2025 में राहुल गांधी ने कितनी चुनावी रैलियां की, कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं? असलियत कर देगी हैरान
Rahul Gandhi rallies 2025: राजनीति में हार और जीत एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, लेकिन कांग्रेस ने इस सिक्के को ही शायद 'म्यूजियम' में रखने का फैसला कर लिया है। साल 2025 में हुए दिल्ली और बिहार के चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राहुल गांधी भले ही हजारों किलोमीटर पैदल चल लें, लेकिन वोटर्स का दिल नहीं जीत पाएंगे।
2025 खत्म होने को है, आइए जानते हैं राहुल गांधी ने 2025 में हुए दो अहम राज्यों में के चुनावों में कितनी चुनावी रैलियां की और कांग्रेस ने कितनी सीटों पर जीत हासिल की?

दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने की खूब रैलियां, कांग्रेस शून्य पर हुई आउट
2025 की शुरूआत में 5 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ। राहुल बाबा ने 2025 की कंपकपाती ठंड में सीलमपुर और ओखला की रैलियों में संविधान का पाठ पढ़ाया। लगभग आधा दर्जन रैलियां कीं, जाड़े में खूब पसीना बहाया और उम्मीद जताई कि 'हाथ' इस बार झाड़ू को साफ कर देगा।
लेकिन जब नतीजे आए, तो पता चला कि दिल्ली की जनता ने कांग्रेस के लिए 'जीरो' को ही अपना स्थायी पता मान लिया है। लगातार तीसरी बार शून्य पर कांग्रेस आउट हो गई। राहुल गांधी की रैलियों का असर ऐसा रहा कि पार्टी दिल्ली में अपने पुराने वोट बैंक को गवां दी।
बिहार चुनाव में भी फ्लाप साबित हुए राहुल गांधी
फिर बारी आई बिहार की विधानसभा चुनाव की। 5 नवंबर को बिहार चुनाव संपन्न हुए, यहां राहुल गांधी ने 1300 किलोमीटर की 'वोटर अधिकार यात्रा' निकाली। सासाराम से पटना तक उन्होंने इतनी धूल उड़ाई कि लगा शायद नीतीश और तेजस्वी के सारे समीकरण हवा हो जाएंगे।
चुनाव प्रचार के दौरान मुजफ्फरपुर से पूर्णिया तक राहुल गांधी ने करीब 15 रैलियां कीं, तेजस्वी यादव के साथ मंच साझा किया और 'मोहब्बत की दुकान' का शटर उठाने की कोशिश की। लेकिन बिहार के मतदाताओं ने 'मोहब्बत' की जगह 'वोटों' की दुकान कहीं और ही सजा रखी थी। 61 सीटों पर लड़कर कांग्रेस पार्टी महज 6 सीटों पर सिमट गई। यानी जितनी रैलियां हुईं, उतनी भी सीटें नहीं आईं!
2025 में राहुल गांधी और कांग्रेस को जनता ने नकारा
2025 का साल राहुल गांधी के लिए एक ऐसा 'कोर्स' रहा, जिसमें उन्होंने मेहनत तो पूरी की, लेकिन उत्तर पुस्तिकाओं पर स्याही गिरा आए। दिल्ली की गलियों से लेकर बिहार के चौर तक, राहुल गांधी की रैलियां केवल 'इवेंट मैनेजमेंट' बनकर रह गईं। अब कांग्रेस के रणनीतिकार इसे 'नैतिक जीत' का जामा पहनाएं या वोट शेयर में 2% की बढ़ोत्तरी का जश्न मनाएं, हकीकत यही है कि जनता को राहुल गांधी का भाषण पसंद तो आता है, लेकिन बतौर 'मनोरंजन', 'मतदान' के तौर पर नहीं। शायद 2025 के इन झटकों के बाद अब कांग्रेस को 'यात्राओं' से ज्यादा अच्छी चुनावी रणनीति की जरूरत है, ताकि वह हार की इस जाल से बाहर निकल सके।












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