स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती राम मंदिर आंदोलन, बीजेपी और विहिप के बारे में क्या सोचते थे?
"द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है. शोक के इस समय में उनके अनुयायियों के प्रति मेरी संवेदनाएँ. ओम शांति."
"श्री द्वारका-शारदा पीठ व ज्योतिर्मठ पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य श्रद्धेय स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का ब्रह्मलीन होना संत समाज की अपूरणीय क्षति है. प्रभु श्री राम दिवंगत पुण्यात्मा को अपने परमधाम में स्थान व शोकाकुल हिंदू समाज को यह दुःख सहने की शक्ति दें. ॐ शांति."
इन दोनों शोक संदेशों में पहली श्रद्धांजलि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है और दूसरी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की.
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के लिए लिखे गए इन शोक संदेशों से उनकी क़द और अहमियत का भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में उनके ही आश्रम में 99 वर्ष की अवस्था में रविवार को उनका निधन हो गया था. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को सोमवार को भू-समाधि दी गई.
पिछले एक साल से ज़्यादा समय से उनकी सेहत ठीक नहीं चल रही थी. स्वरूपानंद सरस्वती के अनुयायियों ने हाल ही में उनका 99वाँ जन्मदिन मनाया था.
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स्वरूपानंद सरस्वती का परिचय
एमपी के ही सिवनी ज़िले के दिघोरी गाँव में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में जन्मे स्वरूपानंद सरस्वती का शुरुआती नाम पोथीराम उपाध्याय था.
कहा जाता है कि पोथीराम उपाध्याय ने ईश्वर की तलाश में नौ साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया था. उन्होंने बनारस में संस्कृत पढ़ी और आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा भी लिया.
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, आज़ादी की लड़ाई के दौरान वे जेल भी गए थे.
ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य रहे स्वरूपानंद सरस्वती ने 50 के दशक में संन्यास ले लिया था. साल 1981 में वे शंकराचार्य बन गए.
वे हिंदू धर्म के दूसरे शंकराचार्यों की तुलना में राजनीतिक रूप से कहीं अधिक जागरूक माने जाते थे.
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विरोधाभास
राजनीतिक रूप जागरूकता तो एक तरफ़ रख दें तो कई मुद्दों पर उनके विचारों को लेकर सवाल भी उठे.
जाति व्यवस्था पर उन्हें यक़ीन था और किसी को अछूत कहे जाने से उन्हें कोई गुरेज नहीं था. यहाँ तक कि वे विधवा विवाह के भी ख़िलाफ़ थे.
साल 2016 में जब बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ महाकुंभ के दौरान पहली बार दलितों के लिए अलग से समरसता स्नान का कार्यक्रम रखा, तो स्वरूपानंद सरस्वती ने इसे नौटंकी क़रार दिया था.
लेकिन झारखंड के सिंहभूम ज़िले स्थित अपने आश्रम में आदिवासी ईसाइयों को वापस हिंदू धर्म में धर्मांतरण कराने से स्वरूपानंद सरस्वती के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी सामने आता है.
वे राम मंदिर निर्माण से राजनेताओं को दूर रखना चाहते थे लेकिन राजनीति और धर्म के घालमेल के कभी ख़िलाफ़ भी नहीं रहे.
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन कहते हैं कि वे कांग्रेस के क़रीबी थे और पंडित नेहरू से लेकर कांग्रेस के कई प्रधानमंत्री आशीर्वाद लेने उनके पास आया करते थे.
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कांग्रेस से नज़दीकी और दूरियाँ?
आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने की वजह से कुछ लोग उन्हें 'क्रांतिकारी साधु' कहते थे, तो उनके विरोधियों में एक तबका 'सरकारी साधु' भी कहता था. और इसकी वजह थी राम मंदिर आंदोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी से उनकी नज़दीकी. उस दौर में वे देश के सबसे प्रभावशाली धार्मिक शख़्सियतों में गिने जाने थे.
अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी ने नरसिंहपुर ज़िले के झोतेश्वर गाँव में उनके द्वारा बनवाए गए शिव मंदिर का उद्घाटन किया था. पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जब इंदिरा गांधी को जाने से रोका गया, तो इंदिरा गांधी ने उनके पास अपने राजनीतिक सचिव को भेजा था.
कहा जाता है कि 1985 में राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से पहले उनकी सलाह भी ली थी. लेकिन एक दौर वो भी था, जब पचास के दशक में उन्होंने ग़ैर कांग्रेसवाद का झंडा थामा था. गोवध पर प्रतिबंध की मांग को लेकर चलाए गए आंदोलनों के सिलसिले में उन्हें 1954 से 1970 के बीच तीन बार जेल भेजा गया.
साल 2017 में जब कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने केरल में बीफ़ पार्टी की, तो स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राहुल गांधी को फ़ोन करके इसे लेकर अपनी नाराज़गी जताई थी.
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राम मंदिर मुद्दे पर विहिप से मतभेद
विश्व हिंदू परिषद और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती दोनों ही अयोध्या मुद्दे पर राम मंदिर निर्माण के पक्ष में थे, लेकिन इसके बावजूद दोनों के बीच गहरे मतभेद भी थे.
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन कहते हैं, "स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे. इस वजह से विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जो कट्टरपंथी लाइन थी, वे कभी उससे सहमत नहीं रहे. वे राम मंदिर आंदोलन में विहिप और आरएसएस की भूमिका को विशुद्ध रूप से राजनीतिक मानते थे. उनका कहना था कि ये वोट बटोरने का माध्यम नहीं होना चाहिए."
स्वरूपानंद सरस्वती ने राम मंदिर को राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने का विरोध किया था.
वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन कहते हैं, "इसलिए बीजेपी और आरएसएस के लोगों ने उन्हें कांग्रेसी पिट्ठू कहना शुरू कर दिया था. विहिप और आरएसएस जिस तरह से बाक़ी शंकराचार्यों को सम्मान दिया करता था, वैसा सम्मान इन्हें कभी नहीं दिया."
बीबीसी के पत्रकार सौतिक बिस्वास ने जब इंडिया टुडे मैगज़ीन के लिए उनसे जुलाई, 1993 में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर विश्व हिंदू परिषद के दावे को लेकर सवाल पूछा था तो उनका जवाब था, "विहिप के लिए राम मंदिर केवल सत्ता हासिल करने का ज़रिया है, लेकिन हमारे लिए ये लक्ष्य है."
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बीजेपी पर नज़रिया
स्वरूपानंद सरस्वती और बीजेपी की किसी बात पर बनी हो, इसकी नज़ीर शायद ही मिलती है.
जब बीजेपी ने वाराणसी में 'हर हर मोदी' का नारा दिया, तो इसका विरोध करने वालों में स्वरूपानंद सरस्वती भी थे.
मई, 2015 में उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के पीएम मोदी के दावे के बावजूद देश में रिश्वतखोरी उफान पर है. ऐसा समाज के नैतिक मूल्यों में गिरावट की वजह से हो रहा है.
साल 2018 में बीजेपी की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी और आरएसएस ने हाल के सालों में हिंदू धर्म के आदर्शों को सबसे बड़ा नुक़सान पहुँचाया है.
उन्होंने ये भी कहा कि ये आश्चर्यजनक है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत हिंदुत्व के बारे में कुछ नहीं जानते हैं.
कुछ बीजेपी नेताओं के कथित रूप से बीफ कारोबार से जुड़े होने को लेकर भी वे तल्ख रहे थे. उन्होंने कहा था कि बीजेपी नेता बीफ़ के सबसे बड़े निर्यातक हैं और ये वही दोहरे चेहरे वाली बीजेपी है, जो गोहत्या का विरोधी होने का दिखावा करती है.
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ज्योतिर्मठ पीठ को लेकर विवाद
1960 के दशक में शुरू हुए बद्रीनाथ के ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य पद पर दावे की लड़ाई स्वामी वासुदेवानंद निचली अदालत में हारने के बाद साल 1989 में इलाहाबाद हाई कोर्ट लेकर गए.
उत्तराखंड राज्य के गठन हो जाने के बाद भी इस मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में ही होती रही.
इस मामले में दिलचस्प बात ये थी कि जहाँ एक ओर स्वामी स्वरूपानंद को कांग्रेस का समर्थन हासिल था, तो दूसरी तरफ़ स्वामी वासुदेवानंद को विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी का समर्थन हासिल था.
57 साल तक चली इस अदालती लड़ाई का अंत सितंबर, 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के साथ हुआ. हालांकि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य पद पर उनके दावे को लेकर विवाद हमेशा बना रहा.
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद पर उनको समाधि देने से पहले ही सोमवार को उत्तराधिकारियों का चयन कर लिया गया.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ का प्रमुख बनाया गया है. इनके नामों की घोषणा शंकराचार्य के पार्थिव शरीर के सामने ही की गई.
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