नज़रियाः केजरीवाल के सामने ट्रांसफ़र-पोस्टिंग मामले का पेंच

Posted By: BBC Hindi
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    दिल्ली सरकार, अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट
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    दिल्ली सरकार, अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट

    4 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक संवैधानिक पीठ ने तीन स्वतंत्र फ़ैसले सुनाए- जिसमें बिना किसी मतभेद उस अनुच्छेद 239 एए की एक मुकम्मल व्याख्या की गई जिसके अंतर्गत दिल्ली को बतौर केंद्र शासित प्रदेश विशेष दर्जा प्राप्त है.

    इस सब की शुरुआत अगस्त 2016 के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर सवाल उठाती नौ रिट याचिकाओं को दाख़िल करने के साथ हुई थी.

    उस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाओं में 239 एए की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं, इसलिए खंडपीठ का कहना था कि पहले संवैधानिक पीठ को संवैधानिक प्रश्नों को संबोधित करना चाहिए और उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट का उचित बेंच व्यक्तिगत अपील पर फ़ैसला कर सकता है.

    संवैधानिक पीठ ने खुद को संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करने तक ही सीमित कर दिया और उसने कहीं भी मतभेद, असहमति या संदेह के ख़ास क्षेत्रों का ज़िक्र नहीं किया.

    संवैधानिक खंडपीठ के निर्णयों के आधार पर कोई अनुमान लगाया जाना अभी जल्दबाजी होगी. जिसमें सबसे विवादास्पद मुद्दों में शामिल सेवा क्षेत्र (जिसे अफ़सरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग भी कहा जाता है) और एंटी करप्शन विभाग पर नियंत्रण वापस पाना भी शामिल है.

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    ट्रांजैक्शन ऑफ़ बिजनेस रूल्स

    तीनों फ़ैसलों में भारत के राष्ट्रपति (इस मामले में गृह मंत्रालय) द्वारा जारी किए गए ट्रांजैक्शन ऑफ़ बिजनेस रूल्स (टीबीआर) या सरकार के कामकाज संबंधी नियमावली 1993 का हवाला दिया गया है.

    इसमें कहीं भी केंद्र सरकार के अधिकार का ज़िक्र नहीं है, ना तो उनके अधिकार पर सवाल उठाया गया है बल्कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने सेवा क्षेत्र का सबसे प्रत्यक्ष संदर्भ दिया है.

    उन्होंने टीबीआर 1993 के नियम 46 पर ध्यान दिलाया जिसके तहत लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) को अधिकारियों की सेवा शर्तों को नियंत्रित करने की शक्तियां और अधिकार दिए गए हैं.

    1993 के नियम में ख़ास तौर पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और भूमि सचिव की स्थिति का उल्लेख किया गया है.

    हालांकि 1998 और 2015 के टीबीआर में अधिकारियों की पोस्टिंग के लिए एलजी की मंजूरी को लेना आवश्यक किया गया है लेकिन इसका ज़िक्र खंडपीठ ने नहीं किया है.

    हालांकि यही टीबीआर के नियम 46 की स्थिति है और संवैधानिक खंडपीठ के किसी भी निर्णय में इस पर सवाल नहीं उठाया गया है.

    वास्तव में सभी जजों ने टीबीआर का उल्लेख किया गया है और इसका किसी भी स्तर पर खंडन नहीं किया गया है.

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    केजरीवाल

    आम धारणा क्या है?

    संवैधानिक पीठ के फ़ैसले के बाद दिल्ली के राजनीतिक शासन को एलजी को सूचित करने के बाद शहर के प्रशासन की बेहतरी के लिए निर्णय लेने और इसे लागू करने का अधिकार मिल गया है, जैसा कि आमधारणा है इसमें अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफर के अधिकार का मसला भी स्वतः शामिल हो गया है.

    लेकिन यह व्याख्या की ग़लती है. जबतक टीबीआर को संशोधित नहीं किया जाता या व्यक्तिगत मामलों को संवैधानिक फ़ैसलों के आधार पर बेंच तय नहीं करती, निर्वाचित सरकार पोस्टिंग और ट्रांसफर के अधिकार को अपने हाथ में आ चुका नहीं मान सकती.

    आम जनता को यह बेतुका दिख सकता है कि एक निर्वाचित सरकार के पास क़ानून बनाने, सालाना बजट की मंजूरी और योजनाओं-परियोजनाओं को शुरू करने की शक्ति कैसे हो सकती है जब वो एलजी की स्वीकृति के बगैर अधिकारियों की पोस्टिंग ही नहीं कर सकती?

    केजरीवाल सरकार, दिल्ली सरकार, ट्रांसफर-पोस्टिंग का मसला
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    केजरीवाल सरकार, दिल्ली सरकार, ट्रांसफर-पोस्टिंग का मसला

    ट्रांसफ़र-पोस्टिंग में केंद्र पर निर्भरता

    अब यह केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वो मुख्यमंत्री के कार्यों को कुशलतापूर्वक करने में सहायता देने के लिए उन्हें पोस्टिंग और ट्रांसफ़र में परामर्श का अधिकार दे, न कि सर्वोच्चता के तौर पर.

    पिछले 42 महीनों के दौरान दिल्ली सरकार का मनमाना रवैया और व्यक्तिगत छींटाकशी का व्यवहार अधिकारियों को सुरक्षा देने की आवश्यकता की ओर इशारा करता है.

    स्पष्ट रूप से टीबीआर का पालन करने की ज़िम्मेदारी मुख्य सचिव, वित्त सचिव, क़ानून सचिव और विभागीय सचिवों के कंधों पर रखी गई है.

    इन अधिकारियों की पोस्टिंग टीबीआर को उचित रूप से लागू करने में महत्वपूर्ण है. इन तीन फ़ैसलों में उसे इतनी अहमियत दी गई है कि उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है. क्योंकि अच्छे प्रशासन की असली परीक्षा है कि वो नियमों और प्रक्रिया का पालन करे.

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    English summary
    Point Transfer-posting screw in front of Kejriwal

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