Vande Mataram: संसद में अब वंदे मातरम पर होगी चर्चा, 10 घंटे का दिया गया समय, क्या है पूरा प्लान
Vande Mataram In Parliament Winter Session 2025: संसद के शीतकालीन सत्र में इस बार माहौल कुछ अलग होने वाला है, क्योंकि 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने पर लोकसभा में एक विशेष चर्चा आयोजित की जा रही है। सरकार ने फैसला लिया है कि इस राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्वतंत्रता संग्राम में निभाई गई भूमिका को समझने के लिए सदन में 10 घंटे की लंबी बहस होगी।
कब होगी चर्चा और कौन-कौन रहेगा शामिल?
यह चर्चा गुरुवार (03 दिसंबर) या शुक्रवार (04 दिसंबर) को हो सकती है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस बहस में हिस्सा लेंगे। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा बुलाई गई ऑल-पार्टी मीटिंग और लोकसभा व राज्यसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में सभी दलों ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। राज्यसभा में भी सत्ताधारी दलों के सदस्यों ने इसके समर्थन में जोरदार बात रखी।

राष्ट्रीय एकता का संदेश
सरकार ने इस चर्चा को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताते हुए सभी राजनीतिक दलों को इसमें शामिल होने का न्योता दिया है। माना जा रहा है कि यह बहस सिर्फ गीत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश की सांस्कृतिक जड़ों और स्वतंत्रता आंदोलन की उस भावना को भी उजागर करेगी, जिसने भारत को एक सूत्र में बांधने का काम किया।
SIR पर चर्चा के लिए सरकार तैयार
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा को जानकारी दी कि केंद्र सरकार SIR प्रक्रिया और चुनावी सुधारों पर विस्तृत चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि इस बहस पर किसी तरह की समय सीमा न तय की जाए, ताकि विषय पर गंभीर और व्यापक संवाद हो सके। बताया गया कि 30 सितंबर को राज्यसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में सत्तापक्ष के कई सदस्यों ने इस चर्चा का प्रस्ताव रखा था। फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है।
सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के बाहर मीडिया से लगभग 10 मिनट बातचीत की। उन्होंने कहा कि शीतकालीन सत्र को हार की निराशा या जीत के अहंकार से ऊपर उठकर संचालित किया जाना चाहिए। पीएम ने कहा कि नई पीढ़ी के सांसदों को अनुभवी नेताओं से सीखने का मौका मिलना चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि सदन में ड्रामा नहीं, बल्कि ठोस डिलीवरी होनी चाहिए और फोकस नारों पर नहीं, बल्कि नीतियों पर होना चाहिए।












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