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'संविधान की सीमाएं तय करनी होंगी', राष्ट्रपति मुर्मू बनाम सुप्रीम कोर्ट से देश में छिड़ी नई संवैधानिक बहस

President Murmu vs Supreme Court: देश में राष्ट्रपति बनाम सुप्रीम कोर्ट पर एक नई बहस छिड़ गई है। दरअसल हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए सम सीमा निर्धारण करने की बात कही।

कोर्ट के इस फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पलटवार करते हुए उच्चतम न्यायालय से 14 सवाल पूछे है।राष्ट्रपति मूर्मू के सवाल उठाने के बाद से इस मुद्दे पर संविधानिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।

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अब इस पूरे मामले पर सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा की भी एट्री हो गई है। उन्होंने अपनी राय स्पष्ट करते हुए इसे संविधान की मूल भावना और संघीय संरचना से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।

President Murmu vs Supreme Court: क्या है पूरा मामला?

दरअसल इस पूरे बहस की जड़ भारत के उच्चतम न्यायालय के एक फैसले से उभरा है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को तमिलनाडु गवर्नर बनाम राज्य सरकार के बीच हुए विवाद पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पॉवर नहीं है। इसी सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि राज्य के राज्यपाल की ओर से भेजे गए किसी बिल पर प्रेसिडेंट को 3 महीने में फैसला लेना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले पर द्रौपदी मूर्मु ने 15 मई को 14 सवाल पूछते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल के शक्तियों पर न्यायिक दखल और समय सीमा निर्धारण पर स्पष्ट सुझाव मांगे हैं। राष्ट्रपति के इन सवालों के बाद से देश में संवैधानिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।

इस पूरे मामले पर वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए कहा कि राष्ट्रपति का यह संदर्भ दरअसल यह जानने की कोशिश है कि आगे का रास्ता क्या होगा। उन्होंने कहा, "यह सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट गवर्नर और राष्ट्रपति को किस हद तक निर्देश दे सकता है? क्या वह उनके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकता है? क्या एक संवैधानिक पदाधिकारी किसी कानूनी प्रक्रिया को असीमित समय तक रोके रख सकता है?"

President Murmu vs Supreme Court: 'राष्ट्रपति किसी कानून से ऊपर हैं', सिद्धार्थ लूथरा

सीनियर एडवोकेट लूथरा ने इस बहस को आम नागरिकों के अधिकारों से भी जोड़ा और कहा कि यदि राज्यपाल या राष्ट्रपति बिना निर्णय लिए विधेयकों को लटकाए रखते हैं, तो इससे शासन व्यवस्था ठप हो सकती है।

"आज असली मुद्दा यह है कि क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति किसी कानून पर बैठ सकते हैं? क्या इससे पूरा शासन निष्क्रिय हो सकता है? क्या यह संघवाद की आत्मा के विरुद्ध नहीं है? क्या इससे नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा रहा?"

राष्ट्रपति बनाम सुप्रीम कोर्ट के बीच उभरता नया विवाद

राष्ट्रपति मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए किसी प्रकार की निर्धारित समयसीमा का उल्लेख नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान ने इन पदाधिकारियों को विशेष विवेकाधिकार दिए हैं, जो केवल प्रक्रिया नहीं बल्कि संघीय संतुलन, राष्ट्रीय हित और कानूनी एकरूपता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इस पृष्ठभूमि में लूथरा की टिप्पणी यह संकेत देती है कि यह मामला केवल विधायी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे और शासन के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। इस पूरे प्रकरण ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच के दायित्व और सीमा को लेकर बहस को जन्म दिया है।

अब देखना होगा कि क्या अदालत संवैधानिक पदाधिकारियों को समयबद्ध निर्णय लेने को बाध्य कर सकती है? या फिर ऐसे निर्देश संविधान की आत्मा से टकराते हैं? वरिष्ठ अधिवक्ता लूथरा की टिप्पणी इस बहस को और व्यापक आयाम देती है, और यह स्पष्ट करती है कि आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय संविधान के मूल ढांचे और शासन की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

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