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2500 टन सोने के लालच में फतेहपुर में खड़ग सिंह के टीले पर पहुंचे तांत्रिक

Daundiya Khera
खागा (फतेहपुर)। संत शोभन सरकार के शिष्‍य ने मीडिया को जब यह बात बतायी कि उन्‍नाव में 1000 टन सोना है और फतेह पुर में 2500 टन तो फतेहपुर के खागा इलाके में लोगों में कौतूहल मच गया है। यहां के आदमपुर के पुरातात्विक स्थल पर अकूत संपदा होने की बात सामने आयी तो स्‍थानीय तांत्रिक धन के लालच में सक्रिय हो गए हैं।

खागा कस्बे के करीब स्थित कुकरा कुकरी ऐलई ग्राम का टीला तथा टिकरी गांव का टीला इन दिनों जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। इन स्थानों पर लोगों की चहल कदमी बढ़ गई है, जबकि कुछ ऐसे विवादास्पद स्थानों के प्रति भी लोग आकर्षित हुए जिन्हें लोगों ने अपना कब्जा जमा रखा है।

जनपद मुख्यालय के भिटौरा ब्लॉक अंर्तगत गंगा तट पर स्थित आदमपुर गांव में सोने का खजाना दबे होने की खबर आयी तो हर व्‍यक्ति अपना दावा ठोकने लगा है। लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं से भूगर्भ में समा चुके पुराने वैभव का समाज व राष्ट्रहित में उपयोग के प्रति संत शोभन सरकार की पहल पर सरकार की सक्रियता को प्रशासन विस्तार दे दे तो खागा की सरजमीं भी देश का भाग्य बदलने में सहायक साबित हो सकती है।

राजा खड़क सिंह का खजाना यहां दबा है!

लोगों का कहना है कि नगर के संस्थापक राजा खड़क सिंह का खजाना यहां दबा हुआ है। कुकरा कुकरी स्थल के बारे में सक्रिय स्‍थानीय पत्रकार सुमेर सिंह का कहना है कि इस टीले के आसपास के ग्रामीणों को कई मर्तबा बहुमूल्य नगीने पत्थर व सिक्के पाये हैं। कुछ साल पहले जब टीले की थोड़ी बहुत खुदाई करायी गई थी तब भग्नावशेष उनके हाथ लगे थे। सुमेर सिंह ने इस संबंध मे उन्होंने पुरातत्व विभाग को पत्र भी लिखा था, लेकिन कोई जवाब न मिलने के कारण निराश हो कर बैठ गए।

अब आदमपुर के खजाने की बात सामने आ गई है। प्राचीन धरोहरों और सामानों के शौकीन कुंवर लाल रामेंद्र सिंह के अनुसार, इस स्थान के चक्कर लगाते हुए उन्हें कई बार ऐसे तांत्रिक भी मिले हैं, जिन्होंने टीले के अंदर बहुमूल्य संपदा होने के का दावा किया है।

फिलहाल इन दिनों इस स्थान पर धनाकांक्षी लोगों की चहल पहल बढ़ गई है। नहर किनारे रहने वाले ग्रामीणों ने बताया कि आजकल शाम को कुछ लोग टीले के आसपास मंडराते देखे जाते हैं। नगर के दक्षिण-पूर्व सीमा के बाहर ऐलई गांव के पहले प्रवेश मार्ग के पास जिस टीले पर माइक्रो टावर लगा है, वह भी इस समय चर्चा में शुमार है।

बताते हैं कि सन् 1984 में जब टावर लगाने के लिए टीले की सतही की खुदाई हुई थी, उस समय भारी मात्रा में चांदी व ताबे के सिक्के निकले थे। अरबी भाषा की लिखाई वाले ये सिक्के कुछ ग्रामीणों के हाथ भी लगे थे, लेकिन डर और लोभ की वजह से लोगों ने सिक्कों के बाबत चुप्पी साध ली। लगभग 200 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैले इस टीले के आसपास अब आबादी बढ़ जाने के बावजूद रात मे टीले का वातावरण रहस्यमय रहता है, ग्रामीण भी टीले में जाने से भय खाते हैं।

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