राजस्थान: पंचायत चुनावों में हार के बाद अब खतरे में आ सकती है गहलोत सरकार, ये है वजह
नई दिल्ली। ये बीजेपी का नया राजनीतिक स्टाइल है कि अब वह छोटे से छोटे चुनाव को इस तरह से लड़ती है कि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी चर्चा होने लगती है। हैदराबाद नगर निगम चुनाव के बाद राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव (Rajasthan Local Body Polls) को भी ऐसे ही देखा जा रहा है। वैसे इसमें कुछ गलत भी नहीं है। मुद्दे और तरीके भले अलग हों लेकिन स्थानीय स्तर के चुनाव में भी वहीं लोग वोट देते हैं जो देश और प्रदेश की सरकार बनाने के लिए दिए जाते हैं। यही वजह है कि राजस्थान चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी जहां इसे कृषि कानूनों पर जनता की मुहर बता रही हैं वहीं कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही लड़ाई एक बार फिर जोर पकड़ लेने की आशंका उठने लगी है।
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निकाय चुनाव में हार कांग्रेस के लिए झटका
राजस्थान में पंचायत समिति के चुनावों में बीजेपी ने सत्ताधारी कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बताया कि राजस्थान में पंचायत समिति की 4371 सीटों में बीजेपी ने 1990 सीटों पर कब्जा जमाया है। जिला परिषद की 636 सीटों में से 353 सीटें बीजेपी ने जीती हैं। जावडेकर ने कहा कि 21 जिला परिषदों के लिए चुनाव हुआ जिसमें 14 जिला परिषद में बीजेपी को बहुमत मिला जबकि कांग्रेस को केवल 5 जिला परिषद में जीत मिली है। वहीं ब्लॉक पंचायत में 222 ब्लॉक पंचायत में चुनाव हुए जिसमें 93 ब्लॉक पंचायत में बीजेपी को अभी तक जीत मिली है।
पत्रकारों से नतीजों पर बात करते हुए प्रकाश जावडेकर ने इसे बड़ी जीत बताते हुए इसके ट्रेंड पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि हमेशा ट्रेंड रहता है कि जिसकी राज्य में सरकार है वह चुनाव जीतता है। इस बार मतदाताओं ने इस ट्रेंड को बदल दिया और सत्ताधारी कांग्रेस की जगह बीजेपी ने जीत दर्ज की है। जावडेकर ने कहा कि ढाई करोड़ वोटरों में अधिकतर किसान ही थे और इस चुनाव में भाजपा को सफलता बताती है कि किसानों ने भाजपा सरकार द्वारा किए गए कृषि सुधारों के पक्ष में अपनी मुहर लगाई है। उन्होंने हैदराबाद के चुनावों का भी जिक्र किया।

गड़बड़ाएगा राज्य में गहलोत का समीकरण
ऐसे समय में कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 12 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर बड़ी संख्या में जमें हुए हैं। इन किसानों को कांग्रेस अपना समर्थन दे रही है और किसानों का साथ दे रही है। ऐसे में बीजेपी स्थानीय चुनाव के नतीजों को कांग्रेस के उन दावों के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है जिसमें कांग्रेस कह रही है कि देश का किसान नाराज है। इन सबके बीच कांग्रेस के लिए राज्य में परेशानी की वजह है। खासतौर पर कांग्रेस में एक डर जरूर होगा कि गहलोत-पायलट की जो लड़ाई किसी तरह शांत हुई थी एक बार फिर उभरकर सामने आ सकती है। चुनाव नतीजे पायलट समर्थकों को एक बार फिर से जोश में ला सकते हैं और एक बार फिर हाईकमान के सामने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग जोर पकड़ सकती है।
इस आशंका को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल ही में दिए गए एक बयान से भी समझा जा सकता है। गहलोत ने कहा था कि बीजेपी राज्य की कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करना चाह रही है। उन्होंने सीधे गृह मंत्री अमित शाह का नाम लिया था। अशोक गहलोत के इस कदम को उन्हें राज्य में रहने दिए जाने के लिए इशारे के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार और सोनिया गांधी के बेहद ही विश्वसनीय रहे अमहद पटेल के निधन के बाद दिल्ली में ये बात उठ रही है कि पटेल की जगह किसी कद्दावर नेता को दिल्ली में लाया जाना चाहिए। अशोक गहलोत को गांधी परिवार के खास लोगों में गिना जाता है। ऐसे में संभावना व्यक्त की जा रही है कि अशोक गहलोत को दिल्ली बुलाया जा सकता है। हालांकि अभी तक पार्टी ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है।

पायलट समर्थक को हमला करने का मिला मौका
एक तरफ गहलोत समर्थक परिणामों को खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि पॉयलट का अनावश्यक रूप से बढ़ाया जा रहा था। वहीं पायलट समर्थकों का कहना है कि गहलोत में सबको साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं है यही वजह है कि स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को फायदा हुआ है।
पिछले दिनों पार्टी में चले विद्रोह को शांत हुए तीन महीने बीत चुके हैं लेकिन अभी तक पायलट समर्थकों की चिंताओं को शांत नहीं किया गया है। सोनिया गांधी ने इस मामले में जो कमेटी बनाई थी उसने भी अभी तक कोई खास बात नहीं की है। सिर्फ यही नहीं पायलट समर्थकों की नाराजगी को शांत करने के लिए मंत्रीमंडल में संभावित फेरबदल भी नहीं किया गया। कांग्रेस नेता अजय माकन ने उस समय कहा था कि साल के अंत तक नई प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) बनाए जाने की बात कही थी लेकिन उसमें पायलट समर्थकों को सही प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद कम ही है।
इस बीच चुनाव परिणामों ने पायलट समर्थकों को हाईकमान के सामने जाने का एक मौका और दे दिया है। अहमद पटेल का जाना भी इस लड़ाई को फिर से उभार सकता है। दोनों के बीच सुलह कराने में अहमद पटेल की बड़ी भूमिका रही थी। उन्होंने दोनों को समझाकर मुद्दे का हल निकालने के लिए समय मांग कर विवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया था लेकिन अब पटेल के न होने से राज्य में पार्टी की अंदरूनी कलह फिर से उभरकर सामने आ सकती है।












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