जयपाल रेड्डी: भारतीय राजनीति के एक जीवंत प्रवक्ता का अंत

नई दिल्ली- कांग्रेस नेता एस जयपाल रेड्डी ने हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी से छात्र नेता के तौर पर अपने राजनीतक करियर की शुरुआत की थी। वे चार बार एमएलए, चार बार लोकसभा सांसद और दो बार राज्यसभा सांसद चुने गए। जीवन के 77 बसंत देख चुके रेड्डी का सियासी इतिहास गवाह है कि कैसे उन्होंने अपने संघर्ष के दम पर इंदिरा गांधी को भी चुनौती दी और राजीव गांधी के कार्यकाल में भी विपक्ष की मुख्य आवाज बन गए।

राजनीतिक करियर

राजनीतिक करियर

एस जयपाल रेड्डी 1969 से 1984 तक आंध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले में कलवाकुर्थी के विधायक रहे। राजनीति में जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाने की उनकी ललक और क्षमता ही थी कि जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई तो वे इंदिरा सरकार के विरोध में खड़ी जनता पार्टी के साथ हो गए। इंदिरा के विरोध में उन्होंने कांग्रेस ही नहीं छोड़ी, 1980 के लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश की मेडक लोकसभा क्षेत्र में उनके सामने चुनौती बनकर भी खड़े हो गए। आगे इसी राह पर चलते हुए वे जनता दल की ओर से मीडिया के सामने आने वाले चर्चित चेहरे बन गए। 1985 से 1988 तक वे जनता पार्टी के महासचिव रहे। 1984 में वो पहली बार महबूबनगर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। 1990 से 1996 तक राज्यसभा के सदस्य रहते हुए, उन्होंने 1991-1992 में वहां नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभाई। 1999 में वे फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए और 2004 में मिरियालगुडा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। 2009 में उन्होंने चेवेल्ला सीट से जीत दर्ज की। उन्होंने कुल चार बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के माध्यम से संसद में प्रवेश किया।

भाषण कला में माहिर

भाषण कला में माहिर

अपनी भाषण कला के चलते वे उसी दिन से चर्चित राजनेता बन गए थे, जब वे तत्कालीन आंध्र प्रदेश महबूबनगर जिले में कलवाकुर्थी के विधायक के तौर पर विधानसभा में अपनी बात रखते थे। तब वे उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, गोउथु लतचन्ना के साथ आंध्र प्रदेश विधानसभा में ताकतवर विपक्ष के चेहरे माने जाते थे। उन्होंने सिर्फ इंदिरा गांधी को ही आपातकाल के खिलाफ चुनौती नहीं थी, जब 1984 में कांग्रेस ने ऐतिहासिक बहुमत वाली सरकार बनाई थी, तब भी वे लोकसभा में विपक्ष के मुख्य वक्ता बनकर राजीव के सामने खड़े रहते थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन पर कभी पोलियो की पीड़ा को हावी नहीं होने दिया और न ही कभी सियासत के लिए अपनी नीतियों से किसी तरह का समझौता करते दिखे। अपनी भाषण कला की वजह से ही उन्होंने 1998 में बेस्ट पार्लियामेंटिरियन का अवॉर्ड जीता और वे युनाइटेड फ्रंट से लेकर कांग्रेस तक हर उस पार्टी के जाने-माने प्रवक्ता बन गए जिसका उन्होंने प्रतिनिधित्व किया।

गठबंधन की राजनीति के आर्किटेक्ट थे

गठबंधन की राजनीति के आर्किटेक्ट थे

जयपाल रेड्डी के सियासी करियर को खंगालने के बाद यदि उन्हें आज की गठबंधन की राजनीति का एक आर्किटेक्ट कहें गलत नहीं होगा। यूनाइटेड फ्रंट की सरकार के गठन में उन्होंने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने थे। गठबंधन की राजनीति में रमे रहने के बाद जब वे कांग्रेस में दोबारा शामिल हुए तब उनके पॉलिटिकल करियर में एक और नया मोड़ आ गया और 2004 में उन्हें मनमोहन सिंह कैबिनेट में भी जगह मिल गई।

कई सरकार में अहम जिम्मेदारियां

कई सरकार में अहम जिम्मेदारियां

उन्होंने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय, शहरी विकास एवं संस्कृति मंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय से लेकर विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय तक की जिम्मेदारियां संभालीं। वे पहले फेडरल फ्रंट की सरकार में मंत्री बने और फिर कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए-1 और यूपीए-2 में भी केंद्रीय मंत्री का दायित्व संभाला। लेकिन, उनके पेट्रोलियम मंत्रालय से विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय में भेजे जाने को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद भी जुड़ा है। आरोप लगाए गए कि उन्होंने रिलायंस को गैस आवंटित करने से मना कर दिया था, इसलिए उनका मंत्रालय बदल दिया गया।

तेलंगाना की राजनीति में नहीं चली

तेलंगाना की राजनीति में नहीं चली

जब 2014 में नरेंद्र मोदी के उदय ने भारतीय राजनीति से कांग्रेस का सफाया कर दिया तो उन्होंने खुद को राष्ट्रीय राजनीति से पीछे हटा लिया। महबूबनगर से चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने खुद को तेलंगाना की राजनीति तक सीमित कर लिया, लेकिन कांग्रेस को उसकी बदकिस्मती से उबार नहीं पाए। तेलंगाना में कांग्रेस की बुरी हार रेड्डी के लिए निजी हार से कम नहीं रही। उनके नजदीकी रिश्तेदार और प्रदेश कांग्रेस के वर्किंग प्रेसिडेंट रेवानाथ रेड्डी तक अपनी सीट नहीं बचा सके। कई कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ दी और इसके लिए जयपाल रेड्डी को ही दोषी करार दिया। रेड्डी के आलोचक कहते हैं कि उन्होंने दिल्ली में अपनी जो प्रभावी छवि बनाई थी, वैसा राज्य में बना पाने में वे हमेशा नाकाम रहे और प्रदेश में उनका वो दबदबा कभी नहीं बन पाया, जैसा कि कभी दिल्ली में दिखता था।

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