प्रशांत किशोर ने सोनिया के सामने रखा 2024 का रोडमैप, जानें पर्दे के पीछे की पूरी रणनीति

नई दिल्ली, 19 अप्रैल: चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने आज एक बार फिर से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की है। सोनिया गांधी और प्रशांत किशोर के बीच ये चार दिनों में तीसरी मुलाकात है। पहली बैठक 16 अप्रैल को हुई जबकि दूसरी 18 अप्रैल को हुई थी। सोनिया गांधी के 10 जनपथ आवास पर हुई बैठक में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, मुकुल वासनिक, केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, एके एंटनी, अंबिका सोनी और रणदीप सुरजेवाला समेत कांग्रेस के नेता भी शामिल हैं।

किशोर ने 2024 आम चुनाव के रोडमैप के साथ विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया

किशोर ने 2024 आम चुनाव के रोडमैप के साथ विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया

सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में इस तरह की दो और बैठकें होने वाली हैं। इससे पहले वेणुगोपाल ने कहा था कि किशोर ने 2024 आम चुनाव के रोडमैप के साथ विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया था। सवालों के जवाब में उन्होंने कहा था कि कांग्रेस पार्टी में किशोर की भूमिका की जानकारी हफ्तेभर में पता चल जाएगी। ये बैठकें इस साल गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस की चुनावी तैयारियों की पृष्ठभूमि में भी हो रही हैं।

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    पीके की प्रजेंटेशन की खास बातें

    पीके की प्रजेंटेशन की खास बातें

    सूत्रों ने एएनआई को बताया कि किशोर ने अपने प्रेजेंटेशन में सुझाव दिया था कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा में अकेले चुनाव लड़ना चाहिए और इसे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में गठबंधन करना चाहिए जिससे राहुल गांधी सहमत नजर आए थे। किशोर ने कहा था कि कांग्रेस को 2024 के आम चुनावों के लिए 370 लोकसभा क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। पार्टी सूत्रों ने कहा कि इस मीटिंग में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की तैयारियों और रणनीति को लेकर चर्चा हुई।

    अगर पार्टी में पीके शामिल हुए तो कहां होगा उनका फोकस

    अगर पार्टी में पीके शामिल हुए तो कहां होगा उनका फोकस

    अगले डेढ़ साल के अंदर देश के 6 बड़े राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। इसी साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात में इलेक्शन हैं। इसके बाद अगले साल राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में चुनाव हैं। इनमें से दो राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है। कांग्रेस लगातार खिसक रही सीटों को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। पार्टी के सामने एक तरफ इन दो राज्यों में सत्ता को बचाने की चुनौती है तो वहीं अन्य राज्यों में फिर से सत्ता वापसी करने के लिए संघर्षरत है। ऐसे में पार्टी को आने वाले चुनावों को लिए एक मजबूत रणनीति की जरूरत है।

    पीके की एंट्री में क्यों हो रही है देरी

    पीके की एंट्री में क्यों हो रही है देरी

    प्रशांत किशोर और राहुल गांधी के बीच पिछले काफी समय से मुलाकातें चल रही है। लेकिन पार्टी में एंट्री को लेकर हर बार मुश्किल हो रही है। पार्टी में इस बात को लेकर भी लगातार मंथन चल रहा है कि प्रशांत किशोर को कांग्रेस में क्या जिम्मेदारी दी जाए। उन्हें सलाहकार के तौर पर शामिल किया जाए या फिर कोई पद देकर नेता बनाया जाए। मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक, कांग्रेस के ज्यादातर नेता चाहते हैं कि प्रशांत किशोर को सलाहकार का दर्जा दिए जाने की बजाय नेता के तौर पर शामिल कर लिया जाए।

    पीके ने कांग्रेस को क्यों चुना

    पीके ने कांग्रेस को क्यों चुना

    कांग्रेस पार्टी धीमे धीमे अपना जनाधार खो रही है। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस के पास अभी 12 करोड़ वोट है। प्रशांत किशोर को पता है कि, कांग्रेस को फिर से खड़ा किया जा सकता है। पीके जेडीयू, टीएमसी, जगन रेड्डी समेत कई पार्टियों के लिए काम कर चुके हैं, लेकिन पीके इन क्षेत्रीय दलों में अपने रोल को नहीं तलाश पाए। ऐसे में उन्हें कांग्रेस पार्टी ही एक ऐसी पार्टी दिख रही है, जिसमें वे अपनी संभावनाओं को तलाशते दिख रहे हैं।

    प्रशांत के आने से कांग्रेस का फायदा

    प्रशांत के आने से कांग्रेस का फायदा

    वहीं लगातार हार के चलते कांग्रेस में काफी निराशा है। ऐसे में पीके के कांग्रेस के साथ जुड़ने का असर आने वाले चुनावों में होता है और पार्टी कुछ सीटें जीतने में सफल होती है, तो उसके कार्यकर्ताओं के लिए काफी अहम होगा। कांग्रेस एक सुस्त पार्टी है। उसका मुकाबला एक ऐसी पार्टी से है जो हर वक़्त चुनावी मोड में रहती है, कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद होगी कि पार्टी से जुड़ने के बाद प्रशांत किशोर कांग्रेस की इस सुस्ती को दूर कर सकते हैं। प्रशांत किशोर इस तरह का सिस्टम बनाने के लिए एक ब्लू प्रिंट पार्टी को दे सकते हैं, पार्टी को हमेशा एक्टिव रख सके।

    कांग्रेस को एक चुनावी मैनेजर की जरूरत है

    कांग्रेस को एक चुनावी मैनेजर की जरूरत है

    वहीं कांग्रेस में चुनावी मैनेजमेंट करने वाले लीडर की भारी कमी दिख रही है। अहमद पटेल की मौत के बाद यह कमी और भी खलने लगी है। ऐसे में पीके पार्टी के चुनाव प्रबंधन में बड़ा रोल प्ले कर सकते हैं। वहीं यूपीए में कांग्रेस की लीडर शिप पर कई बार सवाल खड़े किए जा चुके हैं। ऐसे में पीके अगर पार्टी में शामिल होते हैं तो कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को आसानी से डील कर सकती है। क्योंकि पीके ने कई क्षेत्रीय दलों के साथ काम किया और उनके साथ अच्छे संबंध हैं।

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