ऐसे कभी लोकसभा में मजबूत नहीं हो पाएगी 'आप आदमी पार्टी'
विधानसभा चुनाव में मिली सफलता को आम चुनाव में फिर से दोहराने का सपना देख रही आम आदमी पार्टी ने भले ही लेाकसभा की 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया हो, लेकिन अभी अपने मुद्दे सार्वजनिक नहीं किये हैं। 'आप' को दिल्ली में मिली सफलता का आधार बिजली, पानी और भ्रष्टाचार था, लेकिन पूरे देश की समस्याएं यही नहीं हैं, भ्रष्टाचार के नाम पर 'आप' से शिक्षित और जागरूक लोग तो जुड़ रहे हैं, पर भारत के गांवों और कस्बों में रहने वाले लोगों पर क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टियों का ही प्रभाव है। ऐसे में उन्हें उखाड़ फेंकना 'आप' के लिए आसान नहीं होगा।
दिल्ली में चुनावी सफलता पाने वाली 'आप' ने चुनाव से पहले सघन प्रचार किया था, जिससे कि जनता उनके साथ खुद को जोड़ सकी लेकिन लोकसभा चुनाव मई 2014 में प्रस्तावित हैं, जिसके प्रचार के लिए 'आप' के पास लगभग साढ़े तीन महीनें ही हैं, वहीं एक वर्ग का यह भी कहना है कि केजरीवाल की सफलता का गुणगान सिर्फ मीडिया द्वारा ही किया जा रहा है, सर्वाधिक वोट करने वाले आम वोटर तक 'आप' का पहुंचना पार्टी नेताओं के लिए आसान नहीं है। इस समय अगर जनता में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए उत्साह है और उनकी रैलियों में भीड़ बढ़ रही है तो इसका कारण उनकी व्यक्तिगत छवि है जो कि गुजरात में हुए विकास के कारण बनी है।
कहा यह भी जा रहा है कि 'आप' विधानसभा चुनाव की सफलता का दोहन करना चाह रही है और लोकसभा चुनाव में उतरने में जल्दबाजी कर रही है। उनके पास ऐसा कोई सैंपल नहीं जिसके आधार पर वह आम जनता के बीच खुद को भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकें। इसके अलावा दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन लेना भी उनके खिलाफ जा सकता है।
देखें ऐसे कौन से कारण हैं जिन पर 'आप' को काम करने की जरूरत है-

केजरीवाल के अलावा अन्य कोई नहीं
आम आदमी पार्टी में इस समय बड़े नेता के तौर पर केजरीवाल के अलावा अन्य कोई नहीं है और वह पहले ही लेाकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि देश की जनता सिर्फ केजरीवाल के नाम पर नये चेहरों का समर्थन कैसे करेगी।

'आप' के पास मुद्दों की कमी
यह एक बड़ा सवाल है कि क्या सिर्फ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता 'आप' समर्थन करेगी। वहीं केजरीवाल भी अभी 'टेस्टिंग पीरियड' से गुजर रहे हैं और उन्हें खुद को बेहतर प्रशासक के रूप में साबित करना है। 'आप' को प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में जाकर लोगों से बात करनी होगी और उन्हें विश्वास दिलाना होगा।

देश के विकास के लिए रोडमैप
अभी हाल ही में अपनी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि हम बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महंगाई को नहीं रोंक सके। अब 'आप' को लोकसभा चुनाव में उतरने पर इन सवालों के जवाब ढूंढने होंगे और अपनी नीतियां स्पष्ट करनी होंगी।

विदेश नीति के बारे में बताना
यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें 'आप' को आम जनता को नहीं बल्कि देश के प्रबुद्ध वर्ग के सामने खुद को साबित करना होगा। यूपीए के पिछले एक दशक के कार्यकाल में यह एक ऐसा पहलू रहा है जब केंद्र सरकार को कई बार शर्मिंदा होना पड़ा है। 'आप' को बताना होगा कि उनके पास ऐसे कौन लोग हैं, जो इन मुद्दों पर जानकारी रखते हैं और उनकी नीतियां क्या होंगी।

पूरे देश को कैसे कवर करेंगे
दिल्ली एक राज्य है जो कि 70 विधानसभा सीटों तक ही सीमित है, पर दो सौ लोकसभा सीटों पर प्रचार करने के लिए फंड और यात्रा करने के लिए समय चाहिए। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या चुनाव प्रचार के लिए जरूरी फंड पार्टी को इतने कम समय में मिल पाएगा।

आतंकवाद और नक्सलवाद
देश के सामने सीमा सुरक्षा के साथ ही आतंकवाद और नक्सलवाद एक बड़ी समस्या है। जिसे खत्म करने के लिए एक प्रभावी नीति की जरूरत है। इसके बारे में 'आप' को जनता को जानकारी देनी होगी।












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