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राजस्थान: पायलट खेमे के 19 विधायकों की सदस्यता बच गई तो गिर सकती है गहलोत सरकार

नई दिल्ली- राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला सुनने के लिए शुक्रवार तक इंतजार किए बिना राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी जिस तरह से आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, उससे लगता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे को कुछ बड़ी उलटफेर की आशंका सता रही है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के अधिकारों पर जिस तरह से कांग्रेस के बड़े वकीलों ने स्पीकर की पैरवी करते हुए जो दलीलें दी हैं, उससे भी संकेत मिलते हैं कि भले ही गहलोत खेमा बार-बार बहुमत होने का दावा कर रहा है, लेकिन उसके भरोसे में आत्मविश्वास की कमी है। आइए अब आंकड़ों के जरिए देखते हैं कि अशोक गहलोत खेमे के डर की वजह क्या है? अगर सचिन पायलट खेमे की विधानसभा सदस्यता फ्लोर टेस्ट होने तक बरकरार रह गई तो किस तरह से कांग्रेस की मौजूदा सरकार के औंधे मुंह गिरने का खतरा मंडरा रहा है।

पायलट के पक्ष में फैसला हुआ तो गिर सकती है गहलोत सरकार

पायलट के पक्ष में फैसला हुआ तो गिर सकती है गहलोत सरकार

भले ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अपने साथ पर्याप्त विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं, लेकिन जयपुर से लेकर दिल्ली तक उनका खेमा जिस तरह से अदालती दांव-पेंच में लगा हुआ है, उससे यह स्पष्ट है कि उनमें अपने बहुमत को लेकर आत्मविश्वास की कमी है। क्योंकि, पायलट खेमे के विधायकों को अलग करने के बाद उनके नंबर इतने कम बच जाते हैं कि सरकार का बचे रह पाना मुश्किल लगता है। इस समय 200 सदस्यों वाले सदन में भाजपा के पास 72 और उसकी सहयोगी आरएलपी के पास 3 विधायक हैं। वहां सचिन पायलट गुट को 3 निर्दलीय विधायकों के समर्थन मिलने के आसार हैं। इस तरह से मौजूदा सदन में गहलोत-विरोधी खेमे का आंकड़ा आसानी से 97 पहुंच जा रहा है। कांग्रेस के एक और विधायक भंवरलाल मेघवाल गंभीर रूप से बीमार हैं और वो भी पायलट के वफादार रहे हैं। भारतीय ट्राइबल पार्टी ने राजस्थान के सियासी संकट में अबतक जितनी गुलाटियां मारी हैं, उससे उसके 2 विधायकों का अंतिम फैसला क्या होगा वह सदन में बहुमत परीक्षण के दौरान ही जाहिर हो सकता है। रही बात स्पीकर सीपी जोशी की तो वह तभी वोट कर सकेंगे, जब दोनों पक्षों का आंकड़ा बराबर (टाई) रहेगा। यानि गहलोत खेमे की ओर से 105 या उससे अधिक विधायकों के दावे में बहुत बड़ा झोल है, जो वन इंडिया पहले भी बता चुका है और इसी से गहलोत सरकार के बहुमत के दावों पर भी सवालिया निशान लग जाता है।

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    कोर्ट के फैसले पर निर्भर हो गई गहलोत सरकार

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    यही वजह है कि स्पीकर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर करने के साथ ही भाजपा ने दावा करना शुरू कर दिया कि गहलोत सरकार अल्पमत में है। उनकी दलील है कि कांग्रेस को एहसास हो चुका है कि 19 बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने से ही उसकी सरकार बच सकती है। इन परिस्थितियो में अगर हाई कोर्ट पायलट खेमे को सदन में व्हीप के उल्लंघन करने तक अयोग्य ठहराने से सुरक्षित कर देता है तो गहलोत सरकार खतरे में पड़ सकती है। क्योंकि, अगर पायलट खेमे के 19 विधायकों ने पार्टी व्हीप का उल्लंघन करके सदन में गहलोत के खिलाफ वोटिंग की तो भले ही वो बाद में अयोग्य करार दे दिए जाएं, लेकिन नियमों के मुताबिक उनके मतों को गिना ही जाएगा। इसे यूं समझ लीजिए कि अगर मध्य प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस के बागी विधायक अपनी विधायकी से खुद ही इस्तीफा दे सकते हैं तो क्या ऐसे बागी राजस्थान में विधानसभा के अंदर अपनी सरकार के खिलाफ वोट देकर अपनी सदस्यता कुर्बान नहीं कर सकते?

    बहुमत है तो इतना परेशान क्यों हैं मुख्यमंत्री ?

    बहुमत है तो इतना परेशान क्यों हैं मुख्यमंत्री ?

    राजस्थान में जिस तरह से पिछले दिनों में सत्तापक्ष और विपक्ष की ओर से सियासी खेमेबाजियां हुई हैं, उससे भी लगता है कि वहां विपक्ष हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। खबरें है कि गहलोत खेमे के कुछ और विधायकों तोड़ने की कोशिशें हो सकती हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तो दल-बदल की आशंकाओं को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखकर अपनी चिंता भी जताई है। यानि संकेत साफ है कांग्रेस ने जिस तरह से भाजपा के खिलाफ लगातार आरोप लगाए हैं, अब वह खेमा भी अपने सारे मौके भुना लेने की कोशिश कर सकता है।

    बसपा से कांग्रेस में जाने वाले विधायकों के टूटने का डर?

    बसपा से कांग्रेस में जाने वाले विधायकों के टूटने का डर?

    अब सवाल है कि गहलोत खेमे को अब किन विधायकों के छोड़ जाने का डर सता रहा है; तो यह बसपा के 6 में से 5 विधायक (छठे विधायक गिरिराज सिंह मलिंगा गहलोत के पूर्ण वफादार बन चुके हैं) हो सकते हैं, जिन्हें आज भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाने वाली कांग्रेस ने पिछले साल अपने दल में मिला लिया था। भाजपा इन विधायकों के कांग्रेस में विलय होने की संवैधानिकता पर भी सवाल उठा रही है और हो सकता है कि वह राजस्थान हाई कोर्ट में इसको लेकर चुनौती भी दे दे। जबकि विधायकों के अपनी पार्टी छोड़ जाने का यह दर्द बसपा प्रमुख मायावती की जुबान से अक्सर सुनाई दे जाती है। अगर यह मामला अदालत में आया तो बीएसपी भी एक पार्टी हो सकती है।

    निर्दलीय विधायकों का भी कितना भरोसा?

    निर्दलीय विधायकों का भी कितना भरोसा?

    रही बात गहलोत को समर्थन देने वाले 10 निर्दलीय विधायकों की तो उनमें से 8 तो पूर्व कांग्रेसी ही हैं। वो अभी तक इसीलिए मुख्यमंत्री के साथ हैं, क्योंकि चर्चा है कि विधानसभा चुनावों के दौरान पायलट के इशारे पर उनका टिकट कट गया था। यानि यह विधायक सत्ता के लिए जरूर गहलोत की कुर्सी के साथ बंधे हो सकते हैं, लेकिन कल को अगर राजनीति करवट लेती है तो उन्हें भी अपनी वफादारी बदलने में कितनी देर लगेगी कहना मुश्किल है। उन्हें तो अपनी विधायकी को भी दांव पर लगाने का खतरा नहीं है। यही वजह है कि कांग्रेस ने अपने वकीलों की टीम के जरिए अपनी पूरी ताकत स्पीकर के अधिकारों की दुहाई देने पर टिका दी है, क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष के हाथों में ही सर्वाधिकार बचेगा तभी तो वह फ्लोर टेस्ट से पहले ही 19 विधायकों को अयोग्य ठहरा सकती है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार तक सुनवाई को जारी रखकर गहलोत से लेकर सोनिया गांधी तक की धड़कनें बढ़ा दी है।

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