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क्या भारत के 'स्वर्ण युग' को दुनिया से जानबूझकर छिपाया गया ? 200 देशों में हुए सर्वे से रहस्य गहराया

नई दिल्ली- हमेशा से सवाल उठते रहे हैं कि अंग्रेजों के जमाने में या उसके बाद भी कुछ इतिहासकारों ने भारत के गौरवाशाली इतिहास और पंरपराओं के बारे में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। इसको लेकर कुछ संगठन जोरदार आवाज उठाते रहे हैं। दूसरी धारा उन इतिहासकारों की रही है, जो इस तरह की आशंकाओं को शुरू से खारिज करते रहे हैं। लेकिन, अब इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशंस ने दुनिया के 200 देशों के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाए जाने वाले इतिहास का विश्लेषण किया है तो इस रहस्य पर संदेह और गहरा गया है। क्योंकि, शोध में पाया गया है कि इस बात में दम है कि भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण और गौरवशाली तथ्यों से दुनियाभर के बच्चों को अबतक महरूम रखा गया है।

भारतीय इतिहास के बारे में गलत धारणा मिटाना जरूरी-आईसीसीआर

भारतीय इतिहास के बारे में गलत धारणा मिटाना जरूरी-आईसीसीआर

दुनिया भारत के बारे में क्या जानती है और वहां के स्कूलों में बच्चों को इसके बारे में पढ़ाया क्या जाता है, इसके लिए इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशंस 200 से ज्यादा देशों के स्कूली टेक्स्टबुक का सर्वे करा रहा है। ग्लोबल अंडरस्टैंडिंग ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट के तहत करवाए गए इस सर्वे में आईसीसीआर को अबतक 60 देशों के टेक्स्टबुक से जो जानकारी मिली है, वह चौंकाने वाली है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि अभी भी कई देश इन्हीं विवादित तथ्यों पर फोकस कर रहे हैं कि '(कथित रूप से) आर्यों ने भारत पर आक्रमण किया' और उसके बाद धीरे-धीरे सिंधु घाटी सभ्यता का विनाश हो गया। भाजपा सांसद और आईसीसीआर के अध्यक्ष विनय शहस्त्रबुद्धे ने ईटी से कहा है, 'रिसर्च में यह पता चला है कि कई देश अभी भी आर्यों के आक्रमण की थ्योरी के बारे में चर्चा करते हैं, जिसको कि बीआर अंबेडकर भी खारिज कर चुके हैं। इसलिए जरूरी है कि हम भारत और भारत के लोगों के बारे में तथ्य आधारित जानकारी पहुंचाएं, ताकि हमारे इतिहास और संस्कृति के बारे में जिन कारणों से गलत धारणा बनी हुई है, उन बातों को मिटाया जा सके।'

भारत का 'स्वर्ण काल' विदेशी स्कूलों के किताबों से गायब

भारत का 'स्वर्ण काल' विदेशी स्कूलों के किताबों से गायब

आईसीसीआर विदेश मंत्रालय के अधीन है और शहस्त्रबुद्धे शिक्षा पर बनी संसदीय समिति के भी हेड हैं, इसके लिए उनकी बातों के गंभीर मायने हैं। उनका कहना है कि, 'हमें एक समस्या जो देखने को मिली वह ये है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत के बारे में शायद ही कहीं जिक्र मिलता है या बहुत ही कम मिलता है। गुप्त और चोल राजाओं की विजय गाथाओं और उनके गौरव पर कोई चैप्टर नहीं है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का बहुत ही कम जिक्र है। और समकालीन भारत के बारे में तो कोई संदर्भ नहीं है।' गौरतलब है कि 'गुप्त काल' को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण काल' कहा जाता है, जिसमें भारत के ऐश्वर्य की दुनिया में तूती बोलती थी। करीब 200 वर्षों के गुप्त साम्राज्य के दौरान पूरा भारत सम्राट अशोक के बाद शायद पहली बार एकसूत्र में बंध गया था।

कुछ देशों में भारतीय इतिहास पर काफी फोकस

कुछ देशों में भारतीय इतिहास पर काफी फोकस

इस रिसर्च में वैसे ये बात भी सामने आई है कि कई देशों की किताब में भारतीय संस्कृति को बताने के लिए पवित्र कुंभ मेला, दशहरा और छठ पूजा के बारे में काफी कुछ बताया गया है। मसलन भारत के बारे में कुछ पड़ोसी देशों में तो काफी कुछ पढ़ाया ही जाता है, साथ ही अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और ग्रीस में भी बच्चों को बहुत कुछ भारत के बारे में बताया जाता है। शहस्त्रबुद्धे का कहना है कि मध्य एशिया में अजरबैजान को छोड़कर कई देशों में भारत के बारे में पढ़ाया जाता है खासकर रूस में। लेकिन, यूरोपीय देशों में जैसे कि इटली, आइसलैंड, माल्टा और ऑस्ट्रिया में यह लगभग नहीं के बराबर है। हालांकि, ग्रीस के साथ ही हंगरी और नॉर्वे में भारत अच्छी तरह से स्कूलों में कवर किया जाता है। वहीं ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में भारत के बारे में काफी कुछ पढ़ाया जाता है, लेकिन कुछ हिस्से में बिल्कुल नहीं।

कुछ देशों में तथ्यात्मक गलत जानकारी दी जा रही है

कुछ देशों में तथ्यात्मक गलत जानकारी दी जा रही है

लेकिन, कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां भारत के बारे में तथ्यात्मक रूप से गलत जानकारी दी जा रही है। जैसे कि अफगानिस्तान में। शहस्त्रबुद्धे के मुताबिक, 'खासकर अफगानिस्तान में हमने हमारे और हमारे धर्म के बारे में तथ्यात्मक गलतियां पाई हैं। जैसे कि हिंदुत्व को ब्राह्मणवाद से जोड़ दिया गया है।' इस तरह की गड़बड़ियां ओमान और यूएई में भी देखी गई हैं। लेकिन, यूएई में भारत को विस्तार से कवर किया गया है और यहां इतिहास का अध्याय मोटे तौर पर संतोषजनक है। इसी तरह अफ्रीकी देशों में गांधी और गुटनिरपेक्ष आंदोलन की चर्चा तो होती है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। जबकि, अमेरिका में भारत को बड़े पैमाने पर सकारात्मक नजरिए से पेश किया गया है।(स्कूल वाली तस्वीर सांकेतिक)

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