'नाबालिग से छेड़छाड़ रेप की कोशिश' Supreme Court ने क्यों पलटा इलाहाबाद HC का विवादित आदेश, कोर्ट ने क्या कहा?
Supreme Court Allahabad HC Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने रेप के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस विवादित फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के साथ हुई बदसलूकी को बलात्कार का प्रयास (Attempt to Rape) नहीं माना गया था।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इलाहाबाद HC के उस तर्क को खारिज कर दिया है जिसमें आरोपी के कृत्य को केवल प्रिप्रेशन के स्तर पर माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब इरादा में बदल जाता है, तो वह प्रयास की श्रेणी में आता है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट ने गंभीर अपराध को हल्का कर गलत कानूनी दृष्टिकोण अपनाया और रेप के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों को अनुचित तरीके से कमतर अपराध में बदल दिया।
What is Allahabad HC Verdict: क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला?
दरअसल, मार्च 2025 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना और उसे पुलिया के नीचे घसीटना बलात्कार का प्रयास नहीं है। अदालत का तर्क था कि आरोपी ने केवल तैयारी की थी और वह बलात्कार करने के चरण तक नहीं पहुंचा था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि आरोपी द्वारा नाबालिग लड़की को पकड़ना, उसके स्तन दबाना और उसे पुलिया (culvert) के नीचे खींचना, रेप का प्रयास नहीं बल्कि केवल उसकी तैयारी मानी जाएगी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी पर लगे IPC की धारा 376/511 (रेप का प्रयास) और POCSO एक्ट की धारा 18 के आरोपों को हटाकर कम गंभीर धाराओं में बदल दिया था। इस फैसले को लेकर देशभर में तीखी आलोचना हुई थी। इसे महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों के प्रति न्यायिक असंवेदनशीलता का उदाहरण बताया गया था।
Attempt to Rape vs Preparation पर सुओ मोटो कार्रवाई कैसे शुरू हुई?
यह पूरा मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता जो 'We the Women of India' NGO की संस्थापक ने तत्कालीन CJI को पत्र लिखकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को कानूनी रूप से गलत और अमानवीय बताया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर रोक लगाई और दिसंबर 2025 में पूरे फैसले पर स्टे लगाया और अब उसे पूरी तरह रद्द कर दिया।
SC ने फैसला पलटते हुए क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के इस फैसले को पूरी तरह गलत बताया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया ने कहा कि हाईकोर्ट ने तैयारी और प्रयास के बीच के अंतर को पूरी तरह गलत तरीके से समझा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपों को देखने मात्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि आरोपी केवल तैयारी नहीं कर रहा था बल्कि उसने अपने इरादे को अंजाम देना शुरू कर दिया था।
आरोपी पीड़िता को घर छोड़ने के बहाने मोटरसाइकिल पर ले गया, पुलिया के पास रोका, उसे घसीटा और यौन हमले किए। वह केवल तभी भागा जब पीड़िता की चीख सुनकर राहगीर वहां पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 376/511 और पोक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 18 के तहत बलात्कार के प्रयास के मूल आरोपों को बहाल कर दिया है।
POCSO Act Sensitivity Guidelines: न्यायिक संवेदनशीलता के लिए नई गाइडलाइन्स का निर्देश
अदालत ने केवल कानूनी गलती को ही नहीं सुधारा, बल्कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायपालिका की संवेदनहीनता पर भी गहरी चिंता जताई। विशेष समिति का गठन करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) से अनुरोध किया है कि वह पूर्व न्यायाधीश अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय विशेषज्ञों की समिति बनाए। यह समिति यौन अपराधों और संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में करुणा और सहानुभूति विकसित करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करेगी।
कोर्ट को 'हार्डवर्ड' नहीं, भारतीय भाषा के इस्तेमाल की जरूरत
CJI सूर्यकांत ने निर्देश दिया कि नए दिशा-निर्देश सरल और सुलभ भाषा में होने चाहिए। उन्होंने पिछले 'जेंडर स्टीरियोटाइप हैंडबुक (2023)' की आलोचना करते हुए कहा कि वह बहुत अधिक हार्वर्ड वाली भाषा और टेक्निकल थी। अदालत चाहती है कि नए नियम ऐसे हों जिन्हें आम आदमी और विशेषकर बच्चे व पीड़ित आसानी से समझ सकें।
यह फैसला न सिर्फ एक गलत न्यायिक आदेश को सुधारने का उदाहरण है बल्कि यह भी दिखाता है कि यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख आने वाले समय में निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स के लिए एक स्पष्ट संदेश है।
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