एस्ट्राजेनेका की कोरोना वैक्सीन से क्या दिमाग में खून के थक्के बनने का खतरा है?

बीबीसी स्वास्थ्य एवं वित्ज्ञान संवाददाता
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बीबीसी स्वास्थ्य एवं वित्ज्ञान संवाददाता

ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले कई लोगों के मस्तिष्क में असामान्य रूप से ख़ून के थक्के पाए गए हैं.

वैक्सीन लेने के बाद कई लोगों में "सेरिब्रल वीनस साइनस थ्रॉम्बोसिस" (सीवीएसटी) यानी मस्तिष्क के बाहरी सतह पर ड्यूरामैटर की परतों के बीच मौजूद शिराओं में ख़ून के थक्के देखे गए हैं.

ऐसे कुछ मामले सामने आने के बाद जर्मनी समेत फ्रांस और कनाडा ने एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन पर सीमित पाबंदी लगा दी है.

हॉप्किन्स मेडिसिन्स के अनुसार सीवीएसटी के कारण रक्त कोशिकाएं टूट सकती हैं जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं में ख़ून लीक हो सकता है जिससे ब्रेन हेमरेज की ख़तरा हो सकता है.

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने कहा है कि वैक्सीन के ख़तरों के मुक़ाबले इससे होने वाले फ़ायदे कहीं अधिक हैं.

विश्वभर के वैज्ञानिक और दवाई सुरक्षा नियामक ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ब्रेन स्ट्रोक वाकई वैक्सीन के कारण ही हो रहे हैं. ये कितना बड़ा ख़तरा हो सकता है और कोरोना टीकाकरण कार्यक्रम के लिए इस ख़तरे के क्या मायने हो सकते हैं.

क्या वैक्सीन के कारण जम रहे हैं ख़ून के थक्के?

अब तक की बात करें तो इसके बारे में पुख्ता तौर पर अभी कोई जानकारी नहीं है.

वैक्सीन सुरक्षा से संबंधित सेफ्टी डेटा की समीक्षा कर रही यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी का कहना है कि "अब तक ऐसा कुछ साबित नहीं हुआ है लेकिन ये संभव है."

एजेंसी फिलहाल ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या मस्तिष्क में ख़ून के थक्के जमना वैक्सीन का साइड-इफेक्ट है या फिर संयोग से प्राकृतिक रूप से आए हैं.

लेकिन ये समस्या इतनी दुर्लभ है कि इसका पता लगाना इतना आसान भी नहीं है.

इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए मैंने कुछ जानेमाने वैज्ञानिकों से बात की. इनमें से कई वैज्ञानिक इस संभावना को खारिज करते हैं जबकि कई इस बात से सहमत हैं कि वैक्सीन से ख़ून के थक्के जमने का ख़तरा हो सकता है.

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये अजीब तरह के ख़ून के थक्के हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कुछ गड़बड़ हो सकती है.

ख़ून के ये थक्के उस वक्त दिखना शुरू होते हैं जब ख़ून में प्लेटलेट्स की संख्या कम होने लगती है. ख़ून के थक्कों में प्लेटलेट्स अधिक संख्या में होते हैं. इसी समय ख़ून के थक्के जमने से जुड़ी समस्या से निपटने के लिए एंटीबॉडी दिखने लगते हैं.

लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं और जो मामले नज़र आए हैं, उनमें इसका कारण कोविड-19 हो सकता है. कोरोना वायरस संक्रमण के कई मामलों में ख़ून के थक्के जमना भी एक लक्षण होता है.

ये कितना बड़ा ख़तरा हो सकता है?

कहा जा सकता है कि अब तक ये साबित नहीं हुआ है कि वैक्सीन लगवाने के कारण ही मस्तिष्क में ख़ून में थक्के बने हैं. ऐसे में ये संभव है कि वैक्सीन के कारण इसका कोई ख़तरा न हो.

जर्मनी के पॉल अर्लिच इंस्टीट्यूट ने अनुसार, अब तक 27 लाख लोगों को कोरोना की वैक्सीन दी गई है जिनमें से 31 मामलों में सेरिब्रल वीनस साइनस थ्रॉम्बोसिस के मामले दर्ज किए गए हैं और इस कारण 9 मौतें हुई हैं.

ब्रिटेन के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि जिन 180 लाख लोगों को वैक्सीन लगाई गई है, उनमें से मस्तिष्क में ख़ून के थक्के जमने के 30 मामलों में मरीज़ों में प्लेटलेट्स की संख्या बेहद कम पाई गई और इस कारण 7 लोगों की मौत हुई है.

दुनियाभर में टीकाकरण से जुड़े आंकड़ों की समीक्षा करने के बाद यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने बताया है कि एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन लगवाने वाले 60 साल की उम्र तक के एक लाख लोगों में से एक व्यक्ति में सेरीब्रल वीनस साइनस थ्रॉम्बोसिस यानी सीवीएसटी देखा गया है.

एजेंसी की वैक्सीन सेफ्टी प्रमुख डॉक्टर पीटर आर्लेट का कहना है, "जितनी उम्मीद थी ये उससे अधिक है."

हालांकि अब तक ये नहीं पता कि जिन मामलों में मस्तिष्क में ख़ून के थक्के पाए गए, उनमें से कितने मामलों में पहले से ही मरीज़ को कोई समस्या थी.

इस संबंध में वैज्ञानिक अलग-अलग आकलन देते हैं. कुछ मानते हैं कि प्रत्येक 10 लाख में से दो मामलों में सामान्य तौर पर ख़ून के थक्के पाए जा सकते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि प्रत्येक 10 लाख में से 16 मामलों में ऐसा हो सकता है. हालांकि इसका कारण कोरोना वायरस भी हो सकता है.

ब्रिटेन और जर्मनी के आंकड़ों में फ़र्क क्यों?

अगर वाकई में कोरोना वैक्सीन लगवाने के कारण सीवीएसटी के मामले सामने आ रहे हों तो उम्मीद की जा सकती है कि अलग-अलग देशों में ये मामले वैक्सीन के अनुपात के अनुसार ही दिखेंगे.

लेकिन जर्मनी के मुक़ाबले ब्रिटेन ने सात गुना अधिक लोगों को कोरोना की वैक्सीन दी है. इसके बावजूद वहां और जर्मनी में दर्ज किए गए सीवीएसटी के मामले लगभग बराबर हैं.

इसकी एक दलील ये दी जे रही है कि जिन लोगों को वैक्सीन दी गई है वो अलग-अलग उम्र के हैं.

ब्रिटेन में सबसे पहले बुज़ुर्गों को वैक्सीन लगाई गई जिसके बाद उनसे कम उम्र के लोगों को वैक्सीन दी जा रही है. वहीं 65 साल से अधिक उम्र के लोगों में वैक्सीन के असर को लेकर ट्रायल डेटा न होने के कारण जर्मनी ने पहले बुज़ुर्गों को वैक्सीन देने से इनकार कर दिया.

जर्मनी में जितने लोगों को कोरोना वैक्सीन दी गई है, उनमें से 90 फीसदी लोगों को एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन दी गई है और माना जा रहा है कि इनमें से अधिकतर 60 साल से कम उम्र के हैं.

युवाओं में आम तौर पर रोग प्रतिरोधक शक्ति अधिक होती है और इनमें वैक्सीन के साइड इफेक्ट गंभीर रूप ले सकते हैं. माना जा रहा है कि ब्रिटेन में वैक्सीन के साइड इफेक्ट के मामले कम होने की ये एक बड़ी वजह हो सकती है.

लेकिन युवा महिलाओं में सीवीएसटी की समस्या अधिक देखी जाती है ख़ास कर जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां लेती हैं, उनमें इसका ख़तरा बढ़ सकता है. ऐसे में भले ही लोगों को वैक्सीन दी जाए या नहीं, प्राकृतिक कारणों से भी मस्तिष्क में ख़ून के थक्के जमने का ख़तरा हो सकता है.

इसके सही कारणों का पता लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी ने कहा है कि उम्र, लिंग या फिर मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर इसे लेकर किसी तरह का ख़ास ख़तरा नहीं पाया गया है.

एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन
REUTERS/Yves Herman
एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन

तो क्या एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन सुरक्षित है?

मेडिसिन की बात करें तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सभी दवाएं सुरक्षित होती हैं. कभी-कभी तो सही स्थिति को देखते हुए डॉक्टर घातक ज़हर का इस्तेमाल भी दवा के तौर पर करते हैं.

कीमोथैरपी में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के गंभीर साइड-इफेक्ट्स होते हैं, लेकिन ये बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. यहां तक कि पैरासिटामोल और आइबूप्रोफ़ेन के भी गंभीर साइड-इफ्केट हो सकते हैं, लेकिन बीमारी को देखते हुए ये दवाएं देना ज़रूरी हो जाता है.

असल में दवा देने का फ़ैसला इस बात पर निर्भर करता है कि इससे होने वाला लाभ, इससे होने वाले नुक़सान से अधिक है या नहीं.

महामारी के दौर में ये काम और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है. आम तौर पर दवाएं "ऐहतियात के सिद्धांत" पर काम करती हैं यानी जब तक दवा की सुरक्षा साबित नहीं हो जाती, अधिक लोगों को नहीं दी जाती.

लेकिन महामारी के दौर में लोगों को वैक्सीन देने में देरी करने का मतलब होता अधिक ज़िंदगियों को ख़तरे में डालना.

केवल जर्मनी के आंकड़ों को देखा जाए तो आप कह सकते हैं कि 10 लाख लोगों में से 12 लोगों में मस्तिष्क में ख़ून के थक्के दिखने की संभावना हो सकती है और इस कारण चार की मौत हो सकती है.

लेकिन अगर 60 साल से अधिक की उम्र के लोगों में, दस लाख लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण हो जाता है तो कोविड-19 के कारण उनमें से 20,000 की मौत हो सकती है.

और अगर 40 साल से अधिक की उम्र वाले दस लाख लोग कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं तो कोविड-19 के कारण इनमें से 1,000 की मौत हो सकती है. तीस की उम्र के लोगों की बात करें तो मौतों का आंकड़ा कुछ सौ तक ही होगा.

स्पष्ट तौर पर कोरोना की वैक्सीन का फायदा अधिक उम्र वालों में दिखता है और जर्मनी और कनाडा जैसे देशों में अधिक उम्र वाले नागरिकों के लिए एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी गई है.

किसी देश के लिए ये फ़ैसला इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास वैक्सीन के कौन से विकल्प मौजूद हैं और उनके सामने किस उम्र के नागरिकों को वैक्सीन देने की ज़रूरत है.

इस संबंध में एकत्र किए गए डेटा की गहन समीक्षा की जा रही है, लेकिन इस बारे में स्पष्ट जानकारी मिलने का अभी हमें इंतज़ार करना होगा.

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