रेल भवन में दिन-रात काम में जुटे सुरेश प्रभु

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)। रेलवे विभाग का कायाकल्प करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुरेश प्रभु को जिम्मेदारी सौंपी है और वे उस काम में दिन-रात एक करने लगे हैं। सुबह 9 बजे रेल भवन पहुंच जाते हैं प्रभु और फिर उनका घर जाने का कोई टाइम नहीं है। वे अफसरों को आतंकित नहीं करते। सारा काम प्रेम से करते हैं प्रभु। जानकारों ने बताया कि पुरानी योजनाओं को तुरंत लागू करने और नई की तैयारी में लगे रहते हैं सुरेश प्रभु।

Suresh Prabhu working overtime to improve Railways

खुलापन और प्रभु

उन्हें लंबे समय से जानने वाले कहते हैं कि खुलापन हमेशा सुरेश प्रभु की कामकाजी शैली का खास पहलू रहा हैं। यहां तक कि इसकी वजह से उनके पद पर भी बन आई क्योंकि वह अपना काम जरूरत से ज्यादा बेहतर कर रहे थे, यह कुछ उसी तरह की भावना थी जिसमें असुरक्षा की ग्रंथि से ग्रस्त मुखिया को अपने मातहत कुशल प्रबंधक फूटी आंख नहीं सुहाते। अगर कभी कोई सही आदमी अपने लिहाज से गलत पार्टी में रहा तो यह बात शिव सेना में रहे सुरेश प्रभु पर सटीक बैठती है।

बड़े उठाने होंगे

रेलवे को जानने वाले कहते हैं कि प्रभु को भारतीय रेलवे में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाने होंगे। जैसे कि नौकरशाही का ढांचा बदलना होगा, वित्तीय मॉडल में बदलाव करना होगा, प्रशासनिक साम्राज्यों को नेस्तनाबूद करना होगा, जो भ्रष्टाचार की जड़ बने हुए हैं। मगर यहां प्रभु को अलग तरह का दबाव झेलना होगा। उनके पूर्ववर्ती सदानंद गौड़ा को हटाने की एक वजह उनका नरम रवैया भी थी, जो रेलवे की अभेद्य नौकरशाही से पार पाने में भी बेहद सरल थे प्रभु।

बहुत उम्मीदें भी हैं। एक सुधारक के रूप में तंत्र में कई लोग उन्हें पी चिदंबरम का विनम्र अवतार मान रहे हैं। उनके अंदर विषय को गहराई से समझकर उसका निदान तलाशने की क्षमता है। जानकारों का उम्मीद है कि सुरेश प्रभु रेलवे का कायाकल्प कर देंगे।

अटल सरकार में भी

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली राजग सरकार के कार्यकाल में प्रभु को सबसे पहले पर्यावरण मंत्री बनाया गया, उसके बाद वह रसायन एवं उर्वरक मंत्री बनाए गए और फिर उन्हें रंगराजन कुमारमंगलम के निधन के बाद बिजली मंत्री की जिम्मेदारी दी गई।

जब थामा भाजपा का दामन

अपने आखिरी कार्यकाल में यही बात निराशाजनक थी कि सुरेश प्रभु के प्रति वाजपेयी के लगाव और सम्मान के भाव के बावजूद वह शिव सेना के रुख का विरोध नहीं कर पाए और उन्हें प्रभु को हटाना पड़ा। शुक्र है कि नरेंद्र मोदी के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। मगर फिर भी प्रभु को लगा कि अब बहुत हुआ और उन्होंने शिव सेना छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।

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