मंत्रियों के नफरती भाषण पर बोलीं सुप्रीम कोर्ट की जज, यह संविधान की मूल भावना पर हमला करता है
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इन लोगों को यह समझने की जरूरत है, अपने शब्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, उनके भाषण का समाज पर और लोगों की भावनाओं पर असर होता है, लोगों के व्यवहार पर असर होता है।

मंत्रियों के नफरती भाषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने अपना फैसला देते हुए कहा कि हम मंत्रियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते हैं। ना ही इन मंत्रियों के भाषण के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। लेकिन पांच जजों में से एक जज ने अपना अलग फैसला सुनाया और बाकी के जजों से असहमति प्रकट की। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि नफरती भाषण संविधान की मूल भावना पर प्रहार करती है, इस तरह के बयानों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है अगर व्यक्ति मंत्री पद की हैसियत से दे रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच जिसमे जस्टिस एसए नजीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना और वी रामसुब्रमण्यम शामिल थे, उन्होंने अपना एकमत फैसला सुनाया जबकि जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इन जजों से इतर अपना फैसला सुनाया। बाकी जजों से असहमति जाहिर करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा हाल के दिनों में जिस तरह से गैरजिम्मेदाराना भाषण बढ़े हैं वह चिंता का विषय हैं, यह नुकसानदायक और अपमानजनक हैं। इस तरह के भाषण अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों का अपमान करते हैं।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इन लोगों को यह समझने की जरूरत है, अपने शब्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, उनके भाषण का समाज पर और लोगों की भावनाओं पर असर होता है, लोगों के व्यवहार पर असर होता है। इन लोगो को यह समझना चाहिए कि वह समाज और नागरिकों के सामने क्या उदाहरण पेश कर रहे हैं। लिहाजा राजनीतिक दलों को अपने मंत्रियों द्वारा दिए गए भाषण पर रोक लगानी चाहिए। इस तरह का कोड ऑफ कंडक्ट बनाना चाहिए ताकि मंत्री इस तरह के भाषण नहीं दे पाएं।
सुप्रीम कोर्ट की जज ने कहा कि हमारा देश जहां पर लोकतांत्रिक व्यवस्था है, अभिव्यक्ति की आजादी है, बोलने की आजादी है, वहां यह जरूरी है कि स्वस्थ्य लोकतंत्र को सुनिश्चित किया जाए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश उस मामले की सुनवाई के दौरान दिया जिसमे जुलाई 2016 में बुलंदशहर हाइवे पर महिला और उसकी बेटी का रेप हुआ था और महिला के पति ने केस की सुनवाई को दिल्ली ट्रांसफर करने की अपील की थी क्योंकि आजम खान ने विवादित बयान दिया था। आजम खान ने इसे राजनीतिक षड़यंत्र करार दिया था। कोर्ट के सामने यह सवाल था कि क्या मंत्री, सांसद, विधायक पर भाषण को लेकर पाबंदी लगाई जा सकती है। जिसपर सुनवाई करते हुए पांच जजों की बेंच ने अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
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