क्या कांग्रेस में अकेले पड़े राहुल गांधी को आ रही होगी अपने हमदर्द लालू की याद ?

नई दिल्ली। ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस से अलग होना राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ा झटका है। सिंधिया न केवल राहुल के करीबी थे बल्कि भरोसेमंद सलाहकार भी थे। अच्छे-बुरे हर वक्त में वे राहुल गांधी के साथ खड़े रहते थे। कई चुनावों में हार के बाद 2017 में जब राहुल की क्षमता पर जब सवाल उठने लगे तब ज्योतिरादित्य सिंधिया ही उनकी ढाल बने थे। ऐसे मित्र और सहयोगी की गैरमौजूदगी राहुल गांधी को जरूर खल रही होगी। कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद राहुल वैसे भी अकेलापन महसूस कर रहे थे। अब उनका एकाकीपन और बढ़ता नजर आ रहा है। क्या राहुल को इस मुश्किल वक्त में लालू यादव की याद आ रही होगी ? राष्ट्रीय राजनीति में लालू यादव ही वह नेता हैं जो बिना किसी परवाह के सोनिया गांधी और राहुल गांधी का समर्थन करते रहे हैं। सोनिया और राहुल जब-जब मुश्किल में रहे लालू यादव उनके लिए संबल बन कर खड़ा रहे।

जब सोनिया के बचाव में अकेले खड़े थे लालू

जब सोनिया के बचाव में अकेले खड़े थे लालू

1998 में जब सोनिया गांधी कांग्रेस का अध्यक्ष बनीं तो भाजपा ने उनके विदेशी होने का मुद्दा उठा दिया। यह मुद्दा तूल पकड़ने लगा। इटैलियन सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस भी बैकफुट पर आ गयी। कांग्रेस के अंदर विरोध के स्वर फूटने लगे। 1999 के आते-आते शरद पवार, पीए संगमा, तारिक अनवर जैसे कांग्रेस के नेता विदेशी मूल की होने के कारण सोनिया गांधी का विरोध करने लगे। राजेश पायलट ने सोनिया का विरोध तो नहीं किया लेकिन शरद पवार के सवालों को जायज बता दिया। चूंकि सीताराम केसरी को अपमानजनक तरीके से कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया गया था इसलिए केसरी समर्थक भी सोनिया की कुर्सी हिलाने में लगे थे। सोनिया गांधी राजनीतिक दांवपेंच से अंजान थीं। अर्जुन सिंह, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, जितेन्द्र प्रसाद जैसे नेता जरूर सोनिया के समर्थन में थे लेकिन विदेशी मूल के मुद्दे ने उन्हें असहज बना दिया था। मुलायम सिंह यादव जैस कई क्षेत्रीय नेता भी सोनिया के विरोध में थे। ऐसे मुश्किल वक्त में लालू यादव ही सोनिया का संबल बन कर पलटवार के लिए खड़े हुए थे। उन्होंने कहा था, कौन कहता है सोनिया विदेशी हैं ? वे भारत की बहू हैं और हम उन्हें प्रधानमंत्री बनाएंगे। उस समय कांग्रेस के नेता भी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये थे। 1999 के लोकसभा चुनाव की जब घोषणा हुई तो लालू ने एकतरफा कह दिया था कि वे सोनिया गांधी का हर कदम पर साथ देंगे। आज सोनिया गांधी अगर राजनीति में स्थापित हैं तो इसमें लालू यादव की भी बड़ी भूमिका है।

 राहुल से पहले तनातनी फिर नजदीकी

राहुल से पहले तनातनी फिर नजदीकी

2013 में मनमोहन सिंह की सरकार जनप्रतिनिधित्व संशोधन अध्यादेश लेकर आयी थी। माना जाता है कि लालू यादव को बचाने के लिए ये अध्यादेश लाया गया था। लेकिन राहुल गांधी के विरोध के कारण सरकार यह अध्यादेश वापस लेना पड़ा था। 2013 में राहुल गांधी की वजह से लालू यादव को सांसदी गंवाने की नौबत आयी थी। राहुल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमलावर थे। वे लालू के साथ मंच साझा नहीं करते थे। लालू की सोनिया से तो नजदीकी बनी रही लेकिन राहुल थोड़े खींचे खींचे रहे। जुलाई 2017 में नीतीश ने जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महागठबंधन से किनारा कर लिया तो राजद को अचनाक सत्ता सुख से वंचित होना पड़ा। लालू यादव नयी परिस्थियों के हिसाब से सोचने पर मजबूर हुए। इस बीच दिसम्बर 2017 में राहुल गांधी जब कांग्रेस का अध्यक्ष बने तो लालू यादव ने उन्हें बधाई देने में बिल्कुल देर नहीं की। इसके बाद राहुल और लालू यादव एक दूसरे के नजदीक आने लगे।

राहुल के हाथ में ही देश सुरक्षित- लालू

राहुल के हाथ में ही देश सुरक्षित- लालू

राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद लालू यादव ने कहा था, राहुल के हाथ में देश सुरक्षित रहेगा। वे अभी युवा हैं। उनके नेतृत्व में हम लोकसभा का चुनाव लडेंगे। इतना ही नहीं लालू यादव ने ये बात भी साफ कर दी थी कि उनकी राहुल गांधी से कोई अनबन नहीं है। खटपट की बात मीडिया के दिमाग की उपज है। यूपीए के कई दल जब राहुल के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे थे तब लालू उन्हें नेता मान कर चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे। लालू की इस दरियादिली पर राहुल गांधी भी मेहराबन हुए। 2018 में जब लालू इलाज के लिए दिल्ली एम्स गये हुए थे तब राहुल गांधी ने अस्पताल जा कर उनसे मुलाकात की थी। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी, उस समय भी लालू उनके समर्थन में खड़े थे। लालू ने कहा था कि राहुल का यह फैसला न केवल कांग्रेस के लिए आत्मघाती होगा बल्कि भाजपा विरोधी ताकतों के लिए भी बड़ा झटका होगा। लालू ने राहुल को पद पर बने रहनी की पुरजोर वकालत की थी। यानी लालू ने राहुल गांधी को भाजपा विरोध का सबसे बड़ा चेहरा करार दिया था। राहुल गांधी को भी लालू की जरूरत है। वे इस बात से वाकिफ हैं कि अगर भाजपा को हराना है तो लालू का साथ जरूरी है। सिंधिया प्रकरण के बाद राहुल एक बार फिर विचलित हैं। इस मुश्किल घड़ी में राहुल गांधी को कांग्रेस के हमदर्द लालू यादव की याद जरूर आ रही होगी।

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