‘मैंने पहले ही केजरीवाल को बता दिया था’ विक्रमजीत का दावा, AAP के 7 MPs की बगावत के पीछे क्या थी असली कहानी?
Vikramjit Sahney on Arvind Kejriwal: आम आदमी पार्टी (AAP) से राज्यसभा सांसदों के बड़े राजनीतिक कदम ने दिल्ली से लेकर पंजाब तक सियासी हलचल तेज कर दी है। सात सांसदों के पार्टी छोड़ने और भाजपा के साथ जाने की चर्चा के बीच अब राज्यसभा सांसद विक्रमजीत साहनी का बयान नए सवाल खड़े कर रहा है। साहनी ने दावा किया है कि उन्होंने इस बड़े फैसले से पहले पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी और संभावित घटनाक्रम की जानकारी भी दी थी।
एक इंटरव्यू में साहनी ने कहा कि उन्होंने केजरीवाल से साफ तौर पर बातचीत की थी और उन्हें बताया था कि पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। उनके मुताबिक, सांसदों के बीच लंबे समय से नाराजगी थी और स्थिति धीरे-धीरे उस मोड़ पर पहुंच गई जहां अलग रास्ता चुनने का फैसला लिया गया।

केजरीवाल को क्या बताया था? (What Vikramjit Sahney Told Kejriwal)
विक्रमजीत साहनी के मुताबिक उन्होंने मुलाकात के दौरान केजरीवाल को यह समझाने की कोशिश की थी कि अगर एक-दो सांसद भी पार्टी छोड़ते हैं, तो आगे चलकर दो-तिहाई संख्या का आंकड़ा पूरा हो सकता है। संसद में दल-बदल कानून (एंटी डिफेक्शन लॉ) के तहत यह संख्या बेहद अहम मानी जाती है।
उन्होंने, "मैंने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात में साफ कहा था कि अगर एक-दो सांसद भी अलग रास्ता चुनते हैं, तो आगे चलकर दो-तिहाई संख्या का आंकड़ा पूरा हो सकता है।"
उन्होंने कहा कि अगर शुरुआती कुछ सांसद अलग होते हैं, तो बाकी सांसदों के लिए भी रास्ता आसान हो सकता है। साहनी के मुताबिक, उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि स्थिति सिर्फ व्यक्तिगत असहमति तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर भी माहौल ठीक नहीं है।
विक्रमजीत साहनी का कहना है, "पिछले दो साल में पार्टी के भीतर कई नेताओं को साइडलाइन महसूस कराया गया। इससे धीरे-धीरे नाराजगी बढ़ी और असंतोष खुलकर सामने आने लगा।"
हालांकि, साहनी का कहना है कि केजरीवाल इस संभावना को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखे। खासतौर पर संदीप पाठक के संभावित इस्तीफे को लेकर उन्हें भरोसा नहीं था। अब तक आम आदमी पार्टी की ओर से इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

दो साल में क्यों बढ़ी नाराजगी?
विक्रमजीत साहनी ने यह भी बताया कि पिछले दो सालों में पार्टी के भीतर माहौल बदलने लगा था। उनके मुताबिक, पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान कुछ नेताओं ने संगठन और चुनावी रणनीति में बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेताओं ने टिकट वितरण, उम्मीदवार चयन और चुनावी प्रबंधन में अहम जिम्मेदारी निभाई थी। लेकिन समय के साथ इन नेताओं की भूमिका सीमित होती चली गई।
विक्रमजीत साहनी बोले, "राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने पंजाब चुनाव में बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में उनकी अहमियत कम होती गई, जिससे निराशा बढ़ी।"
साहनी ने कहा कि जब नेतृत्व स्तर पर बदलाव हुए और कुछ नए चेहरे प्रमुख भूमिका में आए, तब पुराने नेताओं को खुद को अलग-थलग महसूस होने लगा। यही भावना धीरे-धीरे नाराजगी में बदल गई।
दिल्ली चुनाव हार के बाद बदला समीकरण
विक्रमजीत साहनी ने संकेत दिया कि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में हार के बाद पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बदल गया। उनका दावा है कि इसके बाद नई टीम ने नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली और कई पुराने नेताओं की सक्रियता कम हो गई।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्यसभा में राघव चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटाया जाना भी असंतोष बढ़ाने वाला कदम था। साहनी का मानना है कि इस फैसले ने संदेश दिया कि पार्टी के भीतर कुछ चेहरों की अहमियत कम हो रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी संगठन में लंबे समय तक संवाद की कमी होती है, तो असहमति धीरे-धीरे खुली नाराजगी में बदल सकती है। AAP के भीतर हालिया घटनाक्रम को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
क्या यह पंजाब की राजनीति से जुड़ा फैसला था?
साहनी ने अपने बयान में पंजाब का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सांसदों को महसूस हो रहा था कि वे पंजाब के लोगों के लिए उतना काम नहीं कर पा रहे, जितना करना चाहिए।
उनका कहना था कि राज्य को मजबूत केंद्रीय सहयोग की जरूरत है और इसी सोच के साथ आगे की रणनीति बनाई गई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब के लोगों के साथ किसी तरह का विश्वासघात नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा, "हमने पंजाब के लोगों के साथ कोई विश्वासघात नहीं किया। हमारा उद्देश्य सिर्फ जनता की सेवा करना है और आगे भी रहेगा।" साहनी के मुताबिक, सांसद जनता की सेवा पहले भी करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वे इस्तीफा देने के लिए भी तैयार हैं।
कानूनी लड़ाई अब किस दिशा में जाएगी? (What Happens In The Legal Battle Now)
सात सांसदों के इस फैसले के बाद कानूनी पहलू भी चर्चा का केंद्र बन गया है। दल-बदल कानून के तहत दो-तिहाई संख्या का नियम महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि सांसदों का समूह तय सीमा पूरी करता है, तो विलय की प्रक्रिया कानूनी सुरक्षा दे सकती है। उन्होंने कहा,"कानूनी लड़ाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। मामला उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।"
साहनी ने कहा कि इस पूरे मामले में कानूनी प्रक्रिया लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा है। उन्होंने संकेत दिया कि यह मामला उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है।
राजनीतिक तौर पर यह घटनाक्रम सिर्फ AAP के लिए नहीं, बल्कि संसद की राजनीति के लिए भी अहम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि पार्टी के भीतर उठी नाराजगी का असर सिर्फ राज्यसभा तक सीमित रहेगा या इसका असर पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई देगा।















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