वायनाड छोड़ राहुल गांधी की यूपी में वापसी, क्या हैं इसके सियासी मायने? जानिए क्यों किया रायबरेली का चुनाव
Raebareli Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन के साथ वापसी की है। देशभर में कांग्रेस पार्टी ने कुल 99 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इन 99 सीटों में केरल की वायनाड और उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट भी शामिल है। खास बात यह है कि इन दोनों सीटों से जीतने वाले उम्मीदवार एक ही हैं। दरअसल, राहुल गांधी ने इन दोनों सीटों पर जीत दर्ज की थी।
कोई भी व्यक्ति दो लोकसभा क्षेत्रों से सांसद नहीं रह सकता। इस वजह से राहुल गांधी को वायनाड और रायबरेली में से एक लोकसभा क्षेत्र का चुनाव करना था। लंबे सोच विचार के बाद आखिरकार पार्टी ने ये फैसला किया कि राहुल गांधी अपने परिवार की परंपरागत, रायबरेली सीट से सांसद बने रहेंगे और उन्होंने वायनाड के सांसद पद से इस्तीफा दे दिया।

वायनाड के उपचुनाव से प्रियंका करेंगी राजनीति में इंट्री
वायनाड से राहुल गांधी की बहन और कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी उपचुनाव लड़ेंगे। पहले से भी ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि राहुल गांधी वायनाड की सीट छोड़ सकते हैं क्योंकि रायबरेली गांधी परिवार का गढ़ रहा है। ऐसे में परंपरागत सीट पर रिस्क लेना सही नहीं होगा। माना जाता है कि उपचुनाव सत्ता पक्ष के लिए फायदेमंद साबित होती है, इस वजह से कांग्रेस रायबरेली सीट पर जुआ खेलना पसंद नहीं करेगी।
राहुल गांधी ने वायनाड के सांसद पद से इस्तीफा दे दिया है और कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को अपना उम्मीदवार बनाया है। प्रियंका इस उपचुनाव के माध्यम से सक्रीय राजनीति में एंट्री कर रही हैं। अब तक उन्होंने कभी भी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। हालांकि, अपने परिवार और पार्टी के लिए वो चुनाव प्रचार में बेहद सक्रीय रही हैं।
बुरे वक्त में साथ निभाने वाले वायनाड को छोड़ क्यों किया रायबरेली का चुनाव?
अब ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर राहुल गांधी ने वायनाड सीट को छोड़कर रायबरेली को ही क्यों चुना? जबकि वायनाड की जनता ने उन्हें तब अपनाया था जब वो 2019 में अपने परंपरागत सीट और कांग्रेस के गढ़, अमेठी में हार गए थे। बता दें, रायबरेली के चुनाव के पीछे कई सियासी मायने हैं।
2024 लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में शानदार जीत दर्ज की है। यूपी के चुनाव परिणाम ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़ा झटका दिया है। लोकसभा में सबसे अधिक 80 सांसद उत्तर प्रदेश से चुनकर जाते हैं। 2019 में यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था। कांग्रेस को उस दौरान महज एक सीट पर जीत के साथ संतोष करना पड़ा था।
खोई जमीन वापस पाने की दिखने लगी है उम्मीद
बात करें विधानसभा चुनाव की तो 2022 के विधानसभा चुनाव में काफी जद्दोजहद के बावजूद कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की केवल दो विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा। जहां सपा ने राज्य में जोरदार वापसी की वहीं कांग्रेस को भी सीटों का लाभ हुआ। कांग्रेस ने इस बार उत्तर प्रदेश की 6 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। यूपी में कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक पकड़ को अब और मजबूत करने में जुटी हुई है।
लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार यूपी में बेहद सक्रिय नजर आया। प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ-साथ सोनिया गांधी ने भी जनता से इंडिया ब्लॉक ले पक्ष में वोट करने की अपील की।
यूपी में एक्टिव कांग्रेस
सोनिया ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने बेटे (राहुल गांधी) को रायबरेली की जनता को सौंपने की बात भी कही थी। सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ती आईं हैं। इस बार उनके राजयसभा जाने के साथ उनके बेटे, राहुल गांधी ने मां विरासत संभालते हुए यहां से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। यूपी में मिली जीत के बाद कांग्रेस ने राज्य में अपनी सक्रियता और बढ़ा दी है।
सपा के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने के संकेत
जीत के बाद राहुल गांधी ने रायबरेली में आभार सभा की साथ ही उन्होंने 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ने के संकेत भी दिए। अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ती है तो मुमकिन है कांग्रेस को यूपी संजीवनी मिल जाए। वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस ने प्लान बी भी तैयार रखा है। अगर सपा के साथ विधानसभा चुनाव में बात नहीं बनती है तो इसके लिए भी कांग्रेस ने तैयारी शुरू कर दी है।
1952 से रायबरेली रही है कांग्रेस का गढ़
बता दें, कांग्रेस पार्टी के वायनाड और रायबरेली में, वायनाड के चुनाव के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। पहला ये कि राहुल गांधी ने अपने परिवार की परंपरागत सीट को महत्त्व दिया जहां से गांधी परिवार 1952 से जीतता आ रहा है। बता दें, रायबरेली से राहुल के दादा फिरोज गांधी, दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी सांसद रह चुके हैं। इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने 1952 में पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी। उसके बाद से ये सीट कांग्रेस और गांधी परिवार का गढ़ बन गया। इंदिरा गांधी ने 1967 से 1977 के बीच 10 साल तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, 1977 में इंदिरा गांधी को हार का भी सामना करना पड़ा था।
2004 से सोनिया ने संभाली रायबरेली की कमान
इंदिरा गांधी ने साल 1980 में दो सीटों रायबरेली और अविभाजित आंध्र प्रदेश में मेडक से चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटों पर जीत दर्ज की। जिसके बाद उन्होंने रायबरेली सीट के सांसद पद से इस्तीफा देकर मेडक सीट को बरकरार रखा। 1980 के बाद से गांधी परिवार के करीबी अरुण नेहरू, शीला कौल और कैप्टन सतीश शर्मा ने 2004 तक इस सीट जीत हासिल किया और रायबरेली का प्रतिनिधित्व करते रहे।
साल 2004 से सोनिया गांधी यहां से चुनाव लड़ती रहीं और 2019 तक इस सीट से सांसद रहीं। इस बार यानी 2024 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी के राज्यसभा जाने के बाद इस सीट से राहुल गांधी ने चुनाव लड़ा। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गांधी परिवार की पारिवारिक विरासत रायबरेली, हमेशा से एक मजबूत गढ़ रहा है।
यूपी में बीजेपी को कड़ी चुनौती देने की राहुल की कोशिश
रायबरेली सीट का चुनाव न केवल राहुल गांधी की व्यक्तिगत सियासी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, बल्कि यह भारतीय राजनीति के लिए भी एक बड़ा संदेश है। यूपी की सियासत का राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव रहता है। ऐसे में राहुल गांधी का यूपी में रहकर राजनीति करना बीजेपी के लिए भी आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती है।
फिलहाल यूपी में बीजेपी की स्थिति मजबूत है और इस मजबूती को 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के जरिए तोड़ने की कोशिश करेगी। गांधी परिवार और पार्टी के वरिष्ठ नेता भी चाह रहे थे कि राहुल रायबरेली का प्रतिनिधित्व करें।
रायबरेली की जीत इस लिहाज से भी बड़ी है कि कांग्रेस ने अमेठी की खोई सीट भी इस लोकसभा चुनाव में हासिल कर ली है। ऐसा माना जा रहा कि रायबरेली सीट को बनाए रखें का फैसला 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है।












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