CJI Chandrachud Same Sex Marriage पर बोले- शहरी और संभ्रांत अवधारणा साबित करने को सरकार के पास डेटा नहीं
समलैंगिक विवाहों को कानूनी मंजूरी देने की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को शहरी संभ्रांत अवधारणा नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा, शहरों से अधिक लोग मुखर होकर इसे स्वीकार कर रहे हैं।

Same Sex Marriage मामले पर देश की सबसे बड़ी अदालत में दूसरे दिन भी सुनवाई हुई। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ (CJI Chandrachud) की अध्यक्षता वाली Supreme Court Constitution Bench समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के अलग-अलग पहलुओं पर विचार कर रही है।
बुधवार को समलैंगिक शादियों की वैधानिकता और इसे कानूनी मान्यता देने संबंधी 20 से अधिक मामलों पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, केंद्र के पास साबित करने के लिए कोई आंकड़ा नहीं है कि समलैंगिक शादियां एलीट लोगों में होती हैं।
गौरतलब है कि इस मामले पर मंगलवार को सुनवाई शुरू हुई। सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस याचिका पर सुनवाई का विरोध किया। बाद में कहा कि ऐसी शादियां भारतीय समाज और कानून में परेशानियों का सबब बनेंगी।
दूसरे दिन बुधवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि समलैंगिक शादियां "शहरी अभिजात वर्ग" में होती हैं, लेकिन उनके पास अपने तर्क को प्रमाणित करने लिए कोई डेटा नहीं है।
दलीलों को सुनने के दौरान चीफ जस्टिस ने इस दलील का जवाब दिया कि समलैंगिक विवाह अधिकारों की मांग करने वाली याचिकाएं राष्ट्र के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, याचिकाएं "शहरी अभिजात्य विचारों" को दर्शाती हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की टिप्पणी केंद्र की इस दलील के जवाब में थी कि समलैंगिक विवाह अधिकारों की मांग करने वाली याचिकाएं राष्ट्र के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं और वे "शहरी अभिजात्य विचारों" को दर्शाती हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र के पास यह दिखाने के लिए कोई डेटा नहीं है कि यह एक शहरी अभिजात्य अवधारणा है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "राज्य एक व्यक्ति के खिलाफ एक विशेषता के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है, जिस पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं है।
बकौल CJI चंद्रचूड़, जब आप इसे जन्मजात विशेषताओं के रूप में देखते हैं, तो यह शहरी अभिजात्य अवधारणा वाले तर्क को जवाब देता है। उन्होंने कहा, शहरी शायद इसलिए क्योंकि अधिक लोग मुखर होकर सामने आ रहे हैं।
सीजेआई ने कहा, सरकार के पास यह दिखाने के लिए भी कोई डेटा नहीं है कि समलैंगिक विवाह एक शहरी संभ्रांतवादी अवधारणा है। केंद्र का तर्क है कि केवल विधायिका ही नए सामाजिक संबंध के निर्माण पर निर्णय ले सकती है।
सरकार की दलील है कि "व्यक्तिगत कानूनों के संबंध में विधायिका लोकप्रिय इच्छा के अनुसार कार्य करने को बाध्य है। सामाजिक सहमति विवाह की एक विशेष परिभाषा का समर्थन करती है, विधायिका उस रूप को स्वीकृति देने में केवल कर्तव्य का निर्वहन कर रही है।
सॉलिसिटर जनरल की तरफ से तर्क दिया गया कि लोगों की इच्छा की स्पष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था को न्यायिक आदेश से नकारा नहीं जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने कहा, सक्षम विधायिका को सभी ग्रामीण, अर्ध-ग्रामीण और शहरी आबादी के व्यापक विचारों और आवाज को ध्यान में रखना होगा।
पर्सनल लॉ के साथ-साथ विवाह के क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले रीति-रिवाजों को ध्यान में रखते हुए धार्मिक संप्रदायों के विचारों और समलैंगिक शादियों का अन्य कानूनों पर व्यापक प्रभावों का भी जिक्र किया गया।
CJI चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली संविधान पीठ में न्यायमूर्ति एसके कौल, न्यायमूर्ति रवींद्र भट, जस्टिस हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा भी शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि विषमलैंगिकता की धारणा को तोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संविधान में गारंटीकृत मौलिक अधिकार विषमलैंगिक या समलैंगिक सभी व्यक्तियों के लिए हैं। ऐसा कोई कारण नहीं कि उन्हें शादी के अधिकार से वंचित किया जाए। रोहतगी ने तर्क दिया, हमें कम नश्वर नहीं माना जाएगा और जीवन के अधिकार का पूरा आनंद मिलेगा।












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