जानिए, आजादी से लेकर अबतक के लोकसभा चुनावों के हाल, कौन-कौन रहा प्रधानमंत्री

तो आईए हम आपको देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक के बारे में बताते हैं जिन्होंने देश पर राज किया। और साथ ही साथ आपको ये भी बताते हैं कि स्वतंत्र भारत में पहली लोकसभा से लेकर 15वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनावों में कौन सी पार्टी को कितनी सीटें मिली थीं।
पहली लोकसभा: 1951-1952
स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक चार महीनों के अंदर करवाए गए थे। उस समय लोकसभा की 489 सीटों के लिए चुनाव हुए थे, जिसमें कुल 1800 उम्मीदवारों का भविष्य तय हुआ था। विधानसभा की 3278 सीटों के लिए भी मतदान हुए थे, जिसके लिए एक लाख 70 हजार उम्मीदवारों ने अपना भाग्य आजमाया था। 173 मिलियन मतदाताओं ने अपने मतों का इस्तेमाल किया था। इन चुनावों में कांग्रेस पहले स्थान पर रही थी, जबकि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीआई) दूसरे स्थान पर रही थी। कांग्रेस को 489 सीटों मे से 364 सीटें मिली थीं, जबकि सीपीआई को 16 सीटें मिली थी।
दूसरी लोकसभा: 1957
दूसरी लोकसभा में संसद के लिए सीटें 489 से बढ़कर 494 हो गईं थी, जबकि 20 मिलियन मतदाताओं का भी इजाफा हुआ था। इस चुनाव में कुल चार बड़ी पार्टियां-इंडियन नेशनल कांग्रेस, सीपीआई, प्रजा सोशियलिस्ट पार्टी और भारतीय जन संघ थीं। 50 क्षेत्रीय पार्टियों ने भी चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन सुधारते हुए सात सीटें ज्यादा जीती थीं। यानी, कांग्रेस को 494 सीटो में से 371 सीटें मिली थीं। सीपीआई फिर से दूसरे नंबर पर रही थी और पिछले चुनाव के मुकाबले उसकी सीटों में भी एक सीट का इजाफा हुआ था। सीपीआई ने दूसरे स्थान पर रहते हुए 17 सीटें जीती थी।
तीसरी लोकसभा: 1962
तीसरी लोकसभा में कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नहरू के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर केंद्र में सरकार बनाई थी। हालांकि, इन चुनावो में कांग्रेस को दस सीटों का नुकसान हुआ था, जबकि सीपीआई को 12 सीटो का फायदा हुआ था। कांग्रेस को जहां 494 मे से 361 सीटें मिली थीं, जबकि सीपीआई ने 29 सीटो पर जीत दर्ज की थी। सीपीआई, पीजेएस और बीजेएस कांग्रेस को कोई टक्कर नहीं दे सकीं।
हालांकि, अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही 1964 में नेहरू की मौत हो गई थी। उनके स्थान पर लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था, लेकिन उनकी भी 1966 में मौत होने के कारण गुलजारी लाल नंदा को पीएम नियुक्त किया गया। वह दोनों बार कार्यवाहक पीएम ही रहे।
चौथी लोकसभा: 1967
इन चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत और सीटो मे भारी गिरावट देखी गई। हालांकि, इस बार चुनावों मे 26 सीटो का इजाफा हुआ था। पिछले तीन चुनावों में दूसरे स्थान पर रहने वाली सीपीआई इस बार दो फाड़ हो गई जिसके चलते उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। कांग्रेस भी दो हिस्सों मे बंट गई। कांग्रेस (रूलिंग), जो इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला धड़ा था, जबकि दूसरा धड़ा मोरारजी देसाई के नेतृत्व मे बना जो कांग्रेस (ओग्रनाइजेशन) कहलाया। इन चुनावों में कांग्रेस को 520 सीटों में से 283 सीटे ही मिल पाई। दूसरे स्थान पर स्वतंत्र पार्टी रही जिसे 44 सीटें मिली।
पांचवी लोकसभा: 1971
इन चुनावो में कांग्रेस ने पिछले चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बेहतर प्रदर्शन करते हुए 545 सीटो में से 352 सीटों पर जीत दर्ज की। पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार सीटें बढ़ गई थीं। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली दूसरी कांग्रेस का सूफड़ा साफ हो गया था। इस बार सीपीआई ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 23 सीटो पर जीत दर्ज की। तमिल नाडु की क्षेत्रीय पार्टी डीएमके ने भी धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए 23 सीटों पर जीत दर्ज की।
छठी लोकसभा:1977
प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने देश मे आपातकाल लगा दिया था, जिससे लोगों में भारी गुस्सा था। इसी के चलते लगातार पांच आम चुनाव जीतने वाली कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के प्रति लोगो की नाराजगी का फायदा मोरारजी देसाई को मिला और वह देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। 545 सीटो पर हुए चुनावो में जनता पार्टी को 294 सीटें मिली, जबकि कांग्रेस 154 सीटों पर सिमटकर रह गई। हालांकि, सरकार के अंदर खींचतान के चलते वह तीन साल के अंदर ही गिर गई।
सातवीं लोकसभा: 1980
जनता पार्टी नेता आपस में ही लड़ पड़े जिसका फायदा इंदिरा के नेतृत्व वाली कांगे्रस को मिला। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 545 सीटों में से 353 सीटों पर जीत दर्ज की। जनता पार्टी (एस) दूसरे स्थान पर रही जिसे महज 41 सीटें ही मिल पाई।
आठवीं लोकसभा: 1984-85
1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षाकर्मी द्वारा हत्या करने के बाद कांगे्रस ने उनके बेटे राजीव गांधी के नेतृत्व में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 545 सीटों में से 414 सीटों पर जीत दर्ज की। पहली बार आम चुनावों में एक क्षेत्रीय दल-जो आंध्र प्रदेश तक ही सीमित था, वह संसद मे मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरा। एन टी रामा राव के नेतृत्व वाली तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) 30 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
नौवीं लोकसभा: 1989
अपनी ही कमजोरियों के कारण कांग्रेस को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा। पहली बार अल्पसंख्यक राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर उभरी। विभिन्न पार्टियो ने जनता दल के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट बनाया जिसे भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों ने बाहर से समर्थन दिया। वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी जनता दल नीत सरकार हालांकि महज 16 महीनें की सत्ता में रह सकी। इन चुनावों में कांग्रेस 545 में से 197 सीटें जीतकर जरूर पहले स्थान पर रही, लेकिन वह सरकार नहीं बना सकी। सरकार बनाने वाली जनता दल 143 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
दसवीं लोकसभा: 1991
एक कमजोर सरकार दूसरी कमजोर सरकार के लिए रास्ता बनाती। हालांकि, 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरी राजनैतिक स्थिति ही बदल गई। कांग्रेस को मिली सहानुभूति के चलते वह पुन: सत्ता में लौट आई। कांग्रेस ने 244 सीटें जीतकर पी वी नरसिंहा राव के नेतृत्व मे सरकार बनाई। भाजपा 120 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
ग्यारवीं लोकसभा: 1996
आम चुनाव इस बार अप्रेल-मई 1996 में हुए। हालांकि, इन चुनावो मे किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। दो साल (1996-1998) में देश को तीन प्रधानमंत्री मिले, जिसके चलते 1998 में फिर से आम चुनाव हुए थे। 1996 में हुए चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनक उभरी।
भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व मे सरकार बनाई, लेकिन वह महज 13 दिनों तक ही चल सकी। इसके बाद संयुक्त मोर्चा बना जिसे 545 में से 332 सदस्यो का समर्थन मिला, जिसके चलते कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी देवेगोड़ा देश के 14वें प्रधानमंत्री बने। हालांकि, कांग्रेस के समर्थन वापसी के कारण वह भी महज 10 महीने तक ही प्रधानमंत्री रह सके। इसके बाद, आई के गुजराल देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन, उन्ही की पार्टी के लालू प्रसाद यादव के अलग होकर दूसरी पार्टी-राजद बनाने और कांग्रेस के फिर से समर्थन वापसी के चलते 11वीं लोकसभा को 1998 मे भंग कर दिया गया।
बारहवीं लोकसभा: 1998
इस बार भी किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन 182 सीटें जीतकर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप मे उभरी। अटल बिहारी के नेतृत्व में भाजपा ने विभिन्न दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई, लेकिन एक साल के अंदर सरकार गिर गई। कांग्रेस 141 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
तेरहवीं लोकसभा: 1999
इस साल हुए करगिल युद्ध का फायदा भाजपा को मिला और वह पुन: सरकार बनाने में कामयाब रही। एक अन्य मोर्चे पर सरकार ऎतिहासिक रही। यह पहली गैर कांग्रेस सरकार रही जो पूरे पांच साल सत्ता में रही। भाजपा नीत गठबंधन ने 545 में से 270 सीटो पर जीत दर्ज की थी। इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले चुनावों में बेहद खराब रहा। 12वीं लोकसभा मे 141 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार 114 सीटें ही जीत सकी।
चौदहवीं लोकसभा: 2004
काफी समय सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस ने चुनावों में आश्चर्यजनक प्रदर्शन करते हुए पुन: सत्ता मे लौट आई। हालांकि, कांग्रेस को खुद 545 में से महज 145 सीटें ही जीत पाई थी, लेकिन दूसरे दलों के समर्थन से कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही। इस गठबंधन को यूपीए नाम दिया गया। माना जा रहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी, लेकिन उन्होंने डॉक्टर मनमोहन सिंह को पीएम पद के लिए मनोनित कर सबको चौंका दिया। भाजपा 114 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
पंद्रहवी लोकसभा: 2009
इन चुनावों में लग रहा था की कांग्रेस सत्ता में दोबारा नहीं लौट पाएगी, लेकिन सभी को चौंकाते हुए कांग्रेस ने चुनावो मे अपने प्रदर्शन को सुधारते हुए 206 सीटे जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा महज 116 सीटें ही जीतकर दूसरे स्थान पर रही। हालांकि, कांग्रेस के सहयोगी दलों की संख्या जरूर कम हुई।
सोलहवीं लोकसभा: 2014
देश को 16 मई को आने वाले परिणामों का बेसब्री से इंतजार है। परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा की प्रधानमंत्री की कुर्सी किसे मिलेगी।
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