पुलिस अफसरों को भी 'मोरल पुलिसिंग' का अधिकार नहीं, जानें सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की इतनी सख्त टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट ने सीआईएसएफ के एक कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी के मामले में गुजरात हाई का फैसला पलट दिया है। इतना ही नहीं अदालत ने हाई कोर्ट और मोरल पुलिसिंग को लेकर भी बहुत ही कड़ी टिप्णियां की हैं। मामला 21 साल पुराना है, लेकिन लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह अपने अंतिम मकाम पर पहुंचा है और सर्वोच्च अदालत ने इस केस में सीआईएसएफ की कार्रवाई पर पूरी तरह से यकीन करते हुए उसपर मुहर लगा दी है। हैरानी की बात ये है कि इस केस में एक पुलिस वाले को अपने ही साथी पुलिस वाले के साथ अभद्र हरकत करने का दोषी पाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने रात के समय एक युवा जोड़े को परेशान करने के मामले में बहुत ही सख्त टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि पुलिस अधिकारियों को भी मोरल पुलिसिंग करने की आवश्यकता नहीं है। इस आधार पर अदालत ने एक सीआईएसएफ कर्मी की सेवा से बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए गुजरात हाई कोर्ट का फैसला बदल दिया है। विभागीय जांच में सीआईएसएफ के एक कॉन्स्टेबल को रात के समय एक युगल को प्रताड़ित करने का दोषी पाया गया था। दरअसल, इस मामले में सीआईएसएफ ने गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती थी। हाई कोर्ट ने सीआईएसएफ ऑफिसर संतोष कुमार पांडे को फिर से सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया था, जिसे कदाचार के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था।

क्या है मामला ?

क्या है मामला ?

2001 में संतोष कुमार पांडे गुजरात के वडोदरा में आईपीसीएल टाउनशिप के ग्रीनबेल्ट इलाके में कॉन्स्टेबल के तौर पर नाइट ड्यूटी पर तैनात था। उसने रात के 1 बजे के करीब अपने अपने एक सहयोगी को मोटरसाइकिल पर अपनी मंगेतर के साथ जाते देखा। पांडे ने बाइक सवार जोड़े को रोक लिया, जो कि गरबा देखने जा रहे थे। उसने अपने सहयोगी से उसकी मंगेतर के साथ कुछ समय बिताने की मांग की। बाद में वह युगल को तब जाने देने के लिए राजी हुआ जब उसके सहयोगी ने अपनी घड़ी पांडे को सौंप दी। घटना की गवाह वह युवती भी थी।

युवती ने क्या बयान दिया था ?

युवती ने क्या बयान दिया था ?

बाद में जब इस मामले की शिकायत पीड़ित की ओर से हुई तो विभागीय जांच में कॉन्स्टेबल पांडे के आचरण को गलत पाया गया। इसके आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस मामले में उस युवती ने भी जांच अधिकारी के सामने अपना बयान दर्ज कराया था। हालांकि, उसने कहा था कि वो अपने मंगेतर और पांडे के बीच की बातचीत नहीं सुन पाई थी। हालांकि, उसने यह बयान जरूर दिया कि उसने अपने मंगेतर से पांडे को घड़ी लेते हुए जरूर देखा था।

हाई कोर्ट से कैसे बच गया था दोषी ?

हाई कोर्ट से कैसे बच गया था दोषी ?

दोषी कॉन्स्टेबल ने इसी आधार सीआईएसएफ की कार्रवाई को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी कि महिला ने उसके खिलाफ बयान नहीं दिया। जिसपर अदालत ने उसे 50 फीसदी बकाया वेतन देने के साथ फिर से नौकरी में वापस लेने का आदेश दिया था। तब जाकर सीआईएसएफ इस फैसले के खिलाफ सुप्रीमे कोर्ट पहुंची थी, जहां पर हाई कोर्ट के फैसले को अब पलट दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले पर भी कहा है कि 'यह कानून और न्यायिक पुनर्विलोकन पर ध्यान देने और उसके ठीक से अमल में लाने में असफल रहा है।'

'पुलिस अफसरों को भी 'मोरल पुलिसिंग' का अधिकार नहीं'

'पुलिस अफसरों को भी 'मोरल पुलिसिंग' का अधिकार नहीं'

अब सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि सिर्फ इस वजह से कि महिला ने कहा कि उसने दोनों के बीच की बातचीत नहीं सुनी थी, इसलिए वह पुलिसकर्मी दोषमुक्त नहीं हो जाता है। कोर्ट ने कहा है, 'वह एक जवान लड़की थी और यह स्वाभाविक है कि उसे यह अजीब लगा होगा। यह समझा जा सकता है कि उसने निजी सवालों का जवाब देना पसंद नहीं किया होगा।' अदालत ने इस केस को 'चौंकाने वाला और परेशान करने वाला' माना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 'हमने पाया है कि इस मामले में तथ्य चौंकाने और परेशान करने वाले हैं। प्रतिवादी संख्या-1 संतोष कुमार पांडे एक पुलिस अधिकारी नहीं हैं, यहां तक कि पुलिस अधिकारियों को भी मोरल पुलिसिंग करने की आवश्यकता नहीं है, कि फिजिकल फेवर या चीजों की मांग करे।'(सीआईएसएफ की तस्वीरें-सांकेतिक)


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