अमित शाह: मैनेजर ज़्यादा हैं और लीडर कम, शाह के बारे में जानिए सब कुछ
नई दिल्ली। भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह एक बार फिर से अपना करिश्मा गुजरात चुनावों में दिखाने को तैयार हैं। विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी के गुजरात दौरे को पाटीदार समाज से मिली उत्साहपूर्वक प्रतिक्रिया को भांपते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। अमित शाह ने गुजरात में अपना लक्ष्य 150 सीटों का रखा है। लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार की धमाकेदार जीत के लिए अगर नरेन्द्र मोदी के बाद किसी को क्रेडिट जाता है तो वो अमित शाह। अमित शाह के पार्टी की कमान संभालने के बाद कई राज्यों में भाजपा की सरकार बनाई। इसमें सबसे अहम जीत उत्तर प्रदेश की मानी जीती है। सालों से वनवास झेल रही भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ यूपी में जबरदस्त वापसी करवाई। आइए जानते हैं अमित शाह का राजनीतिक सफर...
अमित शाह 1986 में भाजपा में शामिल हुये। 1987 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का सदस्य बनाया गया। शाह को पहला बड़ा राजनीतिक मौका मिला 1991 में, जब उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी के लिए गांधीनगर संसदीय क्षेत्र में उन्होंने चुनाव प्रचार का जिम्मा सौंपा गया। दूसरा मौका 1996 में मिला, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात से चुनाव लड़ना तय किया। पेशे से स्टॉक ब्रोकर अमित शाह ने 1997 में गुजरात की सरखेज विधानसभा सीट से उप चुनाव जीतकर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की।

अमित शाह 2009 में वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष बने। 2014 में नरेंद्र मोदी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। 2003 से 2010 तक वे गुजरात सरकार की कैबिनेट में गृहमंत्री रहे। 2012 में नारनुपरा विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से उनके विधानसभा चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने तीन बार सरखेज विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे गुजरात के सरखेज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से चार बार क्रमश: 1997 (उप चुनाव), 1998, 2002 और 2007 से विधायक निर्वाचित हो चुके हैं।

अमित शाह का सफर
1964 में व्यापारी अनिलचंद्र शाह के घर अमित शाह का जन्म हुआ। 1984 में वो छात्र राजनीति से जुड़ें। और एबीवीपी में शामिल हो गए। उनकी राजनीति जीवन की शुरुआत इसी के साथ हो गई।
मोदी से हुई मुलाकात
80 के दशक में अमित शाह ने स्टॉक ब्रोकर के तौर पर काम शुरू किया था। इसी के दौरान उनकी मुलाकात नरेंद्र मोदी से हुई। ये वक्त उनके लिए टर्निंग प्वाइंट के तौर पर रहा।
चुनाव प्रचार से जुड़ें
1991 में उन्होंने अमित शाह के लिए चुनाव प्रचार किया। उनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर उन्हें 1995 गुजरात राज्य वित्तीय निगम के चेयरमैन बनाया गया। 1998 सरखेज विधानसभा उपचुनाव में पहली बार विधायक बने।

मंत्री बनें शाह
2002 में अमित शाह गुजरात के गृह राज्य मंत्री बने। उनका कार्यकाल विवादों में फंसा रहा। एक के बाद ेक कई आरोप उनपर लगे। फर्जी मुठभेड़ मामला हो या फिर जासूसी कांड अमित शाह पर आरोप लगते रहे।
विवादों में घिरे रहें
शाह 2005 में कथित फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन की हत्या मामले में अमित शाह का नाम शामिल किया गया। सीबीआई की जांच अब तक चल रही है। वहीं 2009 में उन्हें गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन बनाया गया।

गुजरात में इंट्री पर लगी रोक
फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में शाह को गिरफ़्तारी की तलवार झेलनी पड़ी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस शर्त पर ज़मानत दी कि वे गुजरात से दूर रहेंगे, लेकिन 2012 में उनके गुजरात जाने पर लगाई गई रोक हटा ली गई।
मीडिया से दूरी
अमित शाह को करीब से जानने वाले कहते है कि उनके पास टाइम ही नहीं रहता कि वो मीडिया से बात करें। जबकि पत्रकार उनसे बात करने के लिए तड़पते रहते हैं। अमित शाह की शख्सियत को समझना अपने आप में ख़ासा पेचीदा काम है।
मोदी के दाहिने हाथ
अमित शाह मैनेजर ज़्यादा हैं और लीडर कम। अहम फैसले को लिए मोदी और शाह के विचार हमेशा एक ही होता है। यूपी को शाह के हाथों में सौंपने का फैसला मोदी का ही था।












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