Rajasthan: बीएसपी अब नहीं दोहराएगी पुरानी गलती, राजस्थान चुनाव में क्यों बदली अपनी रणनीति? जानिए

राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस के बाद पिछले करीब ढाई दशकों से बीएसपी तीसरी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है। इसका जनाधार लगातार बढ़ा है। लेकिन, इसका फायदा पार्टी की जगह दो बार कांग्रेस सरकारों ने उठाया है।

यही वजह है कि इस बार पार्टी प्रदेश में अपनी पुरानी गलतियों से सबक सीखते हुए नई रणनीति अपनाने के रास्ते पर चल पड़ी है। पार्टी राज्य की सभी 200 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है, लेकिन इसका फोकस उन करीब 60 सीटों पर रहेगा, जहां पिछले पांच वर्षों में उसने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए काफी मेहनत की है।

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राजस्थान में बीएसपी जनाधार बढ़ाने की कोशिशों में जुटी है
अभी तक पूर्वी राजस्थान के अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर जैसे इलाके बहुजन समाज पार्टी के गढ़ माने जाते हैं। लेकिन, पार्टी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वोटरों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए लगातार कोशिशें कर रही है।

इसी के तहत बसपा सुप्रीमो मायावती के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद ने 15 दिनों की संकल्प यात्रा भी निकाली थी। इस दौरान वे धौलपुर, गंगापुर, भरतपुर, करौली, दौसा, अलवर, सीकर, झुंझुनू, चूरू, बीकानेर, हनुमानगर और जोधपुर के इलाको में घूमे थे। इस संकल्प यात्रा में वे करीब 144 विधानसभा क्षेत्रों में गए थे और 100 बैठकों में भी हिस्सा लिया था।

नतीजों के बाद सत्ता संतुलन बनाने का लक्ष्य- बसपा नेता
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भगवान सिंह बाबा ने ईटी को बताया है कि, 'वैसे तो हम राजस्थान की सभी 200 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे, लेकिन हमने उन 60 चुनाव क्षेत्रों को रेखांकित किया है, जहां हमने पार्टी को मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने के लिए पिछले पांच वर्षों में अपनी काफी ऊर्जा लगाई है। हमारा लक्ष्य चुनाव परिणामों के बाद सत्ता का संतुलन बनाना है।'

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में निभाना चाहती है 'किंगमेकर' की भूमिका
साफ जाहिर है कि पार्टी त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राजस्थान में खुद को 'किंगमेकर' की भूमिका में देखना चाहती है। इसकी वजह ये है कि ढाई दशकों की मौजूदगी के बावजूद पार्टी को यहां चुनावों के बाद अक्सर ठगा हुआ महसूस हुआ है।

दो बार बीएसपी के विधायक कांग्रेस में चले गए
मसलन, पहली बार 1998 में ही बीएसपी ने राजस्थान में दो सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति का परिचय दे दिया था। 2018 में उसके विधायकों की संख्या बढ़कर 6 तक पहुंच गई, लेकिन पार्टी के हाथ में कुछ भी नहीं रह गया। उसके सारे एमएलए कांग्रेस में विलय कर गए, क्योंकि कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। 2008 में भी मायावती को कांग्रेस से ऐसा ही धक्का लगा था।

पार्टी ने बदल ली पुरानी रणनीति
2018 के चुनावों के बाद जिस तरह से बसपा के 6 विधायकों को कांग्रेस ने अपने में मिलाया, उससे मायावती सत्ताधारी दल से काफी नाखुश हुईं। इसलिए, अबकी बार पार्टी का टिकट देते समय उम्मीदवारों की 'वफादारी' पर काफी ध्यान दिया जा रहा है। पार्टी ने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकारों को बाहर से समर्थन देने वाली अपनी पुराने नीति भी बदल ली है।

अब बाहर से समर्थन की जगह सरकार में शामिल होगी बीएसपी
बीएसपी के एक सूत्र के अनुसार, 'पहले से अलग, इस बार अगर सरकार बनाने के लिए बीएसपी के समर्थन की जरूरत पड़ी तो हम सरकार में भागीदार बनेंगे। इसका मतलब ये है कि अगर सरकार बनाने के लिए बसपा के समर्थन की आवश्यकता पड़ी तो हम अपने विधायकों को मंत्री बनने की अनुमति देंगे।' उनके मुताबिक, मायावती ने कुछ महीने पहले दिल्ली में चुनावी राज्यों को लेकर हुई एक बैठक में इस बात के पुख्ता संकेत दिए थे।

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