आवारा कुत्ते बन चुके हैं बहुत बड़ी समस्या, इससे कैसे निपटें?
देश में और खासकर बड़े शहरों में आवारा कुत्ते बहुत गंभीर समस्या बन चुके हैं। इसका समाधान सरकार और समाज सबको मिलकर ही निकालना पड़ेगा। कई देशों ने इस दिशा में कदम उठाए भी हैं।

देश में हाल के दिनों में कुछ घटनाएं ऐसी घटी हैं, जिसके बाद आवारा कुत्ते गंभीर समस्या बनकर उभरे हैं। खासकर बड़े शहरों में यह भयानक शक्ल अख्तियार कर चुका है। क्योंकि, यहां आवारा कुत्तों से पीड़ित लोगों की बड़ी जमात है तो उन कुत्तों के संरक्षण में ऐसे लोग कूद जाते हैं, जिनकी अपनी एक मजबूत लॉबी है। इसकी वजह से कई बार टकराव की स्थिति भी पैदा हो जाती है। हालात ऐसे भी हो जाते हैं कि इसके चलते कानून-व्यवस्था के भी हालात पैदा हो जाते हैं। आइए समझते हैं कि यह समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है और इसका क्या समाधान हो सकता है।

जानलेवा बन रहे हैं आवारा कुत्ते!
पिछले कुछ समय में देश के कुछ शहरों में ऐसी घटनाएं देखनों को मिली हैं, जिसमे आवारा कुत्तों ने मासूमों की जान तक ले ली है। हैदराबाद में चार साल के एक मासूम की कुत्तों के सामने संघर्ष करके हार जाने का सीसीटीवी वीडियो वायरल हो चुका है। इसी महीने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि एनसीआर इलाके में दो मासूम भाइयों की मौत कुत्ते के काटने की वजह से हुई है। एक सीसीटीवी में स्कूटी चला रही महिला खुद को और अपने बच्चों को पीछा कर रहे आवारा कुत्तों से बचाने के चक्कर में हादसे का शिकार हो जाती है।

विवाद की बड़ी वजह बन रहे हैं आवारा कुत्ते
आज बड़े शहरों में आवारा कुत्ते बहुत बड़े विवाद की वजह हैं। एक तरफ तो वो हैं, जिनकी वाकई आवारा कुत्तों की वजह से जिंदगी दूभर हो चुकी है। वह ऐसी घटनाएं देख चुके हैं, जिसकी वजह से वह आवारा कुत्तों के डर से सैर पर निकलना बंद कर चुके हैं। बच्चों के खेलने से रोकने लगे हैं। दूसरी तरफ वह ऐक्टिविस्ट जमात है, जो यह माने बैठे हैं कि यह जानवर बिना छेड़े कुछ कर ही नहीं सकते! जो शहरी सुकून से जीना चाहते हैं, उनमें ऐसे लोगों ने कानून का ऐसा डर बना दिया है कि वह अलग ही दहशत में जीते हैं।

रेबीज से मौते के मामले में भारत का हिस्सा 36%
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में एक अनुमान के मुताबिक करीब 6.2 करोड़ आवारा कुत्ते हैं। दूसरी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कुत्तों के काटने की वजह से होने वाली रेबीज बीमारी से मौत के मामले में भारत की भागीदारी 36% है। देश में कुत्तों की बहुत बड़ी संख्या हालात की गंभीरता को खुद बयां कर रहे हैं।

'पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम में ढिलाई मुख्य कारण'
मुंबई में आवारा कुत्तों के कल्याण के लिए काम करने वाली एक संस्था के सीईओ अबोध अरस भी मानते हैं कि डॉग बाइट्स एक समस्या बन चुकी है। उनका कहना है, 'कोई नहीं चाहता कि ऐसी घटनाएं हैं, यह बहुत ही दुखद हैं। कुछ शहरों को छोड़ दें तो इसका मुख्य कारण ये है कि पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम पर अमल नहीं किया जाता है।'

सिक्किम रेबीज के मामले में एक उदाहरण- ऐक्टिविस्ट
केरल स्थित एक एनिमल राइट्स संगठन दया की संस्थापक सदस्य अम्बिली पुकराकल का कहना है, 'जब कुछ समय तक सही तरीके से काम किया जाता है, तो टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रम भी सफल हो सकते हैं।' उन्होंने सिक्किम का उदाहरण दिया है। उनके मुताबिक , '(सिक्किम में) SARAH कार्यक्रम चलाया गया, जो कि बड़े पैमाने पर नसबंदी और वार्षिक एंटी-रेबीज टीकाकरण कार्यक्रम था, इसके चलते सिक्किम में बहुत कम रेबीज केस हैं।'

एजीओ और स्थानीय प्रशासन गंभीर नहीं-पीड़ित
लेकिन, समस्या इतनी आसान नहीं लगती, जितना कि जानवारों के अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग दावा करते हैं। कई पीड़ित तो इस समस्या के लिए ऐसे ऐक्टिवस्ट को भी जिम्मेदार मानते हैं। मसलन, नागपुर के विजय तालेवार को 2006 में कुछ कुत्तों ने बुरी तरह जख्मी कर दिया था। उन्होंने पीआईआल दर्ज किया कि नागपुर में कितने आवारा कुत्ते हैं। निगम ने हलफनामे में दावा किया कि 10,000 हैं। लेकिन, उसी ने यह भी कहा कि 40,000 कुत्तों की वह नसबंदी कर चुके हैं। उनका आरोप है कि एजीओ और स्थानीय प्रशासन इस समस्या के प्रति गंभीर नहीं हैं।

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रेसिडेंट जिम्मेदार- ऐक्टिविस्ट
वहीं नोएडा स्थित एक एनिमल राइट ऐक्टिविस्ट का दावा है कि वह अक्सर लोगों के गुस्से का शिकार बनते हैं। उनका आरोप है कि नियम ये है कि सोसाइटी और आरडब्ल्यूए को निश्चित तौर पर फीडिंग प्वाइंट तय करना है। लेकिन, वह इसपर अमल नहीं होने देने के लिए रेसिडेंट्स को ही जिम्मेदार मानते हैं। संजय महापात्रा का आरोप है कि रेसिडेंट इसमें खलल डालते हैं।

'कुत्तों का सड़कों पर अधिकार, इस नीति को बदलना होगा'
बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी डिजाइन A TREE के डायरेक्टर और इकोलॉजिस्ट अबी टी वनक कहते हैं, 'हमें कुत्तों के साथ हमारे संबंधों को फिर से परिभाषित करना होगा। हो क्या गया है कि कुत्ते पर आधारित नीति ऐसी हो गई है जहां कुत्तों का अधिकार है कि वह सड़कों पर रहेगा और इसे सबसे पहले और हमेशा के लिए बदलना होगा।'

'सड़कों को कुत्तों से मुक्त करने का लक्ष्य तैयार हो'
उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि मान लीजिए कि एक कुत्ता पागल हो गया है तो euthanasia के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। यही नहीं, मौजूदा नियमों में ऐसे भी परिवर्तन होना चाहिए कि न सिर्फ उनकी आबादी कम करने पर जोर हो, बल्कि सड़कों को कुत्तों से मुक्त करने का लक्ष्य तैयार किया जा सकता है।

डॉग लवर्स को भी जिम्मेदार बनाना होगा
अन्य समाधानों में आवारा कुत्तों को संरक्षण देने वालों की पहचान का भी विकल्प दिया जाता है। यह संरक्षण देने वाले समूह में भी हो सकते हैं। इनके माध्यम से भी आवारा कुत्तों पर लगाम लगाया जा सकता है। क्योंकि, अगर डॉग लवर्स जानवरों के नाम पर उनके लिए हंगामा करते हैं, तो उन्हें सामने आकर जिम्मेदारी भी लेनी होगी। सरकार उनके लिए जुर्माना भी निर्धारित कर सकती है।

'अनहोनी के समय कोई नहीं लेता जिम्मेदारी'
लेकिन, वनक कहते हैं कि 'समूह वाले डॉग मॉडल की दिक्कत ये है कि जब सड़क पर कुत्ते के साथ कुछ हादसा हो जाता है या उसे कुछ हो जाता है तो लोग कहते हैं, बेचारा कुत्ता, मैं इसका कितना ख्याल रखता था। लेकिन, जब अगर वही कुत्ता मुझे काट ले तो कोई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होता।'
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