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'महिलाओं के लिए स्वास्थ्य रियायत नहीं, अधिकार है', SC का ऐतिहासिक फैसला, हर बच्चे के लिए Maternity leave जरूरी

Supreme Court maternity leave judgment: भारत में अक्सर मैटरनिटी लीव पर चर्चा होती रहती है जिसमें समाज दो भागों में बटा नजर आता है। एक भाग इसे महिलाओं के अधिकार और मातृत्व सम्मान के तौर पर देखता है वहीं दूसरा इसे महिलाओं को दी जानी वाली प्रीविलेज बता कर इसका विरोध करता है।

अब इसी मातृत्व अवकाश यानी मैटरनिटी लीव पर सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जो महिलाओं के मैटरनिटी राइट्स को एक नई संवैधानिक बहस छेड़ दी है। इस फैसले का असर न केवल एक महिला शिक्षक के जीवन पर पड़ेगा, बल्कि देशभर की लाखों महिलाओं के लिए यह राहत और समानता का संदेश भी है।

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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुनवाई के दौरान आया है। आईए विस्तार से जानते हैं सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? देश में मातृत्व अवकाश को लेकर क्या कहता है कानून..

क्या है पूरा मामला?

तमिलनाडु की एक महिला सरकारी स्कूल शिक्षक, जिनकी पहले की शादी से दो बच्चे थे और जिनकी कस्टडी उनके पूर्व पति के पास है, ने अपनी दूसरी शादी के बाद जब तीसरे बच्चे के लिए 26 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की मांग की, तो राज्य सरकार ने उसे अस्वीकार कर दिया।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए केवल 12 सप्ताह का अवकाश देने का आदेश दिया कि महिला पहले से दो जीवित बच्चों की मां हैं और राज्य की 'दो बच्चे' की नीति के तहत उन्हें सीमित लाभ मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? (What did the Supreme Court say)

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय ओका और उज्जल भुइयां की न्यायाधीशों की पीठ ने साफ शब्दों में कहा, "जीवन का अधिकार स्वास्थ्य के अधिकार को भी शामिल करता है। सम्मानजनक जीवन जीने और निजता का अधिकार, अब अनुच्छेद 21 के तहत स्वीकार किए जा चुके हैं।"

मद्रास उच्च न्यायालय ने पहले यह निर्णय दिया था कि राज्य की 'दो बच्चे' की नीति के अनुसार तीसरे बच्चे पर केवल 12 सप्ताह का अवकाश दिया जा सकता है। इसके पीछे यह तर्क था कि महिला पहले ही दो बच्चों की मां हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस 'संकीर्ण दृष्टिकोण' को खारिज कर एक बड़ी राहत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह अधिकार सिर्फ संख्याओं से तय नहीं हो सकता। अगर महिला ने पहले जन्म लेने वाले बच्चों के लिए सेवा में आने से पहले कभी मातृत्व अवकाश नहीं लिया, तो उनके वर्तमान अधिकारों को उस आधार पर सीमित करना अनुचित है।

मैटरनिटी लीव पर क्या कहता है कानून?

भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम पहली बार 1961 में लागू किया गया था, जिसमें महिलाओं को 12 सप्ताह का भुगतानयुक्त अवकाश दिया गया। 2017 में इस कानून में संशोधन किया गया और मातृत्व अवकाश को बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया। साथ ही, 10 या अधिक कर्मचारियों वाले कार्यालयों को क्रेच (Creche) सुविधा देने के लिए बाध्य किया गया। हालांकि इस बदलाव का स्वागत कई महिला अधिकार समूहों ने किया, लेकिन कुछ लोगों ने इसे महिलाओं को दिए गए 'रियायतों' के रूप में देखा।

टीमलीज नामक एचआर सेवा कंपनी के एक अध्ययन के रिपोर्ट के मुताबिक, इस फैसले के बाद 2.6% नौकरियों पर असर पड़ा और महिलाओं की नियुक्ति दर में गिरावट देखी गई। विश्व बैंक के 2017 के एक शोध पत्र में भी पाया गया कि छोटे बच्चों की माताओं की नौकरी में हिस्सेदारी अन्य की तुलना में कम हो जाती है।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल 6% महिलाएं नौकरी करती हैं, जिन्हें मातृत्व लाभ मिल सकता है। बाकी 94% महिलाएं कृषि, निर्माण, छोटे उद्योगों जैसे अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जहां मातृत्व अवकाश की कोई सुविधा नहीं है। यह असमानता भारत में मातृत्व को 'अधिकार' से अधिक 'समझौता' बना देती है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की माताओं की रोजगार दर महज़ 47.6% है, जबकि पिता की 87.9% और बिना बच्चों वाली महिलाओं की 54.4%। इससे पता चलता है कि मातृत्व महिलाओं के लिए पेशेवर जीवन में एक बाधा बन जाती है।

यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने हाल ही में चेतावनी दी कि दुनिया भर में प्रजनन दर में तेज गिरावट देखी जा रही है। लोगों की इच्छा भले दो या अधिक बच्चों की हो, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और पेशेवर कारणों से वे छोटे परिवार चुनने को मजबूर हैं।

क्या अब पितृत्व अवकाश पर चर्चा जरूरी है?

जहाँ मातृत्व अवकाश पर विस्तार हुआ है, वहीं पितृत्व अवकाश अभी भी केवल प्रतीकात्मक है - अधिकतर जगहों पर केवल 10 दिन या 2 सप्ताह। अगर पितृत्व अवकाश भी मातृत्व अवकाश के समकक्ष किया जाए तो यह तीन बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकता है:

  • लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम होगा,
  • महिलाओं का करियर ब्रेक कम होगा और कार्यबल में बने रहने की संभावना बढ़ेगी,
  • पिता और बच्चे के बीच संबंध प्रगाढ़ होंगे।

एक नई शुरुआत की ओर....

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल एक शिक्षक की व्यक्तिगत जीत है, बल्कि यह मातृत्व को सम्मानजनक दृष्टिकोण से देखने की दिशा में समाज की सोच को बदलने वाला है। यह निर्णय इस ओर इशारा करता है कि मातृत्व कोई बोझ नहीं, बल्कि एक अधिकार है - और यह अधिकार किसी संख्या, नीति या पूर्वग्रह से सीमित नहीं किया जा सकता।

अब समय आ गया है कि भारत में मातृत्व और पितृत्व दोनों को समान महत्व दिया जाए, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ एक अधिक समावेशी, समानता-आधारित समाज में पनप सकें।

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