रफ़ाल पर सीएजी की फटकार से मोदी सरकार की नई रक्षा ख़रीद नीति का क्या है सरोकार

रफ़ाल पर सीएजी की फटकार से मोदी सरकार की नई रक्षा ख़रीद नीति का क्या है सरोकार

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद करने के बाद, अब सरकार ने रक्षा ख़रीद की नई नीति की घोषणा की है.

केंद्र सरकार का कहना है कि नए फ़ैसले से 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना बेहतर तरीक़े से साकार हो पाएगा.

नई रक्षा ख़रीद प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करते हुए हथियारों और सैन्य सामान को किराए (लीज) पर लेने का विकल्प खोल दिया गया है.

इस बदलाव के बाद अब लड़ाकू हेलिकॉप्टर, मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट, नौसैनिक जहाज़ को देश-विदेश से भी अनुबंध पर लेने का रास्ता खुल गया है. बड़े रक्षा सौदों में ऑफ़सेट कॉन्ट्रैक्ट की बाध्यता को भी लगभग ख़त्म कर दिया गया है.

केंद्र सरकार की दलील है कि रक्षा सौदे में ऑफ़सेट क्लॉज़ की वजह से रक्षा उपकरणों की ख़रीद के लिए भारत को ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ते थे. अब इनकी क़ीमत कम हो जाएगी.

नई नीति पर रफ़ाल का असर

दरअसल रक्षा सौदों की ऑफ़सेट नीति को लेकर ज़्यादा चर्चा तब शुरू हुई, जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी ) ने रफ़ाल ख़रीद में फ्रांस की कंपनी द्वारा ऑफ़सेट करार पूरा ना करने की बात कही.

संसद के इसी मॉनसून सत्र में रक्षा सौदों पर सीएजी रिपोर्ट पेश की गई थी.

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सीएजी का कहना है कि फ़ाइटर जेट रफ़ाल के निर्माताओं ने भारत के साथ रक्षा सौदे के तहत जिन ऑफ़सेट दायित्वों को पूरा करने की बात कही थी, उन्हें पूरा नहीं किया है और ना ही अब तक भारत को किसी उच्च स्तरीय तकनीक की पेशकश की गई है.

इतनी ही नहीं सीएजी ने कहा ये भी कहा कि उसे विदेशी विक्रेताओं की ओर से ऑफ़सेट क्लॉज़ के तहत भारतीय उद्योगों को उच्च तकनीक ट्रांसफ़र करने का एक भी मामला नहीं मिला है.

इसलिए रक्षा उपकरणों की नई ख़रीद प्रक्रिया में जब ऑफ़सेट नियमों में बदलाव की बात कही गई, तो इसे सीएजी की रिपोर्ट से जोड़ कर देखा जा रहा है.

क्या है ऑफ़सेट नीति?

जब भी भारत रक्षा से जुड़े कोई भी सैन्य उपकरण विदेशी कंपनी से ख़रीदता हैं, तो फ़ॉरेन एक्सचेंज में ये ख़रीददारी होती है.

ऐसे में भारत की कोशिश रहती है कि जितनी बड़ी रकम वो उपकरण ख़रीदने में ख़र्च करता है, उसका कुछ हिस्सा विदेशी कंपनी भारत में भी ख़र्च करे. किसी भी रक्षा सौदे में ऐसे करार को 'ऑफ़सेट क्लॉज़' कहा जाता है.

विदेशी कंपनियाँ भारत में कल-पुर्ज़ों की ख़रीद या फिर शोध और विकास केंद्र स्थापित कर यह ख़र्च कर सकती हैं. नियमों के मुताबिक़ रक्षा, आंतरिक सुरक्षा और नागरिक उड्डयन क्षेत्रों पर ये ख़र्च किया जा सकता है.

भारत में पहली रक्षा ख़रीद प्रक्रिया साल 2002 में आई थी, जिसमें ऑफ़सेट क्लॉज़ का ज़िक्र किया गया था.

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आसान शब्दों में कहें तो रक्षा सौदे की एक निश्चित राशि को ख़रीदने वाले देश (यहाँ के संदर्भ में भारत) में ही ख़र्च करना ऑफ़सेट कहलाता है.

ऑफ़सेट क्लॉज़ ज़्यादा बड़ी रक्षा डील का हिस्सा होते हैं. मसलन डील अगर 300 करोड़ से ज़्यादा की है, तो उसका 30 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा (जैसा भी तय हो) भारत में ही ख़र्च हो, ऐसा भारत की कंपनी विदेश कंपनी से कह सकती है.

ऑफ़सेट नीति की दिक़्क़तें

रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी कहते हैं कि सरकार की नई नीति में उन्हें अमरीका की छाप दिखती है. उनके मुताबिक़ भारत चार देशों से ही ज़्यादातर रक्षा उपकरण ख़रीदता है - अमरीका, फ़्रांस, रूस और इसराइल.

रूस हमेशा से दो सरकारों के बीच ही रक्षा सौदा करता आया है. फ़्रांस में ऐसा चलन नहीं था, लेकिन अब वो भी इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट ही करता है. इसी तरीक़े से भारत ने रफ़ाल भी ख़रीदा है. इसराइल में प्राइवेट कंपनियों के साथ भी भारत डील करता है.

लेकिन अमरीका से भारत रक्षा सामान 'फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS)' प्रक्रिया के ज़रिए ही ख़रीद सकता है. मान लीजिए भारत को हेलिकॉप्टर ख़रीदना है, तो अमरीकी सरकार भारत के लिए एजेंट का काम करेगी और वहाँ की कंपनी से हेलिकॉप्टर ख़रीदने में मदद करेगी.

राहुल बेदी के मुताबिक़ अक्सर अमरीका को भारत से ख़रीद में 'ऑफसेट क्लॉज़' से दिक्कत होती थी. भारत में विदेशी कंपनियों के हिसाब से रक्षा उपकरण तैयार होते नहीं थे. इसलिए कंपनियाँ भारत के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती थी. दूसरी परेशानी ये थी कि कोई भी कंपनी अपनी तकनीक दूसरे के साथ शेयर नहीं करना चाहती थी.

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गज़ाला वहाब फ़ोर्स मैग़जीन की कार्यकारी संपादक हैं. 'फोर्स' रक्षा मामलों पर मासिक पत्रिका है. बीबीसी से बातचीत में गज़ाला कहती हैं, "शुरुआत में भारत में इतने कल-पुर्ज़े ही नहीं बन रहे थे, जो ये कंपनियाँ भारत से ख़रीद सकती, फिर बाद में इस क्लॉज़ में कुछ अन्य क्षेत्रों को भी जोड़ा गया. लेकिन उसके बाद भी विदेशी कंपनियों के लिए इस क्लॉज़ को पूरा करने में दिक़्क़त आ रही थी.

बाद में पता चला कि विदेशी कंपनियाँ ऑफ़सेट क्लॉज़ में जितना ख़र्च करना होता था, उपकरणों के दाम को उतना बढ़ा कर भारत को बताती थी. इस वजह से भारत को समान ख़रीदने में ज़्यादा बड़ी रकम ख़र्च करनी पड़ रही थी.

नि:शुल्क तकनीक के हस्तांतरण को भारत में पहले रक्षा ख़रीद प्रक्रिया में ऑफ़सेट क्लॉज़ का हिस्सा नहीं बनाया गया था. जिस भी उपकरण के साथ भारत को तकनीक चाहिए होती थी, तो भारत उसके लिए अलग डील साइन करता था. इसलिए विदेशों से कई हथियार ख़रीदने के बावजूद भारत को तकनीक कभी नहीं मिली.

सीएजी की रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है.

सीएजी के अनुसार, "2005 से मार्च 2018 तक विदेशी विक्रेताओं के साथ कुल 66,427 करोड़ रुपए के 48 ऑफ़सेट अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें से दिसंबर 2018 तक विक्रेताओं की तरफ़ से 19,223 करोड़ रुपए के ऑफ़सेट दायित्वों का निर्वहन किया जाना चाहिए था, लेकिन उनकी ओर से दी गई राशि केवल 11,396 करोड़ रुपए है, जो तय प्रतिबद्धताओं का केवल 59 प्रतिशत है."

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ऑफ़सेट क्लॉज़ में बदलाव

गज़ाला कहतीं है कि नई रक्षा ख़रीद प्रक्रिया में विदेश की प्राइवेट कंपनियों के साथ ख़रीदारी करने पर तकनीक के ट्रांसफर को ऑफ़सेट क्लॉज़ का हिस्सा बना दिया गया है. साथ ही ख़रीद को कई कैटेगरी में विभाजित कर दिया गया है.

मसलन अगर डीआरडीओ को तकनीक ट्रांसफ़र करेंगे, तो विदेशी कंपनी को अधिक इन्सेन्टिव मिलेगा, किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) को तकनीक ट्रांसफ़र करेंगे, तो कंपनी को थोड़ा कम इन्सेन्टिव मिलेगा और सबसे कम इन्सेन्टिव मिलेगा, अगर विदेशी कंपनियाँ भारत की प्राइवेट कंपनियों को तकनीक हस्तांतरित करती हैं.

दूसरा बदलाव ये किया है कि दो सरकारों के बीच अगर रक्षा उपकरण की ख़रीद होती है, तो उसमें ऑफ़सेट क्लॉज़ नहीं होगा. ये दोनों देशों के बीच का मसला होगा. ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कई बार किसी ख़ास देश से समान ख़रीदने का फ़ैसला रणनीतिक भी होता है.

स्पष्ट है कि दो सरकारों के बीच ख़रीदारी और किसी दूसरे देश की प्राइवेट कंपनी से ख़रीदारी दो अलग बातें हैं.

गज़ाला कहती हैं कि पहले बदलाव से भारत सरकार का कोई भला नहीं होने वाला. उनके मुताबिक़, "ना तो पहले की नीति सही थी और ना ही अब की नीति सही है. अलग अलग कैटेगरी बना कर भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों को बता दिया कि वो एक ख़ास कंपनी को पक्ष लेती है. विदेशों में रक्षा उपकरण बनाने वाली अधिकतर कंपनियाँ प्राइवेट होती हैं, जिसपर सरकार का नियंत्रण होता है और कुछ हद तक हिस्सेदारी भी. ऐसा इसलिए भी क्योंकि रक्षा उपकरणों के ख़रीद का मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा होता है."

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"दुनिया में भारत का मॉडल बिल्कुल अलग है. भारत में रक्षा उपकरण बनाने वाली सरकारी और प्राइवेट कंपनियाँ बिल्कुल अलग तरह से काम करती हैं. विदेश की कंपनियाँ भारत की सरकारी कंपनियों के साथ काम करने में बिलकुल ख़ुश नहीं है."

इसलिए गज़ाला का मानना है कि अगर भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, तो सबसे पहले प्राइवेट और सरकारी कंपनियों की कैटेगरी को ख़त्म करना होगा. इससे दोनों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सरकारी कंपनियों में भी प्राइवेट की तरह परफार्मेंस प्रेशर बढ़ेगा.

लेकिन राहुल बेदी को लगता है कि सरकार का नया फ़ैसला पहले के मुक़ाबले बेहतर है. उनके मुताबिक़ ग़ैर ज़रूरी नौकरशाही ख़त्म हो जाएगी. सरकारी कंपनियों के लिए मौक़ा है कि कुछ बाहर की प्राइवेट कंपनियों के साथ मिल कर ज्वाइंट वेंचर के तहत काम शुरू करें.

दरअसल रक्षा ख़रीद नियमों में जो नियमों में बदलाव हुए हैं, वो फ़िलहाल काग़ज़ों पर हैं, जब तक इसके ज़रिए कोई तकनीक भारत में आ नहीं जाती, तब तक इसकी कामयाबी पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी.

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