पंजाब: बेअदबी के मामले चुनावी राजनीति पर कितना असर डालते हैं?
पंजाब में हाल के दिनों में बेअदबी के दो मामले सामने आए हैं और दोनों ही घटनाओं में जिन दो लोगों पर आरोप लगे उन्हें लोगों ने पीट-पीट कर मार दिया है. पहली घटना अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की है और दूसरी कपूरथला की है.
पंजाब में आगामी कुछ महीनों के भीतर चुनाव होने हैं. सारी राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर बड़े ध्यान से बयान दे रही हैं. मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी स्वर्ण मंदिर पहुँचे और कहा कि कांग्रेस सरकार बेअदबी की घटना की जड़ तक जाएगी.
दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही मामलों में, सभी पार्टियों ने बेअदबी की घटनाओं की जाँच और उसकी तह तक जाने की मांग तो की है लेकिन किसी ने दो लोगों को पीट-पीट कर मारने के विषय में कोई बयान नहीं दिया है.
शायद ये इस बात का साफ़ संकेत है कि पंजाब कि सियासत में बेअदबी के मामलों की संवेदनशीलता कितनी अधिक है. कई जानकार मानते हैं कि साल 2017 में विधानसभा चुनाव अकाली दल-बीजेपी सरकार की हार में भी ऐसी घटनाओं का अहम रोल था.
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क्या है इतिहास?
पंजाब के फ़रीदकोट ज़िले के जवाहरसिंह वाला गांव में एक जून 2015 को स्थानीय गुरुद्वारे से गुरु ग्रंथ साहिब का 'सरूप' ग़ायब हो गया था. उस बेअदबी की पहली घटना के बाद से अब तक राज्य में छह जांच-दल इन मामलों और इनका विरोध कर रहे लोगों पर गोली चलाने के मामलों को देख चुके हैं लेकिन अब तक कोई स्पष्ट बात सामने नहीं आई है.
एक अनुमान के अनुसार 2015 के बाद से अब तक पंजाब में सिख, हिंदू और इस्लाम से जुड़े 170 बेअदबी के मामले सामने आ चुके हैं.
पहली घटना के बाद उसी वर्ष सितंबर में जवाहरसिंह वाला और बरगाड़ी गांव में गुरु ग्रंथ साहिब के बारे अपमानजनक भाषा वाले पोस्टर चिपके मिले थे. अगले महीने बरगाड़ी गांव की सड़कों पर गुरु ग्रंथ साहिब के कई अंग (पन्ने) फटे मिले थे. इसके बाद पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया था और लोग सड़कों पर आ गए थे.
ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान बहबल कलां में पुलिस की फ़ायरिंग में कृष्ण भगवान सिंह और गुरजीत सिंह की मौत हो गई. अब तक उनके परिवार वाले इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं.
गुरजीत सिंह के पिता साधु सिंह ने बीबीसी पंजाबी को बताया कि छह साल बाद, न तो गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान और न ही उनके बेटे की मौत के मामले में न्याय हुआ है. वे कहते हैं कि जिन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया था, उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए.
उस वक्त की प्रकाश सिंह बादल सरकार ने इस मामले की जांच के आदेश दिए थे. बाद में नवंबर 2015 में अकाली-बीजेपी सरकार ने इस सारे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. सीबीआई ने अपनी जांच बेनतीजा ही बंद कर दी थी.
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मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों?
उस समय विपक्ष में बैठी कांग्रेस ज़ोर-शोर से ये मुद्दे उठाती रही. पार्टी 2017 में राज्य में सत्ता में आ गई. कई जानकार मानते हैं कि बेअदबी के मामलों में जाँच में अकालियों की कथित विफलता, उनकी हार के कारणों में प्रमुख रही.
हालाँकि, 2017 में लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए विधानसभा चुनावों में उतरा अकाली-बीजेपी गठबंधन एंटी-इनकंबेसी की मार भी झेल ही रहा था. कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनावों में इन मामलों की जड़ तक जाने का वादा किया था लेकिन पांच साल बाद भी कई सवाल अब भी जवाब तलाश रहे हैं.
पंजाब की राजनीति में ये मामला बेहद संवेदनशील है. और आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ऐसी किसी भी घटना के सियासी रंग में रंगने को वक्त नहीं लगेगा.
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं कि साल 1978 में अकालियों और निरंकारियों को बीच हुई झड़पों के पीछे भी बेअदबी का ही मामला था.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "निरंकारी गुरवाणी को तोड़-मरोड़ कर पेश करते थे जो एक बेअदबी थी. बाद में अकाली-निरंकारी झड़प में 13 सिख प्रदर्शकारी मारे गए थे. उसके बाद पंजाब में चरमपंथ शुरू हुआ. इसी से समझ लीजिए कि ये पंजाब के लिए कितना संवेदनशील मुद्दा है."
राजनीतिक पार्टियां अक्सर इन मुद्दों का इस्तेमाल अपने चुनावी लाभ के लिए करती रही हैं. 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव के चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी और उस वक्त उनके नेता अमरिंदर सिंह ने जोर-शोर से ये मुद्दा उठाया और पार्टी को उससे फ़ायदा भी हुआ. लेकिन साढ़े चार साल सत्ता में रहने के बाद भी कैप्टन अमरिंदर सिंह इन मुकदमों को अंजाम तक नहीं पहुँचा पाए.
कई जानकार मानते हैं कि बेअदबी के मामलों में कार्रवाई में कथित ढील की वजह से ही कांग्रेस ने उन्हें सीएम की कुर्सी छोड़ने को कहा था.
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'जम्हूरियत सिर्फ़ चुनाव नहीं'
लेकिन चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूट फ़ॉर डेवलपमेंट ऐंड कम्युनिकेशन के निदेशक प्रमोद कुमार की चिंता कुछ और है. उनका कहना है कि बेअदबी के मामलों में सियासत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ़ चुनाव जीतना ही ज़रूरी नहीं, सबसे ज़रूरी है 'डिलिवरी ऑफ़ जस्टिस', और इन मामलों में यही नहीं हुआ है.
प्रमोद कुमार ने बीबीसी को बताया, "राजनीतिक दलों के फ़ायदे-नुकसान वाले आकलन की वजह से ही ऐसे मुद्दों को ज़िंदा रखा जाता है. लेकिन इस वजह से पंजाब के विभिन्न समुदायों में सौहार्द्र के माहौल में ख़लल पड़ने की आशंका रहती है."
बीते कुछ दिनों में हुए दो मामलों की तरह पहले भी हर बार बेअदबी के मामले सामने आने के बाद साज़िश की बात की जाती है. डेरा सच्चा सौदा के लोग गिरफ़्तार भी हुए हैं लेकिन आज तक किसी षडयंत्र की साफ़ और निष्कर्षपूर्ण तस्वीर जाँचकर्ताओं ने पेश नहीं की है.
जगतार सिंह कहते हैं कि पंजाब में उत्तर प्रदेश या बिहार सरीखा सांप्रदायिक विभाजन नहीं है. उन्हें लगता है कि कुछ तत्व ऐसा ही विभाजन कर उसका सियासी लाभ उठाना चाहते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "अब भी इसे साज़िश की तरह देखा जा रहा है कि क्या कहीं ये चुनाव से पहले लोगों को बांटने की चाल तो नहीं है. देखिए बरगाड़ी के केस में सिरसा के डेरा सच्चा सौदा का नाम आया था. उनके पीछे किसका हाथ था अभी इसका पता नहीं चला है क्योंकि जांच अभी पूरी नहीं हुई है. एक भी केस में जांच निष्कर्ष साज़िशकर्ताओं के पीछे किसका हाथ है, ये नहीं बता पाई है."
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लिचिंग पर ख़ामोशी
पंजाब की सभी राजनीतिक पार्टियों ने बेअदबी की घटना की आलोचना की है और इसकी गहन जाँच की माँग की है. लेकिन दोनों घटनाओं में पीट-पीट कर मारे गए लोगों यानी लिंचिंग के विषय पर पार्टियां ख़ामोश रहीं. पंजाब में कुछ लोग ट्विटर के माध्यम से सवाल उठा रहे हैं कि क़ानून हाथ में लेने के बजाय इन लोगों को प्रशासन के हवाले कर देना चाहिए था.
लिंचिग पर डॉ प्रमोद कुमार कहते हैं, "जो बेअदबी हुई वो बहुत ही ग़लत थी लेकिन अगर आप बेअदबी करने वाले को वहीं पर पीट-पीट कर मार देंगे तो साज़िश का पता कैसे चलेगा? ऐसे मामलों में रूल ऑफ़ लॉ को फ़ॉलो किए जाए तो पता चलेगा कि व्यक्ति ने ऐसा क्यों किया. धर्म की आड़ में 'लाइसेंस टू किल' को ठीक नहीं ठहराया जा सकता.
"ये इस राजनीति का दुखांत है. राजनीतिक दल इसे प्रतिस्पर्द्धात्मक राजनीति और सियासी बदले की भावना का हिस्सा बना लेते हैं. मुझे लगता है कि न्याय देने की प्रक्रिया के बजाय चुनाव को ही डेमोक्रेसी मान लिया जाता है. लिचिंग की घटनाएं समाज का तालिबानीकरण है. राजनीतिक दलों और मानवाधिकारों के लिए काम करने वालों को इसपर बोलना चाहिए. "
साल 2015 में बेअदबी की पहली घटना के बाद से ही ये मुद्दा पंजाब की राजनीति के केंद्र में रहा है. यहाँ तक कि कांग्रेस के बीच मौजूदा मतभेदों के केंद्र में भी यही मुद्दा है.
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू गाहे-बगाहे अपनी ही सरकार पर, इस मामले में ढीला रवैया अपनाने के आरोप लगाते रहे हैं.
इन सारे मामलों में साज़िश का पता लगाने के लिए बनी एसआईटी पर चुनाव से पहले कोई पुख़्ता जांच रिपोर्ट लाने का दबाव है लेकिन ये होता नहीं दिख रहा. सवाल ये भी पूछे जाते हैं कि इसके बाद भी साज़िश से पर्दा उठता क्यों नहीं?
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