संसद और विधानसभाओं में सांसदों-विधायकों के लगातार बढ़ते अभद्र व्यवहार पर SC ने अपनाया कड़ा रुख, कहा...
संसद और विधानसभाओं में जन प्रतिनिधियों द्वारा किए जा रहे अभद्र व्यवहार में हो रही लगातार वृद्धि पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
नई दिल्ली, 5 जुलाई। संसद और विधानसभाओं में जन प्रतिनिधियों द्वारा किए जा रहे अभद्र व्यवहार में हो रही लगातार वृद्धि पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में जनप्रतिनिधियों द्वारा किए जा रहे अभद्र व्यवहार में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ शासन के दौरान 2015 में केरल विधानसभा के अंदर हंगामे के संबंध में दर्ज एक आपराधिक मामले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये बात कही। कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सदन में मर्यादा बनाए रखी जाए।
याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और एम आर शाह ने कहा कि प्रथम दृष्टया हमें इस तरह के व्यवहार पर बहुत सख्त रुख अपनाना होगा। इस तरह का व्यवहार अस्वीकार्य है। बैंच ने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कुछ मर्यादा बनी रहे। ये लोकतंत्र के प्रहरी हैं।
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केरल सरकार द्वारा दायर एक याचिका में 2015 में राज्य विधानसभा के अंदर हंगामे के संबंध में दर्ज एक आपराधिक मामले को वापस लेने की मांग करने वाली उसकी याचिका को खारिज करने के उच्च न्यायालय के 12 मार्च के आदेश को चुनौती दी गई थी। राज्य विधानसभा में 13 मार्च, 2015 को अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला था, जब उस समय विपक्ष की भूमिका निभा रहे एलडीएफ सदस्यों ने तत्कालीन वित्त मंत्री के एम मणि को राज्य का बजट पेश करने से रोकने की कोशिश की थी, जो बार रिश्वत घोटाले में आरोपों का सामना कर रहे थे।
उस दौरान स्पीकर की कुर्सी को पोडियम से हटाने के अलावा, पीठासीन अधिकारी के डेस्क पर लगे कंप्यूटर, कीबोर्ड और माइक जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी एलडीएफ सदस्यों द्वारा कथित रूप से क्षतिग्रस्त कर दिए गए थे।इस मामले में तत्कालीन एलडीएफ विधायकों और अन्य के एक समूह के खिलाफ दर्ज किया गया था। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केरल विधानसभा में हुई घटना का जिक्र किया और कहा कि विधायकों ने वित्त बजट पेश करने में बाधा डाली और इस तरह के व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि हम विधायकों के इस तरह के व्यवहार को माफ नहीं करेंगे, जो सदन के पटल पर माइक फेंकते हैं और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करते हैं। इस मामले की अगली सुनावई 15 जुलाई को होगी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वे सभी विधायक थे, वे जनता को क्या संदेश दे रहे थे। यह कहते हुए कि इस तरह का व्यवहार करने वाले लोगों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम अधिनिय के तहत मुकदमे का सामना करना चाहिए कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आचरण पर सख्त नजरिया रखना होगा अन्यथा इस तरह का व्यवहार बढ़ता ही चला जाएगा।
मामले की सुनवाई के दौरान एक वकील द्वारा यह कहने पर कि विधायक तत्कालीन वित्त मंत्री के खिलाफ विरोध कर थे, जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप थे तो पीठ ने कहा कि वजट पेश करना भी बेहत मायने रखता है।आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत आवेदन के मुद्दे पर, जो अभियोजन से वापसी से संबंधित है, पीठ ने कहा कि यह लोक अभियोजक का विशेषाधिकार है।
शीर्ष अदालत में दायर अपनी याचिका में, केरल सरकार ने दावा किया कि उच्च न्यायालय इस बात की सराहना करने में विफल रहा है कि कथित घटना उस समय हुई थी जब विधानसभा का सत्र चल रहा था और स्पीकर की पूर्व मंजूरी के बिना कोई अपराध दर्ज नहीं किया जा सकता था।
राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि विधानसभा सचिव द्वारा स्पीकर की सहमति के बिना दर्ज की गई प्राथमिकी गलत है और इसलिए, धारा 321 सीआरपीसी के तहत दायर आवेदन की अनुमति दी जानी चाहिए। याचिका में उच्च न्यायालय के 12 मार्च के आदेश और मामले में आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई है, जो एक निचली अदालत के समक्ष लंबित है।
इसमें कहा गया है कि चूंकि सभी आरोपित व्यक्ति विधान सभा के सदस्य थे और विरोध के तौर पर अपना कार्य कर रहे थे इसलिए आरोपी विधायक संविधान के तहत सुरक्षा पाने के हकदार थे। याचिका में आगे कहा गया कि संविधान का का अनुच्छेद 105(3), 194(3) संसद और राज्य विधानमंडल के सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार प्रदान करता है और इसलिए विधान सभा के सचिव के लिए विधायक के खिलाफ मामला दर्ज करना उचित नहीं था।
बता दें कि राज्य सरकार ने निचली अदालत के एक आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें लोक अभियोजक द्वारा मामले में अभियुक्तों के खिलाफ अभियोजन से वापस लेने की अनुमति की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था। मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी।












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