकानूनी रूप से हड़पने के मामले में प्रदेश के कई बड़े राजनेता, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी और बिजनेसमैन पर सीबीआई का शिकंजा कस सकता है। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस गड़बड़ी को 'बेशर्म' और 'राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचाने वाला' बताते हुए सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। हो सकता है कि जांच के बाद यह जम्मू-कश्मीर के अब तक का सबसे बड़े जमीन घोटाले के रूप में सामने आए। दरअसल, यह मामला जम्मू एंड कश्मीर स्टेट लैंड (वेस्टिंग ऑफ ओनिरशिप टू द ऑक्यूपेंट्स) ऐक्ट, 2001 से जुड़ा है, जिसे हाई कोर्ट ने 'आरंभ से शून्य' (void ab initio) करार दे दिया है। जम्मू-कश्मीर में यह विवादास्पद कानून 'रोशनी ऐक्ट' के नाम से चर्चित रहा है।

What was Roshni Act, under which the guise of plunder of land in Jammu and Kashmir for three decades

जम्मू-कश्मीर में तीन दशक से ज्यादा वक्त तक 'रोशनी ऐक्ट' की आड़ में हुई सरकारी जमीन की बंदरबांट के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश के बाद राज्य के कई बड़े मौजूदा और पूर्व राजनेता और बड़े अधिकारियों पर गाज गिर सकती है। क्योंकि, हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया 'बड़े सरकारी अधिकारियों' को सार्वजनिक जमीनों को गैर-कानूनी तरीके से निजी मालिकों के हाथों में अतिक्रमण होने देने का दोषी माना है। इसने केंद्रीय जांच ब्यूरो को इनकी 'गुनाहों' की जांच करने का आदेश दिया है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस जांच के आगे बढ़ने पर इसके दायरे में राज्य के कम से कम दो पूर्व मुख्यमंत्री भी आ सकते हैं। ये हैं नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद।

दरअसल, यह विवादास्पद कानून 2001 में फारूक अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के दौरान लागू हुआ था। अब उच्च अदालत ने इसके बाद से अब तक 'अतिक्रमण' करने वालों के हाथों में गैरकानूनी तरीके से सौंपी गई सभी सरकारी जमीन वापस लेने का आदेश दिया है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने सीबीआई डायरेक्टर को इसकी जांच के लिए एसपी रैंक के पुलिस अफसरों से कम की टीम नहीं बनाने को कहा है और गहराई से जांच के बाद मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया है। रोशनी ऐक्ट के तहत तत्कालीन राज्य सरकार का लक्ष्य 20 लाख कनाल सरकारी जमीन अवैध कब्जेदारों के हाथों में सौंपना था, जिसकी एवज में सरकार बाजार भाव से पैसे लेकर 25,000 करोड़ रुपये की कमाई करती।

गौरतलब है कि रोशनी ऐक्ट सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए बनाया गया था। इसके बदले उनसे एक रकम ली जाती थी, जो सरकार तय करती थी। 2001 में फारूक अब्दुल्ला सरकार ने जब ये कानून लागू किया था, तब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष निर्धारित किया गया था। लेकिन, उसके बाद की हर सरकारों ने इस कट ऑफ साल को बढ़ाना शुरू कर दिया, जिसकी आड़ सरकारी जमीन की बंदरबांट की आशंका जताई जा रही है। कोर्ट ने कहा है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद (2004) और गुलाम नबी आजाद (2007) की सरकारों ने इस कानून में और संशोधन किए ताकि, गैर-कानूनी रूप से जमीन हथियाने वालों को फायदा पहुंचाई जा सके।

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों और सतर्कता अधिकारियों को 'लूट की' इस नीति के प्रति आंखें मूंदकर अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोताही बरतने के लिए जमकर लताड़ लगाई है। अदालत ने सरकारी जमीन पर गैर-कानूनी कब्जा करने वालों को लेकर कहा है कि इन लुटेरों की सत्ता में इतनी गहरी पैठ रही है कि यह अपने फायदे के लिए कानून भी बनवा सकते थे। अदालत ने यह भी आशंका जताई है कि जिस तरह से जमीन के ये लुटेरे प्रभावी रहे हैं, उससे लगता है कि उन्होंने नीति निर्धारण से लेकर उसके लागू करवाने तक में हर स्तर पर भूमिका निभाई है। अदालत की ऐसी टिप्पणी उन राजनेताओं के लिए भी सख्त संकेत हैं, जिनके कार्यकाल में ऐसे कानून बनाए गए हैं। अदालत ने यहां तक टिप्पणी की है कि उसने अबतक ऐसी आपराधिक गतिविधि नहीं देखी है, जिसमें सरकार ने राष्ट्रीय और जनता के हित को ताक पर रखकर कोई कानून बनाया हो और जनता के खजाने और पर्यावरण को होने वाले नुकसान का कोई आंकलन भी नहीं किया गया हो।

बता दें कि इस विवादित कानून को नवंबर,2018 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मलिक ने खत्म कर दिया था।

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