पाकिस्तान: इमरान ख़ान के भाषण में अमेरिका का ज़िक्र क्या महज़ एक ग़लती थी?

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान ने गुरुवार को अपने 50 मिनट के संबोधन में अपने ख़िलाफ़ कथित विदेशी साज़िशों का ज़िक्र किया और इस दौरान वो 'ग़लती' से अमेरिका का नाम ले बैठे.

इससे पहले हुक़ूमत के किसी भी बड़े अधिकारी ने खुले तौर पर अमेरिका का नाम नहीं लिया था.

प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक तूफ़ान सा खड़ा हो गया. जहां उनके समर्थकों ने इमरान ख़ान की तारीफ़ों के पुल बांध दिए, वहीं उनके आलोचकों का कहना था कि उन्हें अपने भाषण के लिए तैयारी करके आना चाहिए था.

अपने संबोधन में जिस जगह उन्होंने अमेरिका का नाम लिया, उससे पहले उन्होंने एक लंबी सांस ली थी और फिर बात करते हुए कहा था, "मैं आज जो आपके पास सारी बातें करने इसलिए आया हूं, अभी हमें आठ मार्च, सात मार्च को हमें अमेरिका ने, अमेरिका ने एक बाहर के मुल्क ने, मैं नाम... मतलब मेरा बाहर के किसी और मुल्क से हमें पैग़ाम आता है... कि ये किसी आज़ाद मुल्क के लिए हमें जिस तरह का पैग़ाम आया है, ये है तो सिर्फ़ प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ है लेकिन ये हमारी क़ौम के ख़िलाफ़ है."

यहां ये बता देना ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 27 मार्च को इस्लामाबाद की जनसभा में कहा था कि 'हमें लिखकर धमकी दी गई है.'

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हालांकि उन्होंने कहा था कि वो देश हित में इस मामले पर और अधिक कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन अगर कोई उस लिखित संदेश को देखना चाहता है तो वो उन्हें ऑफ़ द रिकॉर्ड दिखा सकते हैं.

बाद में दो मंत्रियों ने भी ये कहा कि इस ख़त में इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ बात की गई है. लेकिन हुक़ूमत फ़िलहाल ये नहीं बता सकती कि ये ख़त कहां से आया है क्योंकि "इस चिट्ठी को सिर्फ़ आला सैनिक अधिकारियों और सरकार के कुछ लोगों तक सीमित रखा गया है."

इस दौरान एक तरफ़ जहां इमरान ख़ान और उनके साथियों का रुख़ सख़्त होता जा रहा था वहीं उनके गठबंधन के साथी भी उन्हें छोड़ उनसे अलग हो रहे थे. इसी दौरान इमरान ख़ान के पक्ष के लोगों ने विदेशी मुल्क से की गई घिनौनी साज़िश की बात उठानी शुरू कर दी.

गुरुवार को ही राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान ही इस मामले को उठाया गया. हालांकि उस दौरान भी किसी मुल्क का नाम नहीं लिया गया था.

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इमरान के संबोधन के बाद सोशल मीडिया पर क्या हुआ

इमरान ख़ान ने जब अपने संबोधन में अमेरिका का नाम लिया और साथ ही ये भी दिखाने की कोशिश की कि ऐसा ग़लती से हो गया है और ये कहा कि किसी ग़ैर मुल्क की बात कर रहे हैं तो सोशल मीडिया पर एक भूचाल सा आ गया.

पत्रकार एहतेशाम उल हक़ लिखते हैं कि ये 'ये स्लिप ऑफ़ टंग' यानी ये ग़लती ही उनकी सारी तक़रीर थी और वो कहना ही यही चाहते थे.

एक और ट्विटर यूज़र 'वॉर ऑन द ब्रिंक' ने भी इसी बात को दोहराते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की ये ग़लती ही उनका पूरा भाषण थी क्योंकि बाक़ी सब तो वो था जो वो हमेशा दोहराते आए हैं. इस ट्वीट में कहा गया, "वो सिर्फ़ यही कहने के लिए आए थे, बग़ैर कहे, और उन्होंने ये कर भी दिया."

एक और ट्विटर यूज़र अदील लिखते हैं कि इमरान ख़ान ने अमेरिका का नाम लिया और फिर अपने आप को ठीक कर लिया लेकिन, लेकिन क्या ये उन्होंने अनजाने में कहा था या जान कर.

पत्रकार बेनेज़ीर शाह ने भी ट्वीट करते हुए पूछा कि क्या प्रधानमंत्री ने उस देश का ग़लती से नाम ले लिया है, तो जवाब में पत्रकार अनवर रहीम शम्शी ने अपनी राय का इज़हार करते हुए लिखा कि ये ग़लती नहीं थी, ये जान बूझ कर किया गया है.

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गायक हारून शाह ने भी इस पर अपनी राय जाहिर करते हुए लिखा कि ऐसे भाषण के प्रसारण में कुछ सेकंड की देर होती है और अगर वो चाहते तो ये एडिट हो सकता था लेकिन क्योंकि ऐसा नहीं हुआ. 'बहुत शरारती ख़ान साहब, बहुत शरारती.'

एक और ट्विटर यूज़र ताहा ने इमरान ख़ान की मुस्कुराहट पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि, "वो मआनीखेज़ मुस्कुराहट...और फिर लोग कहते हैं कि इमरान ख़ान सियासत करना नहीं जानता."

दूसरी तरफ़ चर्चित अर्थशास्त्री शाहरुख वानी ने इस पर टिप्पणी करते हुए ट्वीट किया, "इमरान ख़ान, बराए महरबानी अगली बार भाषण से पहले इसे लिख ले, रिकॉर्ड कर लें और फिर एडिट कर लें."

ट्विटर यूज़र ओवैस ने लिखा कि, "आसान उर्दू में इसे डेढ़ होशियार कहते हैं." वहीं पत्रकार शहरयार मिर्ज़ा ने प्रधानमंत्री के इस भाषण पर सवाल उठाया कि क्या इमरान ख़ान अपनी सरकार बचाने के लिए पाकिस्तान की कूटनीति को तबाह करना चाहते हैं?

"इसे सुनकर ऐसा नहीं लगता कि ये कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे अपने देश के हितों की परवाह हो."

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अतीत में इमरान ख़ान के विवादित बयान और सरकार का स्पष्टीकरण

इमरान ख़ान के भाषण पर टिप्पणियों में यह सवाल उठाया गया है कि क्या यह वास्तव में एक गलती थी या क्या उन्होंने जान बूझकर अमेरिका के नाम का इस्तेमाल किया था.

हालांकि अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब इमरान ख़ान ने अपने भाषणों और साक्षात्कारों में कई ऐसे बयान दिए जिसके बाद सरकारी अधिकारियों को स्पष्टीकरण देने पड़े. बावजूद इसके प्रधान मंत्री को आलोचना और उपहास का सामना करना पड़ा.

अप्रैल 2019 में जारी एक बयान में इमरान ख़ान ने पड़ोसी देशों के बीच व्यापार के लाभों पर चर्चा करते हुए कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी और जापान ने व्यापार के माध्यम से अपने संबंधों में सुधार किया क्योंकि वो संयुक्त रूप से उद्योग स्थापित करने में सक्षम थे.

बाद में यह अनुमान लगाया गया कि प्रधान मंत्री जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करना चाहते थे, लेकिन जापान का नाम ले बैठे जिस पर विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने परमाणु बम गिरा दिए थे.

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"ओसामा बिन लादेन को मार दिया, शहीद कर दिया"

दो साल पहले जून 2020 में नेशनल असेंबली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी सरकार की विदेश नीति को "सबसे सफल" बताते हुए सरकार की विदेश नीति पर टिप्पणी की थी.

उन्होंने कहा, 'एक ऐसी घटना हुई है जिससे पाकिस्तानियों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है. वे एबटाबाद आए और ओसामा बिन लादेन को मार डाला, उसे शहीद कर दिया. फिर पूरी दुनिया ने हमें गाली दी. हमें बुरा भला कहा. यानी, हमारा सहयोगी हमारे देश में आ रहा है और कार्रवाई कर रहा है और हमें नहीं बता रहा है."

मई 2011 में, अमेरिका ने पाकिस्तानी शहर एबटाबाद में एकतरफा ऑपरेशन में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था और पाकिस्तान को इसके बारे में सूचित नहीं किया गया था.

उनके इस बयान के बाद इमरान ख़ान की सख़्त आलोचना की गई थी. कुछ दिन बाद केंद्रीय मंत्री फ़वाद चौधरी ने इस पर सफ़ाई पेश करते हुए कहा था कि ये महज़ स्लिप ऑफ़ टंग था और सरकार की ओसामा बिन लादेन को लेकर स्थिति स्पष्ट है.

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'हर इंसान में इतनी ताक़त नहीं होती कि वो ख़ुद को रोक सके'

अप्रैल 2021 में, प्रधान मंत्री इमरान ख़ान ने एक टेलीविज़न साक्षात्कार में, देश में बलात्कार के मामलों में तेज़ी के लिए अश्लीलता को भी ज़िम्मेदार बताया था.

उन्होंने कहा था, "हर इंसान में खुद को रोकने की ताक़त नहीं होती,"

इमरान ने कहा था, "आप समाज में जितनी अश्लीलता बढ़ाओगे, उतना ही उसका प्रभाव पड़ेगा."

इमरान ख़ान के इस बयान के बाद राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने उनकी आलोचना की थी जिसके बाद उनके कार्यालय ने स्पष्टीकरण पेश किया गया जिसमें कहा गया था कि यौन अपराधों को रोकने के लिए सिर्फ़ क़ानून काफडी नहीं बल्कि पूरे समााज को मिल कर लड़ना होगा जिसमें 'बहकावों से बचना भी शामिल है.'

कुछ दिन बाद इस बयान में बदलाव करते हुए नया बयान जारी किया गया जिसमें 'बहकावे से बचे' हटा दिया गया था और कहा गया था कि 'पूरे समाज को इसके ख़िलाफ़ लड़ना चाहिए.'

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