मोदी के दोबारा पीएम बनने में ममता ऐसे हैं सबसे बड़ी अड़चन

नई दिल्ली- बीजेपी और उसके नेता लाख दावे करें, लेकिन यूपी में 2014 जैसा प्रदर्शन इस बार भी दोहरा पाना बहुत ही मुश्किल है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भी वह पिछली बार अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन दिखा चुकी है। इसलिए, उन राज्यों से वह सीटें बढ़ाने की सोच भी नहीं सकती। इसलिए, बीजेपी और नरेंद्र मोदी की निगाह पश्चिम बंगाल (West Bengal)पर टिकी है, जहां कि 42 लोकसभा सीटों में इस बार उसे अपने लिए काफी ज्यादा संभावनाएं नजर आ रही हैं। ये सच है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा ने टीएमसी (TMC) से लड़ाई में कांग्रेस और लेफ्ट को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इस चुनाव में दीदी का मुकाबला बीजेपी और मोदी से है। यह भी सही है कि जब से ममता बनर्जी (Mamata Banerjee)ने बंगाल पर कब्जा किया है, उन्हें पहली बार इतनी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ये भी लगभग तय है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में उनके लिए 2014 वाला प्रदर्शन दोहराना लगभग असंभव है। लेकिन, सब कुछ होते हुए भी दीदी आज भी सीटों की लिहाज से देश के तीसरे सबसे बड़े राज्य की दबंग बनी हुई हैं। ऐसे में अगर उन्होंने बदले सियासी माहौल में कुछ सीटें बीजेपी के हाथों गंवा भी दिए, तो भी वह इतनी सीटें तो ला ही सकती हैं कि नरेंद्र मोदी की राह का सबसे बड़ा कांटा बन सकें।

मोदी के पक्ष में क्या है?

मोदी के पक्ष में क्या है?

मौजूदा लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को परेशानी में डाल रखा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में युवाओं के एक वर्ग में मुख्यमंत्री की उद्योग विरोधी नीतियों से युवाओं में काफी नाराजगी नजर आ रही है। ममता की यह छवि सिंगूर में टाटा मोटर्स की फैक्ट्री के विरोध के कारण बनी है, जो बाद में नरेंद्र मोदी की पहल पर गुजरात में स्थापित हुई और मोदी की ऐसी विकासवादी छवि विकसित हुई, जिससे 2014 में भाजपा की जीत में मदद मिली। कभी सिंगूर में लगने वाले टाटा मोटर्स की फैक्ट्री में काम करने का सपना संजोने वाले संतू अधिकारी ममता के बारे में कहते हैं,"वह सिंगूर के चलते चुनाव जीतीं और मुख्यमंत्री बनीं, और वह आज जिस स्थिति में है, उसके चलते वह हारेंगी भी।" वह कहते हैं, "हम बीजेपी का समर्थन करते हैं। जब बीजेपी सभा करती है, सभी युवा उसमें जाते हैं।" मोदी को बंगाल के रास्ते दिल्ली जीतने के लिए ममता शासन से निराश ऐसे ही वोटरों की आवश्यकता है। क्योंकि, बीजेपी को लगता है कि अगर यूपी जैसे राज्य में उसकी सीटें कुछ कम भी रहती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल (West Bengal)से उसकी भरपाई कर सकती है।

ममता की ताकत क्या है?

ममता की ताकत क्या है?

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने जमीनी स्तर पर खुद को बहुत मजबूत किया है और वह चुनाव भी जी-जान से लड़ रही है। लेकिन, तथ्य यह है कि आज भी राज्य में दीदी का दबदबा बरकरार है। करीब 10 करोड़ आबादी वाले राज्य की 64 साल की मुख्यमंत्री ने इस बार भी अगर वहां ठीकठाक प्रदर्शन कर लिया और गैर-एनडीए, गैर-कांग्रेसी सरकार बनने की संभावना बनी, तो वह उस गठबंधन की एक संभावित पीएम उम्मीदवार बन सकती हैं। मौजूदा लोकसभा में भी टीएमसी (TMC) राज्य की 80 फीसदी लोकसभा सीटों के साथ कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे मजबूत विपक्षी पार्टी है। खासकर 2016 के नोटबंदी के बाद उन्होंने अपनी छवि जिस तरह से एंटी-मोदी नेता के रूप में बनाई है, उससे वो अपनी सभी समकक्षों पर भारी पड़ती हैं। दीदी अभी भी रैलियों में लोगों को नोटबंदी के दौरान की तकलीफों को कुरेदना नहीं भूलतीं। हाल ही में कोलकाता की एक रैली में उन्होंने कहा, "मोदी तुमने हमारा नोट कैंसिल कर दिया, अब बंगाल की जनता तुम्हारा वोट कैंसिल करके तुम्हें बाहर कर देगी।" ऐसे में अगर एनडीए बहुमत से पीछे रहता है और ममता नुकसान के बावजूद कुछ हद तक अपना किला बचाने में कामयाब रहती हैं, तो वह मौजूदा विपक्ष के सामने सबसे मजबूत विकल्प के तौर पर उभर सकती हैं।

बीजेपी की उम्मीदों का कारण

बीजेपी की उम्मीदों का कारण

ये भी तथ्य है कि बीजेपी राज्य के हिंदुओं के एक बड़े वर्ग तक यह मैसेज पहुंचाने में सफल रही है कि ममता राज में उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। बीजेपी आरोप लगाती है कि ममता सरकार बहुसंख्यक हिंदुओं की कीमत पर 2.5 करोड़ मुसलमानों का ही हित साधने में लगी हुई है। इसके लिए वह 2017 के दुर्गा पूजा में ममता के उस निर्देश का भी हवाला देने से नहीं चूकती, जब विवाद को रोकने के लिए मूर्तियों का विसर्जन सिर्फ एक दिन में ही करने के लिए कहा गया था। क्योंकि, उसी दौरान मुसलमानों का भी कोई त्योहार पड़ रहा था। पश्चिम बंगाल बीजेपी के उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार कहते हैं कि, "इससे बंगाली मानसिकता को गहरा धक्का लगा है।" वे कहते हैं कि, "हिंदू सोच रहे हैं, कि अगर हम तृणमूल के साथ रहेंगे, तो धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों का कब्जा हो जाएगा।"

इसके अलावे मोदी के आर्थिक वादे और राष्ट्रवाद के एजेंडे का भी वहां असर दिखता है। लोगों को कहीं न कहीं विश्वास है कि जब ममता ने बंगाल से टाटा को भगा दिया, तो मोदी ने उसे गुजरात में जगह दी और वह स्थापित हुआ। कई किलोमीटर बस की सफर करके कोलकाता में मोदी को सुनने आए 40 साल के एक किसान कृष्णा पांडा कहते हैं, "अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो यहां विकास होगा।" पांडा जैसे बीजेपी समर्थकों को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि बीजेपी सरकार को रोजगार के मसले पर आलोचना झेलनी पड़ रही है और टाटा मोटर्स द्वारा बनाई जाने वाली दुनिया की सबसे सस्ती कार 'नैनो' का भी उत्पादन इस साल से बंद होने वाला है।

ममता का करिश्मा बरकरार!

ममता का करिश्मा बरकरार!

बीजेपी से उलट ममता के समर्थक उन्हें अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखते हैं, क्योंकि पिछले कई मौकों पर वह एंटी-मोदी ब्रिगेड को लीड करते दिखी हैं। चारघाट गांव में ममता को सुनने आए 32 साल के अमानुर मंडल कहते हैं, "पिछले दो साल के अंदर हमें अच्छी सड़क मिली है और पिछले पांच साल में तीन नई स्कूल बिल्डिंगें मिली हैं। हम यहां ममता बनर्जी का समर्थन करने के लिए आए हैं।" कोलकाता स्थित बंगाल इनिसिएटिव के सचिव प्रदीप गुप्ता कहते हैं कि ममता मुद्दों को पकड़ने में बहुत माहिर हैं। उन्हें पता है कि गांवों में ज्यादा निराशा है, इसलिए वह वहीं के विषयों को उठाती हैं। गांव के मुद्दों को उठाकर ही वह यहां तक पहुंची हैं। शायद यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी उनकी लोकप्रियता बरकरार है। उनकी सरकार की कुछ योजनाएं काफी लोकप्रिय मानी जाती हैं, जिसमें छात्रों को मुफ्त में साइकिल, स्कूल जाने वाली लड़कियों को कैश और चावल एवं गेहूं की खरीद पर छूट शामिल हैं। यानी, शहरी क्षेत्रों में हो सकता है कि ममता का ग्राफ गिरता हुआ दिख रहा हो, गांवों में उनका जलवा मोटे तौर पर बरकरार रहने की संभावना है। इसलिए, वह भले ही 2014 जितनी सीटें नहीं ला पाएं, इतनी सीटें लाने का माद्दा तो रखती ही हैं, जिससे मोदी की राह की रोड़ा बन सकें।

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