सोग़रा बीबी: कौन थीं वो महिला जिनका बनाया मदरसा दंगाइयों ने बिहार शरीफ़ में जला डाला

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी बनने से कुछ साल बाद ही बिहार में शिक्षा के विस्तार के लिए एक महिला ने ट्रस्ट क़ायम किया था और मदरसा बनवाया था. मदरसे की 4500 नायाब किताबें दंगाइयों ने जला दीं.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी में आज जली-अधजली पुस्तकें, धुएं से काले पड़ गए पन्ने, या फिर उन्हें तकती उदास कालिख़ पुती दरकी हुई दीवारें ही नज़र आती हैं. या फिर गेट के बाहर बंदूक़ लिए बैठी पुलिस टीम दिखती है; जिसकी ग़ैर-मौजूदगी में दंगाइयों ने 31 मार्च को सौ साल पुराने मदरसा अज़ीज़िया के कुछ हिस्सों और लाइब्रेरी को आग लगा दी थी.

कुछ के शब्दों में सैकड़ों साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय को जलाए जाने की घटना को एक बार फिर से नालंदा में ही अंजाम दिया गया.

113 सालों से बिहार शरीफ़ में मौजूद मदरसा अज़ीज़िया 1896 में पटना में क़ायम किया गया था, संस्थापक थीं बीबी सोग़रा जिन्होंने इसे अपने पति अब्दुल अज़ीज़ की याद में बनवाया था.

मुस्लिमों में मॉडर्न तालीम की मुहिम से जुड़े मज़हर अलीम अंसारी की किताब 'सफ़रनामा मज़हरी' में ज़िक्र है कि सोग़रा बीबी ने तभी एक वक़्फ़नामा के ज़रिये अपनी सारी जायदाद, जिसकी सालाना आमदनी उन्नीसवीं सदी में सवा लाख रुपये और कुल भूमि 28,000 बीघे से ज़्यादा थी, शिक्षा के विस्तार और मानवता की सहायता के लिए दान कर दी थी.

बाद में इसी वक़्फ़ ने बिहार शरीफ़ में 1912 में सोग़रा हाई इंग्लिश स्कूल, फिर कॉलेज, दवाख़ाना, हॉस्टल्स वग़ैरह क़ायम किए जो आज भी काम कर रहे हैं.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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रमज़ान की वजह से थी छुट्टी

सोग़रा स्कूल में लगी मेरिट लिस्ट शहर को की गई ख़िदमत की मिसाल के तौर पर देखी जा सकती है.

सोग़रा वक़्फ़ के अध्यक्ष सैयद सैफ़ुद्दीन फ़िरदौसी कहते हैं, "ताजुब्बख़ेज़ बात ये है कि आज से सौ साल पहले हमारे समाज के अंदर इतनी बाशऊर, होशमंद, अक़्लमंद ख़ातून मौजूद थीं जिन्होंने अपनी पूरी जायदाद अज़ीज़-रिश्तेदारों को देने के बजाए क़ौम और मुल्क की ख़िदमत के लिए दान कर दी."

मार्च के आख़िरी जुमे को दोपहर बाद इलाक़े से निकली रामनवमी शोभायात्रा के बाद दंगाइयों की एक भीड़ ने एफ़आईआर के अनुसार मदरसे को निशाना बनाया और मुख्य द्वार में लगे ताले और ज़ंजीर को तोड़कर भीतर घुस गई.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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रमज़ान का महीना होने के कारण संस्था में छुट्टी थी और वहां मौजूद मदरसे का चौकीदार मोहन बहादुर हथियारों से लैस भीड़ को रोकने में असफल रहा.

नारे लगाती भीड़ ने जब मदरसे का ताला तोड़ दिया तब मौजूद नेपाली गार्ड वहां से भाग गया कि कहीं उसे भी मुसलमान समझकर न मार डाला जाए.

बावर्ची अब्दुल ग़फ़्फ़ार ने चौकी के नीचे घुसकर किसी तरह जान बचाई, "हम सोच रहे थे कि जुमे का दिन है, इफ़्तार जल्दी बंटवाकर छुट्टी कर देंगे तभी बाहर से जलने की महक आने लगी, दरवाज़ा खोलकर देखा तो आफ़िस के पास हंगामा मचा था, हॉस्टल की तरफ़ भी घुस गए थे, हम डर के मारे चौकी के नीचे छुप गए."

कम से कम 250 किताबें ऐसी थीं जो क़लमी थीं, यानी हाथ से लिखी हुई, जिन्हें 1910 में तो यहां लाया गया था, वो अब कभी नहीं मिल पाएंगी. प्रिंसिपल मोहम्मद शाकिर क़ासिमी की प्राथमिकी में भी इनका ज़िक्र किया गया है और इन्हें महत्वपूर्ण बताया है.

कुल नष्ट हुई किताबों की संख्या 4500 थी. ये किताबें 16 बड़ी आलमारियों में भरी हुई थीं और इन आलमारियों को ख़ासतौर से श्रीलंका से लकड़ी मंगाकर तैयार करवाया गया था.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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शिक्षा की भरपाई संभव नहीं

मदरसे में आगज़नी की घटना को 'साज़िश'क़रार देते हुए सोग़रा वक़्फ़ के अध्यक्ष सैयद सैफ़ुद्दीन फ़िरदौसी कहते हैं कि भवन और आलमारियों की तो भरपाई हो जाएगी लेकिन इल्म और तहज़ीब पर जो हमला किया गया है उसकी भरपाई कभी भी संभव नहीं है.

उन्होंने कहा, "इस घटना की बू भी उसी तरह मौजूद रहेगी जैसी सैकड़ों साल नालंदा विश्वविद्यालय को जलाए जाने की आज तक महसूस की जा सकती है."

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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मदरसा अज़ीज़िया पर पहले भी 2017 में होली के बीच हंगामा किया गया था जिसके बाद परिसर के बाहर साल भर पुलिस की तैनाती रही थी.

यहां हमले के पहले दंगाइयों ने पास की शाही मस्जिद में भी तोड़-फोड़, पत्थरबाज़ी और आगज़नी की थी. मस्जिद और मदरसे के बीच जिन दुकानों को लूटा गया या आग के हवाले किया गया उनमें एक पैटर्न नज़र आता है - कई-कई दुकानों के बीच, चंद दुकानों को निशाना बनाया जाना.

पुलिस ने मदरसे में हुई घटना की तहकीकात का काम सब-इंस्पेक्टर पंकज सिंह को सौंपा है.

हालांकि जले हिस्सों के निर्माण और नई पुस्तकालय के लिए हुकूमत फंड देगी या नहीं इसे लेकर संशय है.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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पति और बेटी की मौत के बाद संभाला चैरिटी का काम

पटना यूनिवर्सिटी में इतिहास के पूर्व शिक्षक प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद ने एक बातचीत में बताया कि बीबी सोग़रा का हवाला फ़सीहुद्दीन बल्ख़ी की जानी-मानी किताब 'तज़किरा निसवाने हिंद' और 'तज़किरा कामिलाने बिहार' जैसी किताबों में मिलता है.

दोनों पुस्तकें प्रसिद्ध ख़ुदा बख़्श ओरियंटल लाइब्रेरी में मौजूद हैं.

इम्तियाज़ अहमद के लेख आईसोलेटेड एंड द लिबरेटेड, प्रोफ़ाइल ऑफ़ एमिनेंट मुस्लिम विमेन इन कॉलोनियन बिहार में सोग़रा बीबी का जन्म स्थान मुंगेर का हसौली गांव बताया गया है. उनके पिता का नाम मौलवी अब्दुस समद था. उनकी मौत का साल 1909 दर्ज है.

बिहार शरीफ़ लहेरी मोहल्ले के रईस अब्दुल अज़ीज़ से शादी के बाद उन्हें एक बेटी हुई जिसकी बाद में मौत हो गई. कुछ जगहों पर इसकी वजह क्षय रोग यानी टीबी बताई जाती है जो उस ज़माने में एक जानलेवा बीमारी होती थी.

सोग़रा स्कूल
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सोग़रा स्कूल

बेटी के ग़म में बाप भी कुछ दिनों बाद चल बसे. तन्हा रह गई बीबी सोग़रा ने ख़ुद को शिक्षा, चिकित्सा और दूसरे चैरेटी कार्यों में लगा दिया, सारी जायदाद वक़्फ कर दी, और ट्रस्ट (वक़्फ़) का पूरा कामकाज ख़ुद संभालने लगीं.

हालांकि जिस महलनुमा हवेली में मौजूद रहकर वो ट्रस्ट का काम देखती थीं, और जिसका एक हिस्सा उनकी रिहाइशगाह भी था, उस भवन को देखकर वक्फ़ के मौजूदा हालात का अंदाज़ा होता है.

हवेली का एक हिस्सा पूरी तरह ढह गया है, मुख्य द्वार से घुसते ही गिर गए कमरे नज़र आते हैं, और परिसर में घूमती बकरियां और बत्तखों के जोड़े दिखते हैं.

जायदाद के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा हो गया है, या ख़ुद इंतज़ामकारों ने उससे इंसाफ़ नहीं किया, दुकानदारों पर वक़्फ़ का क़रीब सवा तीन करोड़ क़र्ज़ है, दूसरी तरफ़ पिछले आठ सालों में ट्रस्ट की बैठकें ही नहीं बुलाई गईं थीं.

हालांकि पिछले छह-सात माह में कई बैठकें हुईं जिसमें सोग़रा कॉलेज में साइंस ब्लॉक स्थापित करने और स्कूल के सौ साल का जश्न मनाने की योजना तैयार हो रही है.

मदरसा अज़ीज़िया की लाइब्रेरी
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वक़्फ़ के मुतवल्ली (इंतज़ामकार) डॉक्टर मुख़तारुल हक़ बताते हैं कि पिछले साल अंग्रेज़ी इलाज के लिए ओपीडी शुरू की गई है और बीबी सोग़रा के नाम पर जल्द ही अस्पताल भी खोला जाएगा.

मगर जिस सोग़रा बीबी ने मुंगेर से लेकर मुज़फ़्फ़रपुर, सीतामढ़ी, गया, पटना और न जाने कितने शहरों में मौजूद जायदाद को देश और समुदाय की सेवा में लगा दिया उसकी एक स्मारिका तक बिहार शरीफ़ शहर में नहीं दिखती, यहां तक की वक़्फ़ के कार्यालय तक में भी नहीं.

उनकी यादें भी लोगों के ज़हन में धुंधली पड़ रही हैं.

सोग़रा हॉस्टल में रह रहे एक छात्र मोहम्मद शाकिर आलम से उनके बारे में पूछा तो वो बस इतना कह पाए कि उन्हें ठीक से मालूम नहीं.

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