मोदी कैबिनेट 3.0: बिहार की धमक, 8 केंद्रीय मंत्री लेकिन ठगे गए कोशी और वैश्य, ठाकुरों की भी अनदेखी
लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार में एनडीए का प्रदर्शन शानदार रहा। बिहार की 40 लोकसभा सीटों में एनडीए ने 30 सीटों पर जीत हासिल की है। इन 30 जीते हुए सांसदों में से बिहार के हिस्से केंद्रीय मंत्रिपरिषद में तीन कैबिनेट और पांच राज्य मंत्री पद आए हैं।
बिहार से जैसे ही कैबिनेट बंटवारे की खबर सामने आई, इसमें क्षेत्रीय, जातिवाद और सामाजिक असंतुलन को उजागर किया है। असल में उत्तर बिहार से छह मंत्री हैं, जबकि राज्य के दक्षिणी और मध्य हिस्सों से सिर्फ एक-एक मंत्री लिए गए हैं। ऐसा लगता है कि भाजपा ने खासकर वैश्य (बनिया) वोटरों को नजरअंदाज कर दिया है।

कुशवाहा समुदाय को NDA ने किया नजरअंदाज
वहीं एनडीए ने ओबीसी कुशवाहा समुदाय को नाराज किया है। इसकी पीछे एक और वजह यह भी है कि जहां-जहां कुशवाहा समुदाय का वर्चस्व है, उन सीटों पर एनडीए हार गई है।
एनडीए के कुशवाहा चेहरों की बात करें तो उपेंद्र कुशवाहा काराकाट से हार गए हैं। वहीं भाजपा के उम्मीदवार आरा, बक्सर और सासाराम की तीन सीटों से हार गए, जहां अच्छी खासी कुशवाहा आबादी है। जेडी(यू) के वाल्मीकि नगर के सांसद सुनील कुमार, जो कुशवाहा जाति के हैं, वो भी अपनी सीट नहीं बचा पाए हैं।
क्षेत्रीय असंतुलन भी दिखा साफ-साफ
अगर बात क्षेत्रीय असंतुलन की करें तो सरकार में दो मंत्री एक ही क्षेत्र से लिए गए हैं। समस्तीपुर से जेडी(यू) के राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर और उजियारपुर के सांसद नित्यानंद राय दोनों को कैबिनेट का हिस्सा बनाया गया है और ये दोनों एक ही क्षेत्र से आते हैं।
वहीं उत्तर बिहार के चंपारण से आने वाले भाजपा के राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र दुबे को भी मौक मिला है। सतीश चंद्र दुबे बिहार के मजबूत ब्राह्मण नेता माने जाते हैं। वाल्मीकि नगर लोकसभा क्षेत्र से सतीश चंद्र दुबे 2014 से लेकर 2019 तक सांसद भी रह चुके हैं।
इसी तरह लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के हाजीपुर सांसद चिराग पासवान भी इसी क्षेत्र से आते हैं, जिन्हें फूड प्रोसेसिंग मंत्री बनाया गया है। बेगूसराय का प्रतिनिधित्व करने वाले भाजपा के गिरिराज सिंह उत्तर बिहार से छठे मंत्री हैं, जिन्हें कैबिनेट में जगह मिली है।
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और गया के सांसद जीतन राम मांझी मध्य बिहार से एकमात्र मंत्री हैं, जो इस सरकार का हिस्सा हैं। इसी तरह मुंगेर से जेडी(यू) के सांसद राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) दक्षिण बिहार से एकमात्र मंत्री बनाए गए हैं।
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NDA ने दलितों को प्रतिनिधित्व करने पर किया फोकस!
एनडीए ने मांझी और पासवान को शामिल करके दलितों को प्रतिनिधित्व देने की भी कोशिश की है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक एक भाजपा ने इस बात को माना भी है कि बिहार से मंत्रियों के चुनाव को और बेहतर किया जा सकता था ताकि क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन और बेहतर हो।
नाम न छापने की शर्त पर नेता ने कहा, "हमारे सभी चार मंत्री ट्रांस-गंगा क्षेत्र से हैं। हम एक वैश्य को भी शामिल कर सकते थे। उन्होंने ये भी माना है कि एनडीए के मंत्रियों के चयन में सामाजिक असंतुलन भी दिखाई दिया।
जहां जेडी(यू) ने पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर को चुनकर अत्यंत पिछड़ा वर्ग को रिझाने की कोशिश की है। वहीं भाजपा ने ओबीसी यादव वोटों पर नजर रखते हुए नित्यानंद राय को कैबिनेट में शामिल किया है। यादवों को राजद का पारंपरिक मतदाता माना जाता है।
भाजपा ने मल्लाह नेता और मुजफ्फरपुर के सांसद राज भूषण चौधरी (निषाद) को मंत्री बनाकर ईबीसी कार्ड भी खेला है। जबकि जेडी(यू) और भाजपा दोनों ने एक-एक भूमिहार ललन सिंह और गिरिराज सिंह को केंद्र में भेजा है।
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राजपूतों को किया गया नजरअंदाज
एनडीए ने राजपूतों (ठाकुरों) को नजरअंदाज किया है। जीते हुए 30 सांसदों में से 5 राजपूत हैं। भाजपा के राधा मोहन सिंह (पूर्वी चंपारण), राजीव प्रताप रूडी (सारण) और जनार्दन सिंह सिग्रीवाल (महाराजगंज), एलजेपी(आर) की वीणा देवी (वैशाली) और जेडी(यू) की लवली आनंद (शिवहर) में से किसी को मंत्री बनाने पर विचार नहीं किया गया है। कायस्थ समुदाय से आने वाले पटना साहिब के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी इस बार मंत्रालय का हिस्सा नहीं बनाया है।
जेडी(यू) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी को तीन बर्थ की उम्मीद थी, लेकिन केवल दो ही मिले। नेता ने कहा, ''अगर हमें एक और मंत्री बनाने का मौका मिलता, तो यह कुर्मी या कुशवाहा समुदाय के पास जाने की संभावना थी। हमारी पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक ललन सिंह कैबिनेट बर्थ के हकदार थे, जबकि ठाकुर की पदोन्नति के लिए एक अच्छा विकल्प था।''












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