• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है: ब्लॉग

By दिव्या आर्य

वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है
BBC
वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है

देश की सबसे बड़ी अदालत में काम कर चुकीं एक महिला का आरोप है कि उसी संस्थान के मुखिया ने उनका यौन उत्पीड़न किया. फिर नौकरी से निकलवा दिया और फिर उनके परिवार को भी प्रताड़ित किया.

उसके बाद हुई एक जांच के बाद उस मुखिया पर लगे सारे आरोप बेबुनियाद पाए गए हैं.

पर जब उस औरत ने इन बातों को सार्वजनिक करने की सोची तो कैसे उसी संस्थान पर विश्वास किया होगा, जिसके मुखिया के ख़िलाफ़ शिकायत करने निकलीं थीं?

पर उन्हें यक़ीन था. न्यायपालिका की स्वायत्ता पर. यौन उत्पीड़न की रोकथाम का क़ानून बनाने वालों पर.

इसलिए उन्होंने उसी संस्थान के सभी जजों को चिट्ठी लिखकर एक निष्पक्ष जांच की मांग की.

वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है
Reuters
वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है

आरोप सार्वजनिक होने पर जब भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने ख़ुद ही उन आरोपों को 'झूठा और अपमानजनक' क़रार दिया और कहा कि वो इनका जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते, तब क्या हुआ?

तब अदालत की बहुत सारी महिला वकील कंधे से कंधा मिलाकर शिकायतकर्ता औरत के साथ खड़ी हो गईं. न्यायपालिका पर दबाव बना और नतीजतन एक जांच समिति भी बनी.

समिति सवालों से परे नहीं थी. उसके सदस्य, अध्यक्ष, जांच प्रणाली इत्यादि पर बहुत अंकुश लगे. औरत ने भी अपनी शंकाएं ज़ाहिर कीं पर समिति के समक्ष गईं.

फिर जब डर हावी हो गया तो निष्पक्ष सुनवाई के लिए ज़रूरी अपनी मांगें समिति के सामने रखकर जांच से अलग हो गईं.

समिति ने उनके बिना ही जांच जारी रखने का फ़ैसला किया और आख़िरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया.

तब शिकायतकर्ता महिला डगमगाई. प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया कि उनके साथ "अन्याय" हुआ है, उनके "डर सच हो गए हैं" और वो "न्याय पाने की उम्मीद पर यक़ीन खोने की कगार पर हैं."

आंदोलन

पर फिर कई महिला आंदोलनकारी साथ आईं. सुप्रीम कोर्ट के सामने तख़्तियां लेकर "निष्पक्ष जांच" की मांग के साथ चुपचाप खड़ी हो गईं.

विश्वास फिर लौटा. शिकायतकर्ता महिला ने सुप्रीम कोर्ट की समिति को चिट्ठी लिखकर रिपोर्ट की प्रति मांगी ताकि वो ये जान सकें कि "तमाम सबूत दिए जाने के बावजूद किस आधार पर मेरे आरोपों को निराधार पाया गया है."

बार-बार शिकायतकर्ता न्यायपालिका के दरवाज़े पर ही खड़ी हो जाती हैं. आरोप सच हैं या नहीं ये तय तरीक़े से साबित हो, इस मांग को दोहराने में उनके साथ कई और औरतें जुड़ जाती हैं.

ये सभी औरतें न्यायपालिका के 'ड्यू प्रोसेस' यानी तय तरीक़े में सच्चा विश्वास रखती हैं.

ये उन्हीं औरतों की जमात है जो साल 2002 के गुजरात दंगों में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुईं बिलक़ीस बानो के साथ खड़ी थीं.

वही बिलक़ीस बानो जिन्हें डर था कि अहमदाबाद में उनके केस के गवाहों पर दबाव डाला जाएगा और इसीलिए उन्होंने अपना केस मुंबई ट्रांस्फ़र करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से अपील की.

न्यापालिका ने उनके विश्वास को क़ायम रखा. केस ट्रांस्फ़र हुआ. 2008 में बलात्कार और बिलक़ीस के परिवारवालों की हत्या के जुर्म में 11 लोगों को सज़ा हुई.

फिर 2017 में सबूतों की छेड़छाड़ के आरोप में पांच पुलिसवालों और दो डॉक्टरों को सज़ा हुई. उन्होंने जब इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो कोर्ट ने ख़ारिज कर दी.

तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने फिर बिलक़ीस के यक़ीन की इज़्ज़त तब रखी जब इस साल एक ऐतिहासिक फ़ैसले में उन्होंने गुजरात सरकार से बिल्किस को 50 लाख रुपए मुआवज़ा, एक नौकरी और एक घर देने का आदेश दिया.

बिलक़ीस ने कहा इस लंबी लड़ाई में उनके पति के अलावा बहुत सारी औरतें थीं. उनकी वकील थीं, गुजरात और दिल्ली में काम कर रहीं समाजसेवी महिलाएं थीं.

17 साल तक इन सबका साथ था जिसकी वजह से न्यायपालिका में उनका विश्वास बना रहा.

वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है
BBC
वो औरतें जिन्हें अब भी न्यायपालिका पर विश्वास है

विश्वसनियता दांव पर

न्यायपालिका मानवाधिकारों को सर्वश्रेष्ठ मानती है. क़ानून के अमल में, अपने हर फ़ैसले में नागरिक के संवैधानिक हक़ को मार्गदर्शक मानती है.

इसीलिए आज 350 महिलाओं और महिला संगठनों ने एक पत्र लिखकर पूछा है कि अब जब सवाल इसी संस्थान से हैं, तब जवाब ढूंढने के मानदंड अलग कैसे हो सकते हैं?

अपने पत्र में उन्होंने रिटायर्ड जजों से अपील की है कि, "न्याय और निष्पक्षता के हक़ में बोलिए, क्योंकि इस बार मुख्य न्यायालय की विश्वसनीयता दांव पर है और बेहद जतन से बने इस सिस्टम की रक्षा करना ज़रूरी है."

ये सभी औरतें अपने विश्वास को क़ायम रखने में न्यायपालिका की मदद चाहती हैं.

सिर्फ़ यही औरतें नहीं, सात समंदर पार अमरीका में पिछले साल सितंबर में एक महिला प्रोफ़ेसर क्रिस्टीन ब्लेसी फ़ोर्ड ने भी इस विश्वास की मिसाल दी थी.

उन्होंने अमरीकी जज ब्रेट कैवेनॉ पर आरोप लगाया था कि 1980 के दशक में जब वो 17 साल के थे उन्होंने फ़ोर्ड के साथ बलात्कार की कोशिश की थी.

कई साल पहले हुई इस कथित हमले को फ़ोर्ड को सामने लाने की क्या ज़रूरत थी? कई लोगों ने इसके पीछे उनकी मंशा पर सवाल भी उठाए.

पर फ़ोर्ड का विश्वास नहीं डगमगाया. उन्होंने कहा कि 36 साल पहले हुई हिंसा ने उनकी ज़िंदगी बदल दी थी और अब जब अमरीकी सीनेट में ब्रेट कैवेनॉ की नियुक्ति पर मतदान होना है उन्हें लगता है कि ये बात सामने आए.

ब्रेट कैवेनॉ ने उनके आरोप का खंडन किया. सीनेट की न्यायिक समिति ने दोनों की बात सुनने का फ़ैसला किया.

नौ घंटे चली सार्वजनिक सुनवाई में फ़ोर्ड ने सभी सवालों के जवाब दिए. वो बातें बताईं जो उन्हें याद थीं और वो भी मानीं जो उनकी याददाश्त से धूमिल हो गईं थी.

आख़िर में एक एफ़बीआई जांच भी जज ब्रेट कैवेनॉ के ख़िलाफ़ आरोप सिद्ध नहीं कर पाई और सीनेट ने भी उनकी नियुक्ति के हक़ में मतदान किया.

प्रोफ़ेसर फ़ोर्ड का 'ड्यू प्रोसेस' में विश्वास क़ायम रहा. फ़ैसले के कुछ महीने बाद उन्होंने एक सार्वजनिक पत्र में कहा, "ये मेरी ज़िम्मेदारी थी, बहुत मुश्किल थी पर ज़रूरी थी, मैं उन सब औरतों और मर्दों से प्रभावित हूं जिन्होंने अपने ऐसे अनुभव बांटने का साहस किया."

भारत की उन औरतों की जमात की ही तरह फ़ोर्ड ने उन सभी का शुक्रिया अदा किया जो उनके साथ इस विश्वास के सहभागी रहे.

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
The women who still believe in the judiciary blog
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X