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'UGC को गाली देने वाले सभी ज्ञानी, मोदी जी पर भरोसा रखिए', BJP सांसद ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर किया दावा

UGC New Rule 2026: देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC द्वारा जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नए नियमों पर शीर्ष अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद जहां एक ओर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है।

निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर विपक्ष ही नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों पर निशाना साधा जो बीते दिनों से UGC और केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे थे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि "UGC पर गाली देने वाले सभी ज्ञानी, मोदी जी पर भरोसा रखिए। संविधान के दायरे में ही देश चलेगा और सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो पहले से कहा जा रहा था।" इसके साथ निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले वाली खबर को रि-पोस्ट किया है।

UGC New Rule 2026

यहां पढ़ें निशिकांत दुबे का पूरा पोस्ट...

निशिकांत दुबे ने कहा,

''UGC पर गाली देने वाले सभी ज्ञानी,पिछले 2 दिनों से संसद जा रहा हूँ,किसी राजनीतिक दल के किसी सदस्य ने इसपर चर्चा तक करना मुनासिब नहीं समझा? उल्टा जिस सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में EWS को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर गरीब की सुध ली,उसी को गाली । मैं दुबारा आपसे करबद्ध निवेदन करता हूँ कि मोदी जी पर भरोसा रखिए, संविधान की धारा 14 एवं 15 के तहत ही देश के क़ानून चलेंगे । सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो मैंने कहा।''

भाजपा सांसद गिरिराज सिंह ने कहा,

''आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और माननीय गृह मंत्री अमित शाह का हार्दिक आभार। यूजीसी नियम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक से देश के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। मोदी सरकार की पहचान सबका साथ, सबका विकास तथा एकता के साथ न्याय, संतुलन व संवैधानिक मूल्यों की दृढ़ रक्षा।''

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई UGC New Rule पर क्यों लगाई रोक

29 जनवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 'UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026' के कुछ प्रावधानों पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि इन नियमों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता नजर आती है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए 19 मार्च तक जवाब मांगा है। कोर्ट का साफ कहना है कि किसी भी नियम का मकसद भेदभाव खत्म करना होना चाहिए, लेकिन अगर वही नियम नए टकराव और भ्रम को जन्म दें, तो उस पर दोबारा विचार जरूरी हो जाता है।

निशिकांत दुबे का तीखा बयान क्यों बना चर्चा का केंद्र

सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद BJP सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंच से जो बयान दिया, उसने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया। उन्होंने कहा कि वह पिछले दो दिनों से संसद जा रहे हैं, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल के सदस्य ने इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा।

उन्होंने आरोप लगाया कि जिस सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में EWS को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर गरीब वर्ग की चिंता की, उसी सरकार को गाली दी जा रही है। निशिकांत दुबे ने कहा कि संविधान की धारा 14 और 15 के तहत ही देश के कानून चलते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने वही फैसला सुनाया है, जिसकी उम्मीद थी।

BJP ने कोर्ट के फैसले को बताया संविधान और सनातन मूल्यों की जीत

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी के कई बड़े नेताओं ने इसे संविधान, सामाजिक समरसता और सनातन मूल्यों की रक्षा से जोड़कर देखा। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने फैसले का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को देते हुए कहा कि मोदी सरकार ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ही थे, जिन्होंने EWS को आरक्षण दिया और गरीबों को मुख्यधारा में लाने का काम किया। उनके मुताबिक कोर्ट का यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक संतुलन को मजबूत करता है।

यूपी से बिहार तक बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रिया

उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का हर फैसला सम्मान के योग्य होता है। उन्होंने राम मंदिर के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि अदालत के निर्णयों पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है, सरकार आदेश का पालन करेगी।

बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी यही रुख अपनाते हुए कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह पालन करेगी। वहीं बीजेपी सांसद मनन कुमार मिश्र ने कहा कि शिक्षा मंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। अब कोर्ट के फैसले से सरकार को नियमों की कमियां दूर करने का मौका मिला है।

बीजेपी नेता बृजभूषण शरण सिंह ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि नए नियमों से समाज में टकराव की स्थिति बन सकती थी और कोर्ट ने समय रहते उस खतरे को टाल दिया।

विपक्ष की राय एक नहीं, लेकिन कोर्ट के फैसले का स्वागत

UGC के नए नियमों पर रोक को लेकर विपक्षी दलों की राय एक जैसी नहीं दिखी, लेकिन ज्यादातर नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि सच्चा न्याय वही होता है जिसमें किसी के साथ अन्याय न हो। कानून की भाषा और भावना दोनों स्पष्ट होनी चाहिए। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि नए नियमों से सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप उचित है।

टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने UGC की गाइडलाइंस को असंवैधानिक बताते हुए कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। वहीं शिवसेना UBT के प्रवक्ता ने कहा कि अगर अदालत ने रोक लगाई है तो उसमें जरूर कुछ गंभीर खामियां रही होंगी।

कांग्रेस और आरजेडी का सरकार पर हमला

कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन बीजेपी पर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने कहा कि किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और इस पर व्यापक चर्चा जरूरी है।

आरजेडी सांसद मनोज झा ने कानून और न्यायिक तटस्थता को लेकर सवाल उठाए, जबकि पार्टी प्रवक्ता सारिका पासवान ने इसे चुनावी जुमला करार दिया। आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए और किसी भी छात्र के अपमान पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

कुमार विश्वास बोले- देश बंटवारा नहीं झेल सकता

इस पूरे विवाद पर कवि कुमार विश्वास की प्रतिक्रिया भी सामने आई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में भारत किसी भी तरह के बंटवारे को सहन करने की स्थिति में नहीं है। सरकारों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीति में विभाजन की रेखाएं और गहरी न हों।

आगे क्या होगा?

अब निगाहें 19 मार्च पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार और UGC को सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना है। तब तक UGC के नए नियमों पर रोक जारी रहेगी। साफ है कि यह मामला सिर्फ शिक्षा नीति का नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, संवैधानिक मूल्यों और राजनीतिक सोच की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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