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Same Sex Marriage: SC की संविधान पीठ में सुनवाई पूरी, 28 अप्रैल को फैसला, सरकार बोली- मुद्दा संसद पर छोड़ें

भारत में समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता के सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय में जिरह पूरी हो गई। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में मामले की सुनवाई हुई। फैसला 28 अप्रैल को आएगा।

Same Sex Marriage

Same Sex Marriage को कानूनी मान्यता का सवाल लगातार चर्चा में हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस मामले के अलग-अलग पहलुओं पर विचार कर रही है। दोनों पक्षों की जिरह पूरी हो गई। 28 अप्रैल को फैसला आएगा।

बुधवार को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की गुहार वाली लगभग 20 याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई शुरू की। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने SC से इस मुद्दे को संसद पर छोड़ने का फिर से आग्रह किया।

यह भी रोचक है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने पहले दिन की हियरिंग के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर केंद्र सरकार के रूख को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। आपत्ति खारिज कर CJI ने कहा था कि शीर्ष अदालत इस मामले पर सुनवाई करेगी।

भारत के समाज में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता के सवाल पर एसजी मेहता ने बुधवार को अपनी दलीलों में कहा, अदालत एक बहुत ही जटिल विषय पर विचार कर रही है जिसका गहरा सामाजिक प्रभाव है।

उन्होंने कहा, सरकार सवाल उठाती है कि शादी किससे और किसके बीच होती है, इस पर कौन फैसला करेगा? तुषार मेहता ने कहा कि समलैंगिक विवाह पर कानून बनाने का पूर्ण अधिकार संसद को भी नहीं है।

सॉलिसिटर जनरल मेहता के अनुसार, नागरिकों को विवाह के अधिकार हैं, लेकिन सरकार विवाह की नई परिभाषा बनाने के लिए बाध्य नहीं। उन्होंने कहा, संसद इस संबंध में कानून बना सकती है, लेकिन यह पूर्ण अधिकार नहीं है।

केंद्र सरकार ने कहा, नागरिकों के विवाह के अधिकार का अर्थ राज्य को विवाह की नई परिभाषा गढ़ने के लिए विवश करना नहीं है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में कहा, शादी के अधिकार का मतलब राज्य को शादी की नई परिभाषा गढ़ने के लिए मजबूर करना नहीं हो सकता।

मेहता ने कहा, संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बहुत व्यापक रूप से परिभाषित किया है। कोशिश की गई है कि "सभी रंगों और सभी स्पेक्ट्रम जिसे हम एलजीबीटीक्यू + कहते हैं" इसमें शामिल हों। उन्होंने कहा, स्पेक्ट्रम के कई रंग और शेड्स हैं ... यह सिर्फ समलैंगिक या समलैंगिकों के बारे में नहीं है।

बकौल सॉलिसिटर जनरल, शादी करने का अधिकार संपूर्ण इसलिए नहीं है क्योंकि कानून निर्धारित करता है कि शादी की सही आयु क्या है? कानून निर्धारित करता है कि किसे शादी नहीं करनी है, कैसे अलग होना है, इसके भी विधायी नियम साफ हैं।

उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम का भी रेफरेंस दिया। मेहता ने कहा, अन्य धर्मों के लिए कुल मिलाकर इसके संबंध में कोई नियम-कानून नहीं है सॉलिसिटर जनरल ने कहा, शादी को जो सामाजिक दर्जा मिला है, इस बारे में बात हो रही है। जैसे ही कोई अधिकार जो बिना मान्यता के पहले से मौजूद था, उसे मान्यता मिल जाती है, इसके संबंध में नियम बन जाते हैं। कानून निर्धारित करता है कि शादी कब करनी है, स्वायत्तता चली जाती है।

उन्होंने कहा, यहां तक कि याचिकाकर्ताओं की प्रार्थनाएं भी बेहद अस्पष्ट हैं। सरकार की मान्यता के लिए सामाजिक स्वीकृति जरूरी है, लेकिन यह संसद के माध्यम से होना चाहिए। अगर अदालत ऐसा करती है तो यह LGBTQIA+ के लिए हानिकारक है। ऐसा इसलिए क्योंकि आप लोगों की इच्छा के विरुद्ध कुछ कर रहे हैं। हम उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को नहीं भूल सकते जिसने विवाह की संस्था को जन्म दिया।

तुषार मेहता ने कहा, धर्मों ने हमेशा विषमलैंगिक विवाहों (heterosexual marriages) को मान्यता दी है। उन्होंने कहा, लाखों वर्षों से, धर्मों में विवाह को अलग-अलग लिंग वाले व्यक्तियों के बीच मिलन के रूप में मान्यता दी गई है। इसे बाद में क़ानून में संहिताबद्ध किया गया। प्रमुख उद्देश्य प्रजनन (Procreation) है।

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    उन्होंने फिर से दोहराया कि समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता के सवाल में सामाजिक निहितार्थ हैं। इसे तय करने के लिए संसद को लौटा दिया जाए। केंद्र सरकार की दलीलों के बाद CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, हमें मेनका गांधी के फैसले की पूरी लाइन पर पुनर्विचार करना होगा।

    इस पर सॉलिसिटर ने कहा, सरकार गर्भपात के अधिकार पर फैसले का समर्थन नहीं कर रही है। इससे सहमत भी नहीं हैं। समलैंगिक शादियों पर फैसला लोगों को करना चाहिए, ये इसके बारे में है। सरकार केवल इतना कह रही है कि इसे संसद को तय करना चाहिए।

    तुषार मेहता ने कहा, जहां कहीं भी विधायिका ने दखल दिया है, संसद ने तदनुसार अन्य कानूनों में भी संशोधन किया है, लेकिन, ध्यान दें कि याचिकाकर्ताओं ने प्रभावित होने वाली अलग-अलग कानूनों में से किसी को भी चुनौती नहीं दी है। इसलिए अदालत वह नहीं कर सकती जो संसद कर सकती है।

    जिरह के दौरान अलग-अलग देशों में विवाह की समानता पर कैसे कानून बनाए गए, इस पर भी चर्चा हुई। सॉलिसिटर मेहता ने कहा, ताइवान में, कार्यकारी कार्रवाई और निर्णय के बाद अधिनियम का पालन किया गया।

    मेहता की दलीलों पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस एसआर भट ने कहा, ऑस्ट्रिया में जजमेंट के बाद कानून बना। बेंच ने घाइडन बनाम गोडिन-मेंडोज़ा (Ghaidan v Godin-Mendoza) केस पर भी बात की। ये मामला ब्रिटेन का है, जिसमें टेनेंसी सूट के बाद समलैंगिक अधिकारों पर कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।

    केंद्र सरकार ने कहा, घाइडन का मामला भारतीय संदर्भ में लागू नहीं होता है। सभवत: दक्षिण अफ्रीका एकमात्र देश है जहां प्रक्रिया की शुरुआत न्यायपालिका की तरफ से हुई है।

    सॉलिसिटर जनरल मेहता ने Dobbs v Jackson केस का रेफरेंस भी दिया। इस पर सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, डॉब्स बनाम जैक्सन का हवाला न दें। हम उससे बहुत आगे निकल चुके हैं। बकौल सीजेआई, "यदि आप न्यायिक संयम पर बहस करने के लिए डॉब्स पर भरोसा कर रहे हैं, तो भारत में हम उससे कहीं आगे निकल गए हैं।"

    सीजेआई ने साफ किया, डॉब्स केस में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण दिखता है। इसमें कहा गया है कि एक महिला का उसकी शारीरिक अखंडता पर कोई नियंत्रण नहीं है। इस सिद्धांत को हमारे देश में बहुत पहले खारिज कर दिया गया है।

    इसके बाद मेहता ने कहा, सबसे पहले न्यायपालिका ने दक्षिण अफ्रीका में यह प्रक्रिया शुरू की थी। 34 में से 29 देशों की विधायिका ने कदम रखा... बोलीविया में न्यायपालिका ने पहल की। इस पर CJI चंद्रचूड़ ने लातविया का उदाहरण दिया। जवाब में सॉलिसिटर ने कहा, हाँ न्यायपालिका पहले है... लेकिन यहां समलैंगिक जोड़े अदालतों के माध्यम से अपनी शादी का पंजीकरण करा सकते हैं।

    CJI ने कहा, कुछ देशों ने इस सिद्धांत का पालन किया है कि आप न्यायपालिका को कानून बनाने के लिए तीन महीने का समय देते हैं और यदि कोई कानून नहीं है तो फैसला मान्य होगा। इस पर सॉलिसिटर ने कहा, लातविया ने ऐसा किया.. लेकिन इस अदालत ने ऐसा कभी नहीं किया..यह संवैधानिक संस्कृति पर निर्भर करता है।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, अदालत को संसद में विशेष विवाह अधिनियम पर हुई बहस को भी देखना चाहिए। इस पर CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, स्पेशल मैरिज एक्ट (SMA) का उद्देश्य धर्म-तटस्थ होना था, विचार लोगों को उनके विश्वास और धर्म के बाहर शादी करने के लिए एक मंच मुहैया कराने का था। इस पर मेहता ने कहा, संसद लेस्बियन और गे लोगों के बारे में जानती थी।

    बकौल तुषार मेहता, संसद की प्रवर समिति ने वास्तव में 'पुरुष' और 'महिला' के बजाय पार्टियों शब्द का इस्तेमाल किया। गरमागरम बहस के बाद, पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग उम्र पेश करने के लिए संशोधन लाया गया। LGBTQ के बारे में पूरी जानकारी थी।

    उन्होंने कहा, SMA की शर्तों से सहमत नहीं होने वाले लोग धार्मिक कानून के तहत शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं। तुषार मेहता ने कहा कि SMA व्यक्तिगत असंहिताबद्ध कानून है... इसमें LGBTQIA+ विवाह को प्रतिबंधित नहीं किया गया, लेकिन हिंदू मैरेज एक्ट में इसकी मनाही है।

    सॉलिसिटर ने कहा, SMA में एक ही लिंग के विवाह के मामले को जानबूझकर छोड़ दिया गया है। उन्होंने विशेष विवाह अधिनियम के पारित होने के दौरान संविधान सभा की बहस के रेफरेंस भी दिए।

    संविधान पीठ के न्यायाधीशों इस बात पर गौर किया कि दूसरे देशों ने समलैंगिक विवाह को कैसे मान्यता दी। जस्टिस भट ने सवाल किया, क्या उस समय, दुनिया में कहीं भी समलैंगिक विवाह की अनुमति देने वाला कोई कानून था?

    जिरह पूरी, 28 अप्रैल को फैसला सुनाएगी सुप्रीम कोर्ट

    इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि हमारी जानकारी में नहीं... लेकिन ऐसी शादियों पर कोई निषेध नहीं है। जस्टिस भट ने कहा, इंग्लैंड में, 1973 तक प्रतिबंध था। मेहता ने कहा, स्वीकार किया और कहा, 1956 तक, यह न तो अनुज्ञेय था और न ही निषेधात्मक (permissive nor prohibitive) जिरह पूरी होने के बाद कोर्ट ने इस मामले में फैसला 28 अप्रैल को सुनाने की बात कही।

    बता दें कि इस मुद्दे पर पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी भी पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के निरस्त होने के बाद समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए।

    यह भी रोचक है कि चीफ जस्टिस के पास LGBTQIA कम्युनिटी के अभिभावकों ने लेटर लिखा है। इन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा कि कई लोग 80 साल के हो चुके हैं, लेकिन अब आशा है कि वे भी रेनबो शादियों को कानूनी मान्यता मिलते देख सकेंगे।

    रेनबो शादियों का जिक्र इसलिए क्योंकि लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्विर, इंटरसेक्स और एसेक्सुअल समुदाय के लोगों के लिए अलग-अलग रंगों वाले एक फ्लैग का इस्तेमाल किया जाता है। इससे इंद्रधनुष जैसा एहसास होता है।

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    गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के कुछ प्रावधानों को निरस्त कर कहा था, समलैंगिक लोगों के साथ समाज और कानून दोनों ने नाइंसाफी की है। कोर्ट ने भेदभाव का भी जिक्र किया था।

    समलैंगिक संबंध को आपराधिक कृत्य मानने से इनकार करते हुए SC ने कहा था, भेदभाव दूर करने के लिए अदालत धारा 377 के कुछ प्रावधानों को निरस्त कर रही है। इसे 158 साल पुराने कानून में ऐतिहासिक बदलाव की तरह देखा गया।

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