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लोकसभा चुनाव 2019: लक्षद्वीप लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: देश की सबसे छोटी लोकसभा सीट लक्षद्वीप है। भौगोलिक नजरिए से नहीं, मतदाताओं की संख्या के नजरिए से यह सीट देश में सबसे छोटी है। यहां 50 हज़ार से भी कम वोटर हैं। आदिवासियों के लिए सुरक्षित है यह लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र जो पूरे संघ शासित प्रदेश तक फैला हुआ है। 1967 से पहले लक्षद्वीप से सांसद मनोनीत किए जाते रहे। राष्ट्रपति के द्वारा उनका मनोनयन होता था। कांग्रेस के नल्ला कोया थांगल लक्षद्वीप के पहले सांसद थे जिन्होंने राष्ट्रपति ने मनोनीत किया था। वे दो बार सांसद रहे। लक्षद्वीप के मतदाताओं ने सबसे पहले निर्दलीय पीएम सईद को सांसद चुनकर 1967 में भेजा था। अगले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर पीएम सईद निर्विरोध चुन लिए गये। उसके बाद से पीएम सईद लगातार लक्षद्वीप से 8 बार सांसद चुने गये। 2004 में पीएम सईद को महज 71 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। जनता दल यू के उम्मीदवार पी पुकुन्ही कोया ने उन्हें हराया था। 2005 में पीएम सईद का निधन हो गया। तब वे केंद्रीय ऊर्जा मंत्री थे और राज्यसभा के सदस्य थे। पीएम सईद ने 13वीं लोकसभा में डिप्टी स्पीकर भी चुने गये थे। 2009 में पीएम सईद के बेटे मोहम्मद हमदुल्ला सईद सांसद हुए। और, 2014 में एनसीपी के पीपी मोहम्मद फैजल को जनता ने सांसद चुना।

profile of Lakshadweep lok sabha constituency
युवा सांसद पीपी मोहम्मद फैजल ने संसद में 47 बार डिबेट में हिस्सा लिया। राष्ट्रीय औसत से यह थोड़ा कम है जो 63.8 का है। 345 सवाल उन्होंने सदन मे पूछे,जो राष्ट्रीय औसत 273 से बहुत बेहतर है। संसद में मौजूदगी 79 प्रतिशत रही। यह भी आम तौर पर औसत उपस्थिति है। वर्तमान सांसद पीपी मोहम्मद फैजल ने अपने सांसद निधि से विकास कार्य में खर्च किए हैं। उनके क्षेत्र में 2.1 करोड़ रुपये सांसद निधि में शेष हैं। इसका मतलब ये है इस रकम का इस्तेमाल किया जाना बाकी है। यह दिसम्बर 2018 तक की स्थिति के अनुसार है। इस समय तक 25 करोड़ की रकम में ज्यादातर राशि उपयोग की जा चुकी थी।

लक्षद्वीप में कुल मतदाता 2014 में 49, 922 थे। पुरुष मतदाताओं की तादाद 25, 433 और महिला मतदाताओं की तादाद 24,489 थी। तब 87 फीसदी मतदान हुआ था यानी 43 हज़ार 239 मतदाताओं ने वोट डाले थे। विजेता उम्मीदवार पीपी मोहम्मद फैजल को 21, 665 वोट मिले और वे 1535 वोटों से विजयी रहे। लक्षद्वीप में कभी बीजेपी का प्रभाव नहीं रहा। 2014 में कांग्रेस के प्रत्याशी मोहम्मद हमदुल्लाह सईद दूसरे नम्बर पर थे। जबकि, बीजेपी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गयी थी। बीजेपी उम्मीदवार को महज 187 वोट मिले थे।

2019 में भी माना जा रहा है कि यहां कांग्रेस और एनसीपी ही दोस्ताना संघर्ष में उतरे। प्रत्याशियों में भी बदलाव के आसार नहीं हैं। इसलिए इस सीट का यूपीए के पास रहना तय लगता है। बीजेपी तभी यह सीट जीत पाएगी, जब कोई चमत्कार हो, पार्टी यहां से किसी बड़े चेहरे को उतारे या फिर कोई बड़ा प्रयोग हो। हालांकि अभी इस आशावाद का कोई आधार बीजेपी के लिए नज़र आता नहीं दिख रहा है।

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