शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती: आदि से अंत तक

जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य
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कांची कामकोटि पीठ के प्रमुख श्री श्री जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य का बुधवार सुबह निधन हो गया.

तमिलनाडु के कांचीपुरम में उन्होंने अंतिम सांस ली. वह 83 साल के थे.

स्वामी जी ने रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ा और मठ की गतिवधियों का विस्तार समाज कल्याण, ख़ासकर दलितों के शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कार्यों तक किया.

उन्हें 22 मार्च 1954 को चंद्रशेखेंद्र सरस्वती स्वामीगल ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, जिसके बाद वो 69वें मठप्रमुख बने थे.

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पत्रकार एस गुरुमूर्ति ने बीबीसी हिंदी को बताया, "उन्होंने मठ को एक नई दिशा दी. पहले मठ सिर्फ आध्यात्मिक कार्यों तक सीमित होता था. उन्होंने धार्मिक संस्थानों को सामाजिक कार्यों से जोड़ा. यही कारण है कि वो देशभर में लोकप्रिय हुए."

एक मठ के संरक्षक जयाकृष्णन कहते हैं, "उनका आंदोलन समाज के सबसे निचले स्तर पर खड़े लोगों को मदद पहुंचाने के लिए था. पहले मठ कांचीपुरम और राज्य के भीतर तक सीमित था. वो इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों तक ले गए. वहां उन्होंने स्कूल और अस्पताल शुरू किए."

गुरुमूर्ति कहते हैं, "उन्होंने मठ को समाज से जोड़ा, सार्वजनिक मामलों में रुचि ली और दूसरे धर्मों के नेताओं से भी अच्छे संबंध स्थापित किए."

वरिष्ठ स्वामी से मतभेद

गुरुमूर्ति इस बात से सहमत नहीं हैं कि जयेंद्र सरस्वती और उनके वरिष्ठ स्वामी श्री श्री चद्रशेखेंद्र सरस्वती स्वामीगल के बीच मठों को सामाजिक कार्यों से जोड़ने को लेकर मतभेद थे.

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वो कहते हैं, "यह मतभेद वरिष्ठ स्वामी जी के साथ नहीं, उनलोगों के साथ था जो मठ को चला रहे थे."

इन्हीं मतभेदों की वजह से वो 1980 में बिना बताए कांचीपुरम मठ छोड़कर कर्नाटक चले गए. बाद में वो कांचीपुरम दोबारा लौटे थे.

स्वामी जी चर्चा में तब आए जब तमिलनाडु पुलिस ने उन्हें हैदराबाद में 11 नवंबर, 2004 को गिरफ़्तार कर लिया. उन पर कांची मठ के प्रबंधक शंकररमण की हत्या का आरोप था.

शंकररमण की हत्या 3 सितंबर, 2004 को मंदिर परिसर में कर दी गई थी. स्वामी जी को पुलिस ने शक के आधार पर गिरफ़्तार किया था क्योंकि शंकरारमन उनके ख़िलाफ़ अभियान चला रहे थे.

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गिरफ़्तारी में जयललिता का हाथ था?

इसके बाद कनिष्ठ स्वामी विजेंद्र सरस्वती को 22 अन्य लोगों के साथ मामले में गिरफ़्तार किया गया. मामले की सुनवाई 2009 में शुरू हुई, जिसमें कोर्ट में 189 गवाहों को प्रस्तुत किया गया था.

सबूतों के अभाव के चलते सभी आरोपियों को पुदुचेरी कोर्ट ने 13 नवंबर, 2013 को बरी कर दिया.

गुरुमूर्ति कहते हैं, "यह एक राजनीतिक मामला था. कोई सबूत नहीं मिला था. मुझे नहीं लगता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने जानबूझ कर ऐसा किया होगा. लेकिन उस समय माहौल ऐसा था कि पुलिस को ऐसा करना पड़ा होगा क्योंकि डीएमके के नेता हत्या के विरोध में धरने पर थे."

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वो आगे कहते हैं, "हां, उस समय लोग उनकी गिरफ़्तारी से काफ़ी ग़ुस्से में थे. लेकिन लोग यह मान रहे थे कि वो निर्दोष हैं. मुझे नहीं लगता है कि इससे उनकी छवि को कोई नुकसान पहुंचा होगा."

स्वामी जी की गिरफ़्तारी के बाद तमिलनाडु के मुकाबले उत्तर भारत में ज़्यादा विरोध प्रदर्शन हुए.

गुरुमूर्ति बताते हैं कि तमिलनाडु में सामाजिक आंदोलन भले हो जाए, मगर कोई हिंदू समर्थक प्रदर्शन हीं होगा.

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