'कोशिश करता कि खाने के बारे में ना सोचूं क्योंकि इससे मुझे भूख लगती थी'

Adul Sam-On
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Adul Sam-On

"ये बस चमत्कार था... मैं सदमे में था... जब मुझसे पूछा कि कैसे हो तो मुझे सोचना पड़ा और मैंने कहा कि ठीक हूं. पर मैं सदमे में था."

14 साल का अदुल सैम-ऑन मीडिया को बता रहे थे कि 2 हफ़्ते तक पानी से भरी गुफ़ा में फंसे रहना उनके लिए कैसा था.

बुधवार की सुबह इन बच्चों को अस्पताल से छुट्टी मिली. इन सभी बच्चों की उम्र 11 से 17 साल के बीच है और ये जूनियर फ़ुटबाल टीम 'वाइल्ड बोर्स' के खिलाड़ी हैं.

इन सभी ने अपनी गेम टी-शर्ट में न्यूज़ कांफ्रेस में हिस्सा लिया.

इनके स्वागत के लिए फुटबाल टीम की पिच की तरह स्टेज डिज़ाइन किया गया था और एक बैनर लगाया गया था जिस पर लिखा था - 'वाइल्ड बोर्स की घर वापसी'.

पिछले हफ्ते ही 12 बच्चों और उनके कोच को थाइलैंड की 'टैम लूंग' गुफ़ा से गोताखोरों ने सुरक्षित बाहर निकाला.

अदुल ने बताया कि जब ब्रितानी गोताखोर उन तक पहुंचे तो वो बस उन्हें 'हेलो' ही कह पाए थे.

थाइलैंड गुफ़ा रेस्कयू
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थाइलैंड गुफ़ा रेस्कयू

'हम लोग चेकर्स खेलते थे'

इन बच्चों के साथ थाइलैंड नेवी के सदस्य भी थे जिन्होंने इन्हें बचाने में मदद की थी.

जब एक बच्चे से पूछा गया कि वे कैसे सिर्फ पानी के सहारे रहे तो उन्होंने बताया कि "पानी साफ़ था लेकिन सिर्फ पानी ही था, खाना नहीं था."

11 साल के चेनिन ने बताया, "मैं कोशिश करता था कि खाने के बारे में ना सोचूं क्योंकि इससे मुझे भूख ज़्यादा महसूस होती थी."

थाईलैंड की वाइल्ड बोर्स टीम
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थाईलैंड की वाइल्ड बोर्स टीम

ये बच्चे 23 जून को लापता हो गए थे और गोताखोर इन्हें 2 जुलाई को ही ढूंढ पाए. थाई नेवी के गोताख़ोरों ने गुफ़ा में उन तक खाना और बाकी चीज़ें पहुंचाई.

इन बच्चों ने बताया कि बाहर निकाले जाने से पहले एक हफ्ते में वो अपने बचावकर्ताओं के साथ कैसे घुलमिल गए थे.

"हम लोग चेकर्स खेलते थे... बेटोई हमेशा जीत जाते थे और गुफ़ा के राजा तो वही थे."

थाईलैंड की वाइल्ड बोर्स टीम
Getty Images
थाईलैंड की वाइल्ड बोर्स टीम

'अब ज़िंदगी अच्छे से जियूंगा'

इस टीम के 25 वर्षीय कोच इक्कापोल चांतावॉन्ग भी बच्चों के साथ गुफ़ा में फंस गए थे. उन्होंने नेवी सील समन कुनन को श्रद्धांजली दी जिनकी इस अभियान के दौरान मौत हो गई.

उन्होंने कहा, "मैं इस बात से बहुत प्रभावित हूं कि समन ने हमें बचाने के लिए अपनी जान दे दी ताकि हम जाकर अपनी ज़िंदगी जी सकें. जैसे ही हमें उनकी मौत की ख़बर पता चली, हमें सदमा लगा. हमें लगा कि हम उनके परिवार के दुख की वजह बन गए."

कुछ बच्चों ने कहा कि वो इस घटना से सीख लेंगे. एक ने कहा कि वो अब ज़िंदगी को लेकर ज्यादा सावधान रहेंगे और अच्छे से जियेंगे.

ये बच्चे कुछ वक्त के लिए बौद्ध साधु बनेंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि थाइलैंड के रिवाज़ के मुताबिकं जो पुरूष किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना से गुज़रते हैं, उन्हें ऐसा करना पड़ता है.

बचाव अभियान प्रमुख के मुताबिक बच्चों को बाहर निकालने के अभियान में कुल 90 गोताखोर शामिल थे जिनमें 40 थाईलैंड से हैं और 50 अन्य देशों से हैं.

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