मोदी से ये सीख लेते राहुल तो इतनी 'बुजुर्ग' और बेबस नहीं होती कांग्रेस

नई दिल्ली- बीजेपी ने लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं का टिकट उम्र का हवाला देकर काटा तो राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के लिए हद से आगे चले गए। उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की थी कि भाजपा में बुजुर्ग नेताओं की को कद्र ही नहीं है। लेकिन, ये हकीकत शायद राहुल भी जानते हैं कि खुद वो ही पार्टी पर बुजुर्ग नेताओं की गिरफ्त से हार मान चुके हैं। उनके इस्तीफे में भी यह दर्द छलकर बाहर आया है। राहुल बार-बार इशारा करते रह गए, लेकिन कोई भी बड़ा नेता गंभीरता से पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में स्थिति ऐसी आई कि राहुल को ही अपने फैसले पर अडिग रहना पड़ा और वो मन ही मन जिनसे कांग्रेस को छुटकारा दिलाना चाहते थे, वो पार्टी को अपनी गिरफ्त से छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। इसका संकेत खुद उन्होंने अपने इस्तीफे में भी दिया है। उन्होंने कहा है, "भारत में यह आदत है कि जिनके पास सत्ता होती है वो उसे अपने ही पास रखना चाहते हैं। कोई सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। लेकिन, बिना सत्ता का मोह छोड़े, हम अपने विरोधियों को नहीं हरा पाएंगे और न ही उनसे विचारधारा की लड़ाई लड़ पाएंगे।"

बुजुर्ग कांग्रेसियों ने राहुल की नहीं चलने दी

बुजुर्ग कांग्रेसियों ने राहुल की नहीं चलने दी

सोनिया गांधी ने लगभग दो दशक तक पार्टी का नेतृत्व किया और आज भी वो पार्टी संसदीय दल की नेता हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हैं और उन्होंने 10 साल तक देश को संभाला और अब कई बार उन्हें चलते समय संभालना पड़ता है। लेकिन, अभी भी उनके लिए राज्यसभा में घुसने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। कहने के लिए कांग्रेस में निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी संस्था कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) है, जिसमें 55 सदस्य हैं। इनमें से ज्यादातर सदस्य सोनिया गांधी की दौर से भी काफी पुराने हैं। मोतीलाल वोरा तो 93 वर्ष के हो चुके हैं और 1928 में जब वे पैदा हुए थे, तब इंदिरा गांधी के दादा मोतीलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करते थे। आज वे खुद से चलने की हालत में भी नहीं हैं, लेकिन राहुल की जगह उन्हें ही अंतरिम कमान सौंपने की चर्चा हो रही है। वे अकेले नहीं हैं। 55 में से लगभग 20 सीडब्ल्यूसी मेंबर 70 की दहलीज पार कर चुके हैं। ये वह उम्र है जिसमें नरेंद्र मोदी और अमित शाह उनका विकल्प तलाशना शुरू कर देते। इनके अलावा तरुण गोगोई, हरीश रावत, कमलनाथ, ओमान चांडी, गुलाम नबी आजाद, एके एंटनी, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अशोक गहलोत, आनंद शर्मा, सिद्दारमैया, सोनिया गांधी के जमाने से भी पहले से सक्रिय राजनीति में हैं और कांग्रेस के अंदर की सत्ता के आसपास मंडराते रहे हैं।

राहुल ने कोशिश की, लेकिन नाकाम हो गए

राहुल ने कोशिश की, लेकिन नाकाम हो गए

2004 में जब राहुल गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारा गया तब उम्मीद थी कि कांग्रेस में युवाओं को ज्यादा मौका मिलेगा। जब 2014 में राहुल के चेहरे को आगे करने के बाद कांग्रेस नरेंद्र मोदी की हवा में हार गई, तो राहुल ने वर्किंग कमिटी में कुछ युवाओं को जगह देने की कोशिश की। लेकिन, बुजुर्ग नेताओं के दबदबे के सामने उनकी एक नहीं चली। राहुल को इस समस्या का अनुभव उससे पहले ही हो चुका था। 2013 से ही उन्होंने कांग्रेस में जवाबदेही तय करने के साथ-साथ ज्यादा पारदर्शिता की वकालत करनी शुरू की थी। उन्होंने पार्टी में गोपनीयता और संरक्षणवाद की परंपरा पर अंकुश लगाने का प्रयास शुरू किया था। तभी से बुजुर्ग नेताओं ने उनकी राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए। उन्हें 2019 में टिकट बंटवारे और गठबंधन बनाने में भी बुजुर्ग नेताओं की अड़ंगेबाजी झेलनी पड़ी। सबसे बड़ा उदाहरण तो दिल्ली का है, जहां वह चाहकर भी आम आदमी पार्टी के साथ सीटों का तालमेल नहीं कर पाए। इन बुजुर्ग कांग्रेसियों के सामने राहुल गांधी की लाचारी तब उजागर हो गई, जब उन्हें कहना पड़ा कि, "मैं दूसरों से भी इस्तीफा देने के लिए नहीं कह सकता। यह उनपर है कि वे अपनी जिम्मेदारी लेना चाहते हैं।"

बीजेपी और मोदी से सीखते तो ऐसा न होता

बीजेपी और मोदी से सीखते तो ऐसा न होता

ये सच है कि कांग्रेस और भाजपा के संगठन में बुनियादी फर्क है। आजादी के बाद कांग्रेस जिस दिशा में बढ़ी है, बीजेपी का संगठन उससे पूरी तरह से अलग है। इसका फर्क पार्टी पर स्पष्ट देखा जा सकता है। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गई, तो उन्होंने खुद को पार्टी की सक्रिय गतिविधियों से किनारा करना शुरू कर दिया। जबकि, वे पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। उनके बाद जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी के कंधे पर आ गई। उन्हें जिन्ना विवाद के बावजूद 2009 में पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश किया गया। वे सफल नहीं हुए। तब 2014 में पार्टी को नरेंद्र मोदी का नेतृत्व मिला। मोदी ने सरकार और संगठन पर दबदबा बनाते हुए सभी बुजुर्ग नेताओं को सम्मानजनक तरीके से रिटायरमेंट की व्यवस्था कर दी। अलबत्ता सुषमा स्वराज, अरुण जेटली या राजनाथ सिंह जैसे आडवाणी-वाजपेयी के वफादारों को पूरी जिम्मेदारी सौंपने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए अपने भरोसेमंद अमित शाह को पार्टी का अध्यक्ष बनवाया और वो दोनों आज भाजपा के लिए जीत की मशीन साबित हो चुके हैं। 2019 के चुनाव में उन्होंने बुजुर्ग नेताओं के लिए रिटायरमेंट प्लान पर अमल करना जारी रखा। कुछ नेताओं ने खुद ही समझदारी दिखाते हुए सक्रिय राजनीति से एक तरह का संन्यास ले लिया, तो कुछ को टिकट देने के नाम पर हाथ जोड़ लिया गया। लेकिन, फिर भी उन नेताओं के सम्मान में कभी कोई कमी छोड़ने की कोशिश नहीं हुई। शायद उन नेताओं ने भी हालात को समझकर ये स्वीकार कर लिया कि अगर वो रास्ता नहीं देंगे, तो युवा कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का मौका कैसे मिलेगा।

कहां चूक गए राहुल

कहां चूक गए राहुल

राहुल गांधी की दिक्कत ये रही कि जो नेता कहते रहे कि कांग्रेस को एकजुट रखने के लिए गांधी नाम ग्लू का काम करता है, वही राहुल को उनकी नई सोच के मुताबिक पार्टी को चलाने में सबसे बड़ी बाधा बने रहे। ऐसे में राहुल गांधी की सबसे बड़ी चूक या लाचारी ये रही कि वो ऐसे नेताओं को किनारा करने का साहस ही नहीं दिखा पाए। राहुल गांधी के 200 से ज्यादा वफादारों ने 1963 के कामराज प्लान की तरह इस्तीफा देकर भी बुजुर्ग नेताओं को एक रास्ता दिखाने की कोशिश की था, लेकिन वे तो टस से मस होने के लिए ही तैयार नहीं थे। राहुल के करीबियों ने सीडब्ल्यूसी समेत उन 17 प्रदेश कमिटियों और उसके अध्यक्षों को भी बर्खास्त करने का सुझाव दिया, जहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली है। कुछ कमिटियों पर तो ऐक्शन लिया भी गया। लेकिन, न तो यह 1963 वाली कांग्रेस है और न ही उसके पास उस दौरान जैसा नेता है। इधर राहुल के वफादार बुजुर्ग नेताओं पर परोक्ष तौर पर इस्तीफे का दबाव बना रहे थे, उधर बुजुर्ग नेता कभी अंतरिम अध्यक्ष, कभी कार्यकारी अध्यक्ष की थ्योरियां मीडिया में जानबूझकर लीक कराकर अपने ऊपर पड़ने वाले दबाव को कम करने की ताक में लगे हुए थे। मजे की बात ये है कि इसके लिए जिन नेताओं का नाम उछाला गया, वे तमाम नेता वही हैं, जिनसे कहीं न कहीं राहुल गांधी परेशान नजर आए हैं। दिलचस्प बात ये है कि राहुल गांधी के फाइनल इस्तीफे के बाद भी जिस नेता का नाम अंतरिम अध्यक्ष के लिए सामने लाया जा रहा है, वो मोतीलाल वोरा जैसे बुजुर्ग हैं। फंडा सिर्फ एक है कि गांधी नाम पार्टी के लिए सीमेंट का काम करेगा और ये बुजुर्ग नेता लगभग अंतिम सांसें गिन रहे संगठन की इमारत बुलंद करने के लिए ईंट लाकर इकट्ठा करेंगे।

राहुल गांधी ने हारकर जिस तरीके से इस्तीफा दिया है उससे साफ हो जाता है कि उन्होंने सिर्फ अध्यक्ष पद ही नहीं छोड़ा है, बल्कि उन्होंने उन बुजुर्ग कांग्रेसियों की गिरफ्त से भी खुद को किसी तरह से आजाद किया है। इसलिए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भले ही मजाक उड़ाया हो या उनपर बुजुर्ग नेताओं से अभद्रता करने का गैर-वाजिब आरोप लगाया हो, लेकिन शायद उन्हें अब जरूर अहसास हो रहा होगा कि अगर उन्होंने मोदी से थोड़ी भी सीख ले ली होती, तो कांग्रेस को इस हाल में छोड़कर उन्हें भागने को मजबूर नहीं होना पड़ता।

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