Bengal Election 2026: चुनाव से पहले नागरिकता जाने का खौफ, वोट डालने के लिए घर लौट रहे प्रवासी मजदूर

Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (2026) के पहले चरण के मतदान में अब सिर्फ एक हफ्ता बचा है। लेकिन इस बार चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के बारे में नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के लिए अपनी पहचान और नागरिकता बचाने की जंग बन गया है।

दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में काम करने वाले बंगाल के प्रवासी मजदूर अपनी नौकरी और दिहाड़ी की परवाह किए बिना बड़ी संख्या में अपने गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।

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इस पलायन के पीछे सबसे बड़ी वजह Special Intensive Revision - SIR की प्रक्रिया है, जिसके तहत हाल ही में राज्य की मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम हटा दिए गए हैं।

West Bengal polls से पहले वोटर लिस्ट से 90 लाख नाम कटे, 27 लाख अब भी अधर में

चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को साफ करने के लिए चलाए गए SIR अभियान के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 90.66 लाख नाम हटाए गए हैं। यह राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है। आयोग के अनुसार, ये नाम मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट इंट्री या उन लोगों के हैं जो अब उस पते पर नहीं रहते हैं मतलब जो काम की तलाश में दूसरे शहर गए हैं या उस दौरान उपस्थित नहीं मिले हैं।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, हटाए गए 90 लाख नामों में से लगभग 63% (57.47 लाख) हिंदू हैं और करीब 34% मुस्लिम समुदाय से हैं। लगभग 27 लाख मतदाताओं का दर्जा अभी भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। इनका भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वे अपनी नागरिकता और निवास के पुख्ता सबूत दे पाते हैं या नहीं।

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प्रवासियों में बढ़ा डर, वोट नहीं दिया तो चली जाएगी नागरिकता?

महानगरों से लौट रहे मजदूरों के बीच एक डर बैठ गया है कि यदि उन्होंने इस बार वोट नहीं दिया, तो उनका नाम मतदाता सूची से हमेशा के लिए काट दिया जाएगा। दिल्ली में काम कर रहे प्रवासी मजदूर राहुल कहते हैं-"दिल्ली में मेरे साथ रहने वाले कई लोग गांव लौट रहे हैं। हमें डर है कि अगर वोट नहीं दिया, तो सरकारी योजनाओं का लाभ बंद हो जाएगा और भविष्य में नागरिकता साबित करना मुश्किल होगा।"

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि राजनीतिक दलों की बयानबाजी ने इस डर को और हवा दी है। जहां सत्ताधारी दल इसे NRC से जोड़कर पेश कर रहा है, वहीं विपक्षी दल घुसपैठ का मुद्दा उठा रहे हैं। इस राजनीतिक खींचतान के बीच आम नागरिक अपनी पहचान बचाने के लिए हजारों रुपये खर्च कर घर लौट रहा है। हालांकि, इसके साथ एक वर्ग ऐसा भी है, खासकर पढ़े-लिखे युवाओं का, जो रोजगार की कमी के कारण बाहर गया था और अब राजनीतिक बदलाव के लिए वोट डालने लौट रहा है।

Voter List में इन इलाकों में सबसे ज्यादा नाम कटे

मतदाता सूची से नामों की कटौती का सबसे अधिक असर सीमावर्ती जिलों और शहरी क्षेत्रों में देखा गया है:

सीमावर्ती जिले: उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद, मालदा और नदिया।

शहरी क्षेत्र: कोलकाता और हावड़ा के कई बूथों पर बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं।

प्रवासी मजदूर के पलायन से अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा प्रभाव

बंगाल के मजदूरों के अचानक घर लौटने से दूसरे राज्यों के उद्योगों पर भी असर पड़ रहा है। ज्वेलरी निर्माण, कृषि इकाइयां और घरेलू सेवाओं में लगे श्रमिकों की कमी के कारण दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में काम प्रभावित हो रहा है। ज्वेलरी निर्माताओं का कहना है कि उनके आधे से ज्यादा कारीगर चुनाव के लिए बंगाल जा चुके हैं, जिससे उत्पादन ठप होने की कगार पर है।

दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है और इसका उद्देश्य केवल एक सटीक मतदाता सूची तैयार करना है। आयोग का कहना है कि जिन लोगों के नाम गलती से कटे हैं, उनके पास अपील करने का पर्याप्त समय और अवसर है।

भले ही 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए बंगाल की धरती सज चुकी है। लेकिन इस बार का मतदान केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि एक सबूत के तौर पर देखा जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति इस देश का वैध नागरिक है।

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