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Rath Yatra 2025: अहमदाबाद से पुरी तक ‘जय जगन्नाथ’, देशभर में निकलेगी शोभायात्रा, अमित शाह ने की मंगला आरती

Rath Yatra 2025: जहाँ श्रद्धा हो, वहाँ भगवान स्वंय पधारते हैं" - और यह बात हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा के अवसर पर सत्य होती है। भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, परंपराओं और सामाजिक समरसता का अद्भुत प्रतीक है।

वर्ष 2025 में रथयात्रा 27 जून को पूरे देश में भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाई गई, जिसमें लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस आयोजन में श्रद्धा, भक्ति, राजनीति, प्रशासन और कला-सभी का एक भव्य संगम देखने को मिला।

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अहमदाबाद में मंगला आरती से हुई यात्रा की शुरूआत

अहमदाबाद स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा की शुरुआत बेहद पवित्र और दिव्य माहौल में हुई। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर के सिंहद्वार खोले गए और भगवान को जगाकर मंगला आरती संपन्न हुई। इसी दौरान देश के गृह मंत्री अमित शाह ने परिवार सहित मंदिर पहुंचकर महाप्रभु की मंगला आरती में भाग लिया।

उन्होंने इस पावन क्षण को ट्विटर पर साझा करते हुए लिखा, "रथ यात्रा के पावन अवसर पर अहमदाबाद के श्री जगन्नाथ मंदिर में मंगला आरती में भाग लेना अपने आप में एक दिव्य और अलौकिक अनुभव है। महाप्रभु सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें।"

आरती के पश्चात भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया गया और सुबह 5 से 6 बजे के बीच तीनों मूर्तियों को रथ पर विराजमान किया गया। पारंपरिक नेत्रोत्सव की रस्म निभाई गई, जिसमें भगवान की आंखों से पट्टी हटाई गई और फिर उन्हें नई दृष्टि के साथ दर्शन हेतु प्रस्तुत किया गया।

पाहिंद विधि: मुख्यमंत्री ने निभाई परंपरा

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पारंपरिक पाहिंद विधि के अंतर्गत रथ के आगे स्वर्ण झाड़ू लगाकर यात्रा की शुरुआत की। यह परंपरा समता और सेवा का प्रतीक है - जहाँ भगवान के समक्ष राजा भी सेवक बन जाता है। रथ यात्रा सुबह 7 बजे शुरू हुई और देर रात 8:30 बजे तक भगवान की नगर यात्रा के बाद वापसी मंदिर में होगी।

अहमदाबाद की रथ यात्रा में 101 झांकियाँ, 30 अखाड़े, 18 हाथी, 18 भजन मंडलियाँ और 3 बैंड दलों ने भाग लिया। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि जीवंत लोक संस्कृति का सार्वजनिक मंच बन गया। रथयात्रा का आध्यात्मिक केंद्र। यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन नामक रथों में विराजमान किया गया।

यात्रा का शुभारंभ दोपहर 4 बजे हुआ, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी की गलियों में उमड़े। ओडिशा के गजपति महाराज ने पारंपरिक छेरा पहनरा (सोने की झाड़ू) विधि का पालन कर रथों की सफाई की - यह परंपरा रथयात्रा का आध्यात्मिक चरम मानी जाती है।

उदयपुर में चांदी के रथ में सवार हुए भगवान

राजस्थान के उदयपुर में भी रथयात्रा का आयोजन अत्यंत भव्यता से किया गया। यहाँ भगवान को करीब 80 किलो चांदी से बने रथ में विराजमान किया गया। इस यात्रा में भी भारी संख्या में भक्तों की भागीदारी देखी गई। सुंदर झांकियाँ, लोक नृत्य, भजन मंडलियाँ और उत्साही युवाओं की टोली ने पूरे माहौल को भक्ति और रंगों से भर दिया।

राष्ट्रपति और ममता बनर्जी ने दी शुभकामनाएँ

देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस अवसर पर एक भावपूर्ण संदेश जारी किया, "रथ पर विराजमान बड़े ठाकुर बलभद्र, महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, देवी सुभद्रा और चक्रराज सुदर्शन के दर्शन करके लाखों भक्त दिव्य अनुभूति प्राप्त करते हैं। इन ईश्वरीय स्वरूपों की मानवीय लीला ही रथयात्रा की विशेषता है। मेरी प्रार्थना है कि महाप्रभु जगन्नाथ पूरे विश्व में शांति, मैत्री और स्नेह का वातावरण बनाए रखें।"

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रथयात्रा की तैयारियों का स्वयं निरीक्षण किया। दीघा में नवनिर्मित जगन्नाथ मंदिर में उन्होंने डीएसडीए अधिकारियों, इस्कॉन साधुओं और पुलिस प्रशासन के साथ बैठक की। शहर को रोशनी और मंदिर-थीम पर आधारित कटआउट से सजाया गया था। इस बार श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने विशेष व्यवस्था की और रथ की रस्सी खींचने पर नियंत्रण रखा गया।

पूरे दिन का कार्यक्रम: एक दिव्य अनुष्ठान

  • प्रातः 4:00 बजे: मंदिर के दरवाजे खुले, भगवान को जगाया गया।
  • 5:00 बजे: मंगला आरती, नेत्रोत्सव एवं श्रृंगार शुरू हुआ।
  • 7:00 बजे: रथ पर भगवान की प्रतिष्ठा और यात्रा प्रारंभ।
  • दोपहर 2:30 बजे: श्रृंगार समाप्ति और गजपति महाराज की छेरा पहनरा।
  • शाम 4:00 बजे: रथयात्रा औपचारिक रूप से आरंभ।
  • रात्रि 8:30 बजे तक: भगवान की नगर यात्रा और मंदिर वापसी।

आस्था का महासागर

रथयात्रा केवल धर्म का उत्सव नहीं, यह आस्था का महासागर है जिसमें श्रद्धालु अपनी भक्ति की नैया लेकर उतरते हैं। भगवान की मूर्तियाँ जब रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकलती हैं, तो यह दृश्य भक्तों के लिए किसी दिव्य साक्षात्कार से कम नहीं होता।

यह त्योहार एक ऐसा अवसर है, जब भारत की विविधता एक रंग में रंग जाती है - श्रद्धा और सेवा के रंग में। मंदिरों से लेकर गलियों तक, राजनेताओं से लेकर आम नागरिकों तक, कलाकारों से लेकर सुरक्षाकर्मियों तक - हर कोई इस दिव्यता का हिस्सा बनता है।

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