सुषमा स्वराज का संन्यास: मोदी के पास ही हैं सारे सवालों के जवाब | नज़रिया
विज्ञान के इस युग में जब मनुष्य की औसत आयु बढ़ रही हो, 66 वर्ष कुछ ज्यादा नहीं होते. और बात राजनीति की हो, तब तो बिल्कुल ही नहीं. पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ऐसा नहीं मानतीं. उन्होंने इसी उम्र में चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है.
लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उनका यह कहना कि वे अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी, अप्रत्याशित पर अपेक्षित बात लगती है. अप्रत्याशित इसलिए कि जब उनकी ही पार्टी में अस्सी और नब्बे साल के नेताओं को रिटायरमेंट शब्द से ही एलर्जी हो उनकी यह घोषणा चौंकाती तो है. अपेक्षित इसलिए कहा कि उनके स्वास्थ्य के बारे में जो जानते हैं, वे पिछले कुछ समय से ऐसी किसी घेषणा की अपेक्षा कर रहे थे.
ऐसे लोगों में पहला नाम शायद उनके पति और पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल का है. सुषमा स्वराज की इस घोषणा के बाद उनके पति ने कहा कि 'एक समय के बाद मिल्खा सिंह ने भी दौड़ना बंद कर दिया था. आप तो पिछले 41 साल से चुनाव लड़ रही हैं.'
अगला लोकसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा करके उन्होंने एक स्वस्थ्य परम्परा को आगे बढ़ाया है. हालांकि ऐसा करने वाले राजनीति में अब भी अपवाद स्वरूप ही हैं. इस तरह का पहला कदम उठाने वाले थे नानाजी देशमुख, जिन्होंने यह कह कर कि 'नेताओं को साठ साल की उम्र में रिटायर हो जाना चाहिए', रिटायर हो गए.
'राजनीति की सुनील गावस्कर'
पर लाल कृष्ण आडवाणियों, मुरली मनोहर जोशियों, यशवंत सिन्हाओं और अरुण शौरियों के इस दौर में लगता है कि जिस तरह वे 25 साल की बाली उमर (राजनीति की दृष्टि से) में राजनीति में आई थीं उसी तरह बाली उमर में ही रिटायर हो रही हैं. ऐसे ऐसा करके उन्होंने अगर किसी को सबसे ज्यादा असहज किया है तो अपने राजनीतिक गुरु लाल कृष्ण आडवाणी को. पर इस एक घोषणा से सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति की सुनील गावस्कर बन गई हैं. उनसे भी लोग वही सवाल करेंगे जो गावस्कर से पूछा थ कि 'अभी क्यों'.
सुषमा स्वराज एक प्रखर और ओजस्वी वक्ता, प्रभावी पार्लियामेंटेरियन और कुशल प्रशासक हैं. एक समय था जब भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद सुषमा और प्रमोद महाजन सबसे लोकप्रिय वक्ता थे. फिर बात संसद की हो या सड़क की. सुषमा स्वराज की गिनती भाजपा के डी(दिल्ली)-फ़ोर में होती थी. उनके अलावा बाकी तीन प्रमोद महाजन, अरुण जेतली और वेंकैया नायडू थे. भाजपा की दूसरी पीढ़ी के सभी नेताओं की तरह ये लोग भी अटल-आडवाणी और ख़ासतौर से आडवाणी के बढ़ाए हुए नेता हैं.
साल 2009 से 2014 तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में सुषमा स्वराज का कार्यकाल उनके संसदीय जीवन का सर्वश्रेष्ठ काल था. साल 2006 में प्रमोद महाजन के निधन और लोकसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनने के बाद माना जा रहा था कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों में उन्होंने बाजी मार ली है.
इन सब ख़ूबियों के बावजूद सुषमा स्वराज कभी भाजपा की अध्यक्ष नहीं बन पाईं. इसके दो कारण थे. एक, संगठन के काम की बजाय संसदीय कार्य में उनकी रुचि ज़्यादा थी. दूसरा, इस डी-फ़ोर में वे अकेली थीं जिनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नहीं है. हालांकि उनके पिता संघ के प्रभावशाली लोगों में थे. पर उनके पति जॉर्ज फ़र्नांडिस के साथी थे जिन्हें जनता पार्टी में चंद्रशेखर और जॉर्ज फ़र्नांडिस ने बढ़ाया.
जनता पार्टी का विभाजन हुआ तो वे भाजपा में आ गईं. विभिन्न दलों में जो समाजवादी नेता हैं उनकी सहानुभूति और स्नेह सुषमा स्वराज को मिलता रहा है. अपने सहज स्वभाव से विरोधियों को निरुत्तर कर देने की उनकी क्षमता के कारण उनके पार्टी में जितने दोस्त हैं उससे कम बाहर नहीं हैं. पिछले चार दशकों में वे 11 चुनाव लड़ीं, जिसमें तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़ीं.
पार्टी को कमी खलेगी?
साल 2013 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनने से रोकने की लाल कृष्ण आडवाणी की मुहिम में वे आडवाणी के साथ थीं. इस मुहिम में उन्होंने आखिर तक आडवाणी का साथ दिया. पर 2014 में मोदी की जीत के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
माना जा रहा था कि मोदी उनको इस अपराध के लिए क्षमा नहीं करेंगे. पर आप इसे मोदी का बड़प्पन कहें या सुषमा स्वराज की योग्यता या फिर उन्हें साथ रखने की ज़रूरत, मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में वह स्थान दिया जो पहले कभी नहीं मिला था. सुषमा स्वराज ने भी बदले वातावरण में गरिमापूर्ण व्यवहार किया. पिछले साढ़े चार साल में उन्होंने न तो ऐसी कोई बात कही और न ही कोई काम किया जिससे यह ध्वनि भी निकले कि वे मोदी के ख़िलाफ़ हैं.
इन सब बातों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सुषमा स्वराज मोदी-शाह की भाजपा में कुछ अजनबी-सी हैं. पार्टी के राजनीतिक निर्णयों में उनकी भूमिका बहुत सीमित है. वह भी संसदीय बोर्ड के सदस्य की हैसियत से.
अपने स्वास्थ्य के कारण भी वे पिछले कुछ समय से चुनावी राजनीति ख़ासतौर से चुनाव प्रचार में बहुत सक्रिय नहीं हैं. उनकी जगह अमित शाह और और योगी आदित्यनाथ जैसे वक्ताओं ने ले ली है. इसलिए चुनाव प्रचार में उपयोगिता की दृष्टि से पार्टी को उनकी कमी खलेगी ऐसा लगता नहीं.
सुषमा स्वराज ने अपने बयान में सिर्फ़ इतना कहा है कि वो अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी. इसके आगे उन्होंने कुछ नहीं कहा है. ज़ाहिर है कि उन्होंने आगे का फ़ैसला शायद पार्टी पर छोड़ दिया है. अभी यह सवाल बना रहेगा कि 2019 में दोबारा सत्ता में आने की स्थिति में क्या पार्टी उन्हें राज्यसभा में लाकर फिर मंत्री बनाएगी. या यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि क्या मोदी उन्हें फिर मंत्री बनाना चाहेंगे. यह भी कि क्या उन्हें आडवाणी और जोशी की तरह मार्गदर्शक मंडल में तो नहीं भेज दिया जाएगा?
उनके स्वभाव और अब तक के राजनीति जीवन को देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि वे मार्गदर्शक मंडल की सदस्य बनना स्वीकार करेंगी. यह भी तय है कि वे यशवंत सिन्हा भी नहीं बनेंगी. तो क्या पार्टी उन्हें कोई संवैधानिक पद देगी. या आडवाणी, जोशी की तरह उन्हें संवैधानिक पद देना जोख़िम मोल लेना माना जाएगा. सवाल बहुतेरे हैं, लेकिन जवाब कोई नहीं है.क्योंकि जवाब केवल एक व्यक्ति के पास है, वह हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. सवाल है कि उनसे पूछे कौन.
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