West Bengal elections 2021: कांग्रेस 'दो नाव' पर सवार, कैसे लगेगी राहुल गांधी की नैया पार ?

कोलकाता: सोनिया गांधी पिछले करीब डेढ़ साल कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष जरूर बनी हुई हैं, लेकिन सक्रिय राजनीति से आमतौर पर उनकी दूरी के चलते पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ही अभी भी पार्टी का मुख्य चेहरा बने हुए हैं। राहुल के ऐक्शन, उनके तेवर और उनके पीछे खड़े पार्टी नेताओं की फौज से स्पष्ट है कि आज भी पार्टी की वही लाइन और रणनीति होती है, जो वो तय कर देते हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए आज बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही मुख्य सियासी दुश्मन हैं। बाकी सुविधानुसार पार्टी हर नीति और रणनीति में फेरबदल कर लेती है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण है- इस साल होने वाला पश्चिम बंगाल और केरल विधानसभा चुनाव। केरल में जहां कांग्रेस लेफ्ट को सत्ता से बेदखल करने की कोशिशों में जुटी है तो बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की शान में कसीदे पढ़ रही है।

कांग्रेस की सियासी दुविधा!

कांग्रेस की सियासी दुविधा!

पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ याराना और भाजपा पर निशाना, राहुल गांधी की सियासी दुविधा की बेहतरीन बानगी कही जा सकती है। ममता बनर्जी की 10 साल की सत्ता के बावजूद उनके पास टीएमसी सरकार के खिलाफ बोलना उनकी राजनीति को सूट नहीं कर रहा। यही वजह है कि वह चुनाव के लिए दो बार तमिलनाडु में हवा बना आए। असम और केरल जाकर भी वोटरों का मूड भांप आए। लेकिन, पांचों राज्यों में इसबार सबसे अहम माने जा रहे बंगाल चुनाव के लिए मतदाताओं के बीच पहुंचने से उन्होंने अबतक परहेज किया है। राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं और वहां इसबार एलडीएफ सरकार के खिलाफ सत्ता परिवर्तन ना सिर्फ कांग्रेस के जीवन के लिए भी जरूरी है, बल्कि खुद राहल के सियासी वजूद बचाए रखने के लिए भी आवश्यक है। ऐसे में उन्हीं सीपीएम नेताओं के साथ बंगाल में मंच साझा करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण लग रहा है।

राहुल के राजनीतिक वजूद के लिए केरल का चुनाव अहम

राहुल के राजनीतिक वजूद के लिए केरल का चुनाव अहम

लेफ्ट फ्रंट ने राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को 28 फरवरी को बंगाल में रैली के लिए बुलावा भेजा है, लेकिन वो अभी तक इसपर फैसला नहीं ले पाए हैं। बंगाल में कांग्रेस से दोस्ती और केरल में घनघोर दुश्मनी के पीछे लेफ्ट की अपनी रणनीति छिपी है। लेकिन, राहुल गांधी के लिए यह दो नावों पर सवारी करने से कम नहीं है। इसके लिए एक यह रास्ता तलाशा जा रहा है कि प्रियंका एक-दो रैलियों में बंगाल पहुंच जाएं और उसी में कभी राहुल गांधी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर आ जाएं। बंगाल कांग्रेस भी समझती है कि पूर्व अध्यक्ष का चेहरा ऐसे ही बचाया जा सकता है। क्योंकि, केरल में इसबार उनके लिए अभी नहीं तो कभी नहीं वाला चुनाव होने जा रहा है। जहां खुद उनकी अपनी साख भी दांव पर लग चुकी है, क्योंकि अमेठी ने जब हाथ दिखा दिया तो यहीं के लोगों ने उन्हें राजनीतिक आसरा दिया है। कांग्रेस के लिए केरल की जीत सिर्फ लेफ्ट को सत्ता से हटाने के लिए नहीं, बल्कि भाजपा के प्रहार से राहुल को सुरक्षित बचा निकालने के लिए भी जरूरी है।

बंगाल में कांग्रेस की 'ममता'

बंगाल में कांग्रेस की 'ममता'

बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाना राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस के लिए इसलिए भी आसान नहीं है, क्योंकि इससे भाजपा को फायदा मिलने की संभावना है। हालांकि बंगाल में टीएमसी को नाराज करने का कांग्रेस ने कुछ फैसला भी लिया है, मसलन इसने ममता विरोधी अधीर रंजन चौधरी को वहां की कमान सौंपी है। यही नहीं टीएमसी विरोधी लेफ्ट से भी समझौता कर लिया है। लेकिन, विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस की जीत नहीं, भाजपा की हार में अपना भविष्य देख रही है। यही वजह है कि जब मनमोहन सरकार में रेल मंत्री रहे टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया तो अधीर रंजन चौधरी ने नेटवर्क18 से कहा, 'इससे टीएमसी को नुकसान नहीं होगा। दिनेश त्रिवेदी एक परजीवी हैं और उनका कोई ठिकाना नहीं है।' तृणमूल ने इस बयान का स्वागत किया। संकेत साफ है, राहुल की पार्टी ममता के खिलाफ आक्रामक नहीं होगी।

कांग्रेस-टीएमसी में पर्दे के पीछे हो सकती है डील?

कांग्रेस-टीएमसी में पर्दे के पीछे हो सकती है डील?

उधर भाजपा के बढ़ने की रफ्तार ने पश्चिम बंगाल में बाघ और बकरी के एक ही घाट पर पानी पीने जैसे राजनीतिक हालात बना दिए हैं। क्योंकि, हाल ही में टीएमसी नेता सौगत राय ने यहां तक सलाह दी थी कि बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस, टीएमसी और लेफ्ट सभी विपक्षी दलों को साथ आना होगा। हालांकि, कांग्रेस ने बाहर से तो इससे इनकार किया,लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले ही उसके नरम तेवरों से लग रहा है कि भले ही वह तृणमूल के साथ तालमेल ना करे, दोनों दलों में अनौपचारिक गठबंधन से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के दिमाग में बिहार की हकीकत ताजा है। वहां पार्टी ने जरूरत से ज्यादा सीटें तो राजद से मांग ली, लेकिन उसने लालू की पार्टी को सत्ता तक पहुंचने से पहले ही ब्रेक लगा दिया। अब देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी किस तरह से पार्टी को दो नावों के सहारे सियासी दरिया पार करा पाते हैं।

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